भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग: सह्याद्रि की गोद में बसा दिव्य शिवधाम
भीमाशंकर महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वतों की सुरम्य गोद में स्थित एक प्राचीन और अत्यंत पावन शिवधाम है। यह मंदिर भारत के प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगों में से छठा है और अपनी अद्भुत आध्यात्मिक आभा तथा प्राकृतिक सौंदर्य के कारण श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों—दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पुणे से लगभग 125 किमी दूर भोरगिरि गाँव के पास बसे इस दिव्य धाम तक पहुँचते ही भक्तों का मन हरियाली, पहाड़ी घाटियों और शांत वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाता है। भीमाशंकर वही स्थान है जहाँ से पवित्र भीमा नदी का जन्म होता है। यही नदी आगे पंढरपुर में चंद्रभागा नाम से प्रसिद्ध हो जाती है, जो भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
भीमाशंकर मंदिर के पीछे स्थित मोक्षकुंड को ऋषि कौशिक की प्राचीन तपस्थली माना जाता है। इसके आसपास ही कई अन्य पवित्र तीर्थ स्थित हैं, जिनमें सर्वतीर्थ, कुशारण्य तीर्थ—जहाँ से पवित्र भीमा नदी पूर्व दिशा में अपनी यात्रा आरंभ करती है—और ज्ञानकुंड जैसे दिव्य स्थान शामिल हैं। ये सभी तीर्थस्थल भक्तों को आध्यात्मिक शांति, पुण्य और आत्मिक संतोष प्रदान करते हैं।
हाल के वर्षों में भीमाशंकर का महत्व और बढ़ गया है क्योंकि इसे “वन्यजीव अभयारण्य” घोषित किया गया है। यह पूरा क्षेत्र पश्चिमी घाट का हिस्सा है, जो अपनी जैव-विविधता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ तरह-तरह के पक्षी, दुर्लभ प्रजातियों के जानवर और अनगिनत औषधीय पौधे पाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है—मालाबार विशालकाय गिलहरी, जिसे स्थानीय लोग प्रेम से “शेकरू” कहते हैं। यह अनोखा जीव केवल भीमाशंकर के घने जंगलों में ही दिखाई देता है। भीमाशंकर का जंगल चमकते झरनों, ऊँचे पहाड़ों, घने वनों और मनमोहक घाटियों से भरा है। यहाँ की शांति, प्राकृतिक छटा और पक्षियों की मधुर ध्वनियाँ हर आगंतुक को दिव्य अनुभव कराती हैं। वन्यजीव और फोटोग्राफी प्रेमियों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहाँ आपको दुर्लभ पक्षी और मायावी विशाल गिलहरी के दुर्लभ दृश्य देखने को मिल सकते हैं। मानसून आने से पहले यहाँ जुगनू महोत्सव मनाया जाता है, जब हजारों जुगनू मिलकर पूरे गाँव को प्रकाशमय कर देते हैं। यह दृश्य हर आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर देता है।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी पौराणिक कथा
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी यह रोचक और प्रेरक कथा रामायण काल से आरंभ होती है।
सह्याद्री पर्वत पर कर्कट नामक एक दैत्य अपनी पत्नी पुष्कषी और पुत्री कर्कटी के साथ रहता था। जब कर्कटी युवावस्था में पहुँची, तो उसका विवाह दण्डकारण्य में रहने वाले विराध राक्षस से हुआ। श्रीराम के वनवास काल में श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा विराध का वध किया गया। पति की मृत्यु के बाद कर्कटी सहारे के अभाव में अपने माता-पिता के पास सह्य पर्वत लौट आई।
एक दिन भोजन की खोज में निकले कर्कट और पुष्कषी को महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि मार्ग में दिखाई दिए। दोनों ने उन पर आक्रमण करने का प्रयास किया, लेकिन सुतीक्ष्ण मुनि के तपोबल से वे तुरंत भस्म हो गए। माता-पिता के निधन के बाद कर्कटी बिल्कुल अकेली रह गई। कुछ समय बाद लंका का पराक्रमी योद्धा और रावण का भाई कुम्भकर्ण विहार के लिए सह्य पर्वत आया। यहीं उसकी भेंट कर्कटी से हुई और दोनों एक-दूसरे पर मोहित होकर गंधर्व विवाह के बंधन में बँध गए। कुछ समय साथ बिताने के बाद कुम्भकर्ण उसे वहीं छोड़कर लंका लौट गया। इसी बीच श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई की और युद्ध में कुम्भकर्ण वीरगति को प्राप्त हुआ। उसी दिन कर्कटी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया— भीम।
