भगवान गंगाधर आरती का सार (भावार्थ)
भगवान गंगाधर आरती शिव की महिमा, करुणा, सौंदर्य, लीला और भक्तवत्सलता को अत्यंत काव्यात्मक एवं दिव्य रूप में प्रस्तुत करती है। आरती का प्रत्येक पद शिव को जगदीश्वर, पालनकर्ता और करुणामय प्रभु के रूप में स्मरण करता है, जिनसे भक्त निरंतर रक्षा और कृपा की कामना करता है।
इस आरती में भगवान शिव को कैलास पर्वत पर स्थित, कल्पवृक्षों और सघन वनों से घिरे हुए दर्शाया गया है। वहां मधुमक्खियों का गुंजन, कोयल का मधुर स्वर और हंसों की क्रीड़ा एक अलौकिक वातावरण रचते हैं। इसी दिव्य लोक में भगवान शिव आनंदपूर्वक नृत्य और लीलाओं में मग्न दिखाई देते हैं, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि में उल्लास का संचार होता है।
आगे वर्णन आता है कि मणियों से सुसज्जित भवन में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। इंद्र, देवगण और अन्य दिव्य शक्तियाँ नतमस्तक होकर उनकी सेवा करती हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं, किन्नर मधुर गायन करते हैं और मृदंग, वेणु व डमरू के नाद से पूरा वातावरण आध्यात्मिक आनंद से भर उठता है। यह दृश्य शिव के नटराज स्वरूप को सजीव कर देता है।
आरती में शिव के नृत्य का अत्यंत सूक्ष्म और लयात्मक वर्णन है—घुंघरुओं की झंकार, पैरों की थाप, डमरू की ताल और अंगुलियों की गति से यह स्पष्ट होता है कि शिव का तांडव और लास्य सृष्टि के संचालन का प्रतीक है।
इसके पश्चात भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है— पंचानन, त्रिनेत्रधारी, चंद्रमौलि, विषकंठ, जटाजूट से प्रवाहित गंगा, भस्म-भूषित शरीