जयति जयति जग-निवास आरती – सार (भावार्थ)
“जयति जयति जग-निवास, शंकर सुखकारी” आरती भगवान शिव (शंकर) के सर्वव्यापक, करुणामय और कल्याणकारी स्वरूप का अत्यंत सुंदर एवं गहन चित्रण करती है। यह आरती शिव को संपूर्ण जगत के आधार, भय-नाशक और परम आनंददाता के रूप में नमन करती है। इसके प्रत्येक पद में शिव की महिमा, शक्ति, वैराग्य और भक्तवत्सलता का भाव स्पष्ट झलकता है।
आरती की शुरुआत में भगवान शिव को जग-निवास कहा गया है, अर्थात समस्त सृष्टि जिनमें निवास करती है। वे सुख प्रदान करने वाले शंकर हैं, जिनका स्मरण मात्र से ही मन और जीवन में शांति का संचार होता है। उनकी जय-जयकार से भक्त का हृदय श्रद्धा से भर उठता है।
आगे शिव को अजर, अमर, अजन्मा और अरूप बताया गया है। वे सच्चिदानंद स्वरूप हैं—सत् (सत्य), चित् (चेतना) और आनंद का पूर्ण रूप। वे ब्रह्मस्वरूप होकर हर जगह व्याप्त हैं और संसार के भय तथा जन्म-मरण के संकट को हरने वाले हैं।
शिव के दिव्य सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनके मस्तक पर चंद्रमा शोभित है, जटाओं में पवित्र गंगा विराजमान है और उनके तीन विशाल नेत्र हैं। वे कामदेव का दहन करने वाले हैं, अर्थात काम, वासना और अहंकार पर पूर्ण विजय रखने वाले महादेव हैं।
आरती में शिव की भक्तवत्सलता विशेष रूप से प्रकट होती है। वे भक्तों की रक्षा के लिए त्रिशूल धारण करते हैं, परंतु उनकी कृपा से वही कष्ट फूल के समान सहज हो जाते हैं। शिव भक्तों के हृदय के सभी दुःख, अशांति और भय को दूर कर उन्हें स्थिर शांति प्रदान करते हैं।
भगवान शिव के चरणकमल को निर्मल और कल्याणकारी बताया गया है। उनके चरणों का स्मरण सभी कामनाओं को सफल करता है और भक्त को भक्ति तथा मुक्ति दोनों का वरदान देता है। शिव माया और भ्रम को नष्ट कर सच्चे ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं।
आरती में शिव को कार्तिकेय और गणेश के पिता, तथा पार्वती (हिमालय पुत्री) के साथ कैलास पर्वत पर विराजमान बताया गया है। वे अकल और कलाधारी हैं, अर्थात पूर्ण ज्ञान और सभी शक्तियों के अधिपति हैं।
शिव के वैरागी और रौद्र रूप का भी सुंदर चित्रण है—भस्म, सर्प, मुण्डमाला, कपाल, सिंहचर्म और हस्तिचर्म धारण करने वाले शिव, डमरू के साथ नृत्य करते हुए संसार की असारता का संदेश देते हैं। यह रूप सिखाता है कि भोग और वैभव क्षणिक हैं, सत्य केवल शिव-तत्त्व है।
अंत में शिव को आशुतोष कहा गया है—जो शरणागतों को तुरंत अपनाते हैं। वे दीन-हीन और अशरण लोगों के सच्चे सहारा हैं, दुःखों का नाश करने वाले और हर प्रकार से कल्याण करने वाले त्रिपुरारी हैं।
निष्कर्ष
“जयति जयति जग-निवास” आरती भगवान शिव के सर्वशक्तिमान, करुणामय और मोक्षदायक स्वरूप को अत्यंत सरल और भावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत करती है। यह आरती भक्त को भय, भ्रम और दुःख से मुक्त कर शांति, भक्ति और आत्मिक स्थिरता की ओर ले जाती है। जो श्रद्धा से इस आरती का गान करता है, उसके जीवन में शिवकृपा से सुख, संतुलन और कल्याण का प्रकाश फैलता है।
🔱 हर हर महादेव | ॐ नमः शिवाय 🔱
जयति जयति जग-निवास, शंकर सुखकारी – Jayati Jayati Jag Niwas Shankar Sukhkari
जयति जयति जग-निवास,शंकर सुखकारी॥
जयति जयति जग-निवास,शंकर सुखकारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
अजर अमर अज अरूप,सत चित आनन्दरूप।
व्यापक ब्रह्मस्वरूप,भव! भव-भय-हारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
शोभित बिधुबाल भाल,सुरसरिमय जटाजाल।
तीन नयन अति विशाल,मदन-दहन-कारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
भक्तहेतु धरत शूल,करत कठिन शूल फूल।
हियकी सब हरत हूलअचल शान्तिकारी॥
जयति जयति जग-निवास…॥
अमल अरुण चरण कमलसफल करत काम सकल।
भक्ति-मुक्ति देत विमल,माया-भ्रम-टारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
कार्तिकेययुत गणेश,हिमतनया सह महेश।
राजत कैलास-देश,अकल कलाधारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
भूषण तन भूति ब्याल,मुण्डमाल कर कपाल।
सिंह-चर्म हस्ति खाल,डमरू कर धारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
अशरण जन नित्य शरण,आशुतोष आर्तिहरण।
सब बिधि कल्याण-करणजय जय त्रिपुरारी॥
जयति जयति जग-निवास…..॥
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