समय बीतने पर भीम ने अपनी माता से अपने पिता के बारे में पूछा। तब कर्कटी ने उसे बताया कि उसके पिता कुम्भकर्ण थे, जिनका वध स्वयं श्रीराम ने किया था। यह जानकर भीम क्रोध से भर उठा और प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा। उसने ब्रह्मदेव की कठोर तपस्या की और उनसे अतुलनीय बल का वरदान प्राप्त किया। वरदान पाते ही भीम का अहंकार बढ़ गया। प्रतिशोध लेने के लिए वह अयोध्या पहुँचा, परंतु उसे ज्ञात हुआ कि श्रीराम अपना दिव्य अवतार पूर्ण कर लीला संवरण कर चुके हैं। निराश भीम को उपस्थित ऋषियों से पता चला कि श्रीराम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे। तब उसने विष्णु से ही प्रतिशोध लेने का विचार किया।
अहंकार में चूर होकर उसने सबसे पहले स्वर्गलोक पर आक्रमण किया और इंद्र सहित सभी देवताओं को वहाँ से निष्कासित कर दिया। इसके बाद उसने बैकुंठ पर धावा बोला, जहाँ भगवान विष्णु से उसका भीषण युद्ध हुआ। परंतु क्योंकि उसकी मृत्यु का समय अभी नहीं आया था, विष्णु अंतर्धान हो गए। इसके बाद भीम कामरूप के राजा सुदक्षिण पर टूटा, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। सुदक्षिण ने पूरी वीरता के साथ उसका सामना किया लेकिन वरदान के कारण वह भीम को रोक नहीं पाए और अपनी पत्नी दक्षिणा के साथ कारावास में डाल दिए गए। कारागार में ही दोनों ने पार्थिव शिवलिंग बनाकर नियमपूर्वक भगवान शिव की आराधना शुरू की।
उधर, भीम के अत्याचारों से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता ब्रह्मदेव को साथ लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। विष्णु ने कहा कि भीम को आपका वरदान प्राप्त है और उसकी मृत्यु केवल भगवान रुद्र के हाथों ही संभव है। इसलिए सभी को महादेव की शरण में जाना चाहिए। इसके बाद विष्णु, ब्रह्मदेव और सभी देवता कैलाश पहुँचे और स्थिति निवेदित की। महादेव ने सभी को आश्वस्त किया कि वे शीघ्र ही भीम के आतंक का अंत करेंगे। उधर कारागार में भीम ने सुदक्षिण व दक्षिणा को शिवलिंग की पूजा करते देखा और क्रोध में भरकर अपशब्द बोलते हुए शिवलिंग को तोड़ने के लिए पैर उठाया। तभी वहाँ स्वयं महारुद्र प्रकट हुए। उनके दिव्य तेज से भीम भयभीत होकर काँपने लगा।
भगवान शिव ने कहा— “असुर! तूने हरि और हर के भक्तों को सताकर धर्म की मर्यादा भंग की है। अब मृत्यु ही तेरी अंतिम गति है।” इसके बाद महादेव और भीम के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हुआ। बहुत समय बाद महादेव ने किसी असुर से युद्ध किया था, इसलिए वे इस युद्ध का दिव्य आनंद लेते रहे और युद्ध लंबा खिंच गया।तभी देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे और बोले— “भगवन! एक तिनके को काटने के लिए कुल्हाड़ी की क्या आवश्यकता? अब इस अधर्मी का शीघ्र वध कीजिए।” यह सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और केवल एक हुँकार से उस दैत्य भीम का भस्म कर दिया। युद्ध के बाद देवताओं और राजा सुदक्षिण ने महादेव से उसी स्थान पर विराजमान होने की प्रार्थना की। तब भगवान शिव उसी पार्थिव लिंग में स्थापित हो गए। तभी से यह दिव्य स्थान श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग नाम से विख्यात हुआ।
विश्वास है कि जो भी इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन करता है, उसके सभी पापों का नाश होता है और शत्रु भी शांत हो जाते हैं।
भीमाशंकर मंदिर की दैनिक पूजा एवं मंदिर कार्यक्रम
भीमाशंकर मंदिर में पूरे दिन भक्तों के लिए सुव्यवस्थित और पवित्र दिनचर्या निर्धारित है। प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक चलने वाली पूजा-पद्धति भक्तों को दिव्य वातावरण में डूब जाने का अवसर देती है।
सुबह ठीक 5:00 बजे मंदिर के कपाट खुलते ही पूरे परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसके तुरंत बाद 5:00 से 5:30 बजे तक मंगल आरती का आयोजन होता है। आरती के पश्चात 5:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक भक्तगण शांतिपूर्वक भगवान के दर्शन करते हैं और अभिषेक का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
दोपहर 12:00 से 12:20 बजे तक भगवान को नैवेद्य अर्पित किया जाता है, जिसके बाद 12:20 से 2:45 बजे तक पुनः दर्शन और अभिषेक के लिए समय निर्धारित है। दोपहर बाद 2:45 से 3:20 बजे तक दूसरी आरती संपन्न होती है। इसके उपरांत 3:20 से शाम 7:30 बजे तक भक्त खुलकर दर्शन कर सकते हैं।
संध्या होते ही 7:30 से 8:00 बजे तक शाम की आरती पूरे वातावरण को भक्ति रस से भर देती है। इसके बाद 8:00 से 9:30 बजे तक अंतिम दर्शन होते हैं। रात्रि 9:30 बजे मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
यह पूरी दिनचर्या भक्तों को सुबह से रात तक महादेव की उपासना का पावन अवसर प्रदान करती है।
भीमाशंकर मंदिर की वास्तुकला और ऐतिहासिक गौरव
भीमाशंकर मंदिर नागर शैली में निर्मित है, जिसमें प्राचीन और नवीन दोनों तरह के स्थापत्य के सुंदर मिश्रण की झलक मिलती है। यह 13वीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है, जबकि सभामंडप का निर्माण 18वीं शताब्दी में नाना फड़नवीस द्वारा कराया गया था। मंदिर का शिखर भी नाना फड़नवीस द्वारा निर्मित है और इसका सम्पूर्ण ढाँचा हेमाडपंथि शैली की नक्काशी से सुसज्जित है। अंदर विराजमान दशावतार की भव्य प्रतिमाएँ देखने वालों का मन मोह लेती हैं। मुख्य मंदिर के निकट स्थित नंदी मंदिर का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
कहा जाता है कि मराठा साम्राज्य के महान संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहाँ पूजा-अर्चना के लिए दान दिया था। पेशवा बालाजी विश्वनाथ और रघुनाथ पेशवा भी इस धाम में आते रहे। रघुनाथ पेशवा ने यहाँ एक कुआँ खुदवाया था। यहीं 1721 ई. में चिमाजी अप्पा द्वारा वसई विजय के बाद लाई गई पाँच विशाल घंटियों में से एक भी स्थापित की गई। करीब 5 मन वजनी उस धातु की घंटी की ध्वनि आज भी पूरे क्षेत्र में गूँजती है।
भीमाशंकर के आसपास के दर्शनीय एवं पवित्र स्थल
भीमाशंकर केवल ज्योतिर्लिंग का दर्शन कराने वाला स्थान ही नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और इतिहास से भरपूर अद्भुत धाम है। मुख्य मंदिर के आसपास अनेक दर्शनीय स्थल, पवित्र तीर्थ और प्राकृतिक आकर्षण मौजूद हैं, जो यात्रियों को आध्यात्मिक शांति और प्रकृति का अनोखा अनुभव कराते हैं।
1. गुप्त भीम और साक्षी-विनायक मंदिर
लगभग 2 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच स्थित गुप्त भीम और साक्षी-विनायक मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को पैदल यात्रा करनी पड़ती है। साक्षी-विनायक भगवान गणेश का छोटा और अत्यंत पवित्र मंदिर है। गुप्त भीम स्थल की खासियत है यहाँ बहने वाली छोटी भीमा नदी और झरना, जिसके जल से शिवलिंग पर निरंतर अभिषेक होता रहता है।
गुप्त भीम के आसपास के प्रमुख स्थल हैं—
वन्ध्यातीर्थ, कुशारण्य, व्याघ्रपाल और हर-हर महादेव बिंदु।
2. महादेव वन
भीमाशंकर बस स्टैंड से लगभग 500 मीटर दूर स्थित महादेव वन एक विस्तृत और सुंदर उद्यान है। यहाँ विविध प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं और वर्तमान में यह उद्यान तेजी से विकसित हो रहा है।
3. भीमा नदी उद्गम स्थान
भीमाशंकर ही पवित्र भीमा नदी का उद्गम स्थल है। मंदिर की सीढ़ियों से लगभग 50 मीटर नीचे एक छोटा-सा जलकुंड स्थित है, जहाँ से नदी अपनी यात्रा आरंभ करती है। यह स्थान अत्यंत शांत, पवित्र और आध्यात्मिक महत्व से भरा हुआ है।
4. हनुमान झील
मुख्य भीमाशंकर मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित शांत और सुंदर हनुमान झील प्रकृति प्रेमियों के लिए आदर्श स्थान है। झील के आसपास हनुमान मंदिर और अंजनी माता मंदिर स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में यही स्थान ऋषि जाभाल्य का आश्रम था।
5. मुंबई पॉइंट
भीमाशंकर बस स्टैंड से मात्र 100 मीटर दूरी पर स्थित मुंबई पॉइंट लगभग 3000 फीट की ऊँचाई से कोकण घाटी का मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्य प्रस्तुत करता है। यह फोटो प्रेमियों और प्रकृति देखने वालों के लिए आदर्श स्थान है।
6. नागफनी पॉइंट
हनुमान झील से करीब 500 मीटर दूर स्थित नागफनी पॉइंट तक पहुँचने के लिए एक छोटी पहाड़ी पर चढ़ना होता है। यहाँ से कोकण क्षेत्र और प्रसिद्ध कलावंतिन किला का दिव्य दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए यह खास आकर्षण है।
7. वनस्पति पॉइंट
महादेव वन उद्यान का आकर्षक हिस्सा वनस्पति पॉइंट प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान है। यहाँ विभिन्न वनस्पतियों की प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं। साथ ही यह स्थल कोकण क्षेत्र का अत्यंत सुंदर और विस्तृत दृश्य प्रस्तुत करता है।
8. भका देवी
कोधंवाल फाटा मार्ग पर स्थित भका देवी स्थल एक शांत और आध्यात्मिक स्पर्श देने वाला स्थान है। कोंधवाल झरने की तरह यह भी प्रकृति और पक्षी प्रजातियों से भरपूर क्षेत्र में स्थित है।
9. श्री भीमाशंकर देवालय अखण्ड धूना
यह स्थान भीमा नदी के उद्गम स्थल के समीप स्थित है। यहाँ अखण्ड धूना निरंतर जलती रहती है, जो भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र और श्रद्धा का केंद्र है।
10. कोटेश्वर महादेव
भीमाशंकर से लगभग 6–7 किमी दूर जंगलों के बीच स्थित कोटेश्वर महादेव मंदिर “भोरगिरि” गाँव का प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल है। इस स्थान को “कोटि तीरथों” का संगम भी कहा गया है। गुप्त भीम से लगभग 4–5 किलोमीटर पैदल चलकर यहाँ पहुँचा जाता है।
11. कोंधवाल झरना
भीमाशंकर की ओर आते समय कोंधवाल फाटा से दायीं ओर मुड़कर लगभग 5–6 किमी जाने पर अद्भुत कोंधवाल झरना मिलता है, जिसे “बर्ड पॉइंट” के नाम से भी जाना जाता है। पास का क्षेत्र भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा होने के कारण यहाँ कई दुर्लभ पक्षी दिखाई देते हैं।
भीमाशंकर घूमने का सबसे अच्छा समय
भीमाशंकर की यात्रा के लिए सितंबर से फरवरी का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में मौसम सुहावना रहता है, जिससे मंदिर दर्शन, ट्रेकिंग और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद बिना किसी असुविधा के लिया जा सकता है।
मानसून (जून से अगस्त) में यहाँ की हरियाली अपने चरम पर होती है और पूरा इलाका बेहद खूबसूरत दिखाई देता है, हालांकि इस दौरान ट्रेकिंग मार्ग फिसलनभरे हो सकते हैं।
गर्मी के महीने (मार्च से मई) अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं, लेकिन घने जंगलों की वजह से रास्तों में ठंडी हवा और पर्याप्त छाया मिलती रहती है, जिससे यात्रा सहज महसूस होती है।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुँचे?
भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग तक पहुँचना बेहद आसान है, क्योंकि यह सड़क, रेल और वायु—तीनों मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। सह्याद्रि पर्वतों की खूबसूरत घाटियों के बीच स्थित यह धाम पुणे से लगभग 125 किमी और मुंबई से करीब 220 किमी दूर है। यहाँ तक पहुँचने का सबसे सुगम और लोकप्रिय साधन सड़क मार्ग है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि भीमाशंकर का रास्ता बेहद सुंदर होने के साथ-साथ थोड़ा घुमावदार भी है। खासकर बरसात के मौसम में सड़कों पर फिसलन बढ़ जाती है, इसलिए सावधानी के साथ यात्रा करें।
📍 पता (Address) :
श्रीक्षेत्र भीमाशंकर, तालुका – खेड़, जिला – पुणे, पिनकोड: 410509, महाराष्ट्र, भारत।
✈️ हवाई मार्ग से
हवाई मार्ग से आने वालों के लिए पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भीमाशंकर के सबसे निकट स्थित एयरपोर्ट है। हवाई अड्डे से टैक्सी और बस सेवाएँ उपलब्ध रहती हैं, जो आपको सीधे भीमाशंकर ले जाती हैं।
🚆 रेल मार्ग से
जो यात्री ट्रेन से यात्रा करना चाहते हैं, उनके लिए पुणे जंक्शन नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन है। यह देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। पुणे पहुँचने के बाद यात्री टैक्सी या बस के माध्यम से भीमाशंकर तक आसानी से पहुँच सकते हैं।
🛣️ सड़क मार्ग से
पुणे से भीमाशंकर के लिए नियमित रूप से एस.टी. बसें चलती हैं, जो किफायती और सुविधाजनक विकल्प हैं। निजी वाहन से यात्रा करने वाले यात्री पुणे–मंचर–भीमाशंकर मार्ग का उपयोग कर सकते हैं, जहाँ घुमावदार घाट, घने जंगल और मनमोहक दृश्य यात्रा को और भी आनंददायक बना देते हैं।
भीमाशंकर मंदिर के इस विस्तृत आध्यात्मिक परिचय में हमने भीमाशंकर से जुड़ी पौराणिक कथा, मंदिर का प्राचीन इतिहास, घूमने का सर्वोत्तम समय, आसपास के प्रमुख तीर्थ और वहाँ तक पहुँचने के मार्ग—इन सभी पहलुओं को सरल भाषा में समझा। आशा है कि यह जानकारी आपकी भीमाशंकर यात्रा को और भी सार्थक, सहज और भक्तिमय बनाएगी। यदि आपको यह लेख उपयोगी लगा हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा करें और नीचे कमेंट में बताएं— आप अगला कौन-सा धार्मिक या आध्यात्मिक विषय पढ़ना चाहेंगे? भीमाशंकर मंदिर में आप कब दर्शन करने की योजना बना रहे हैं?
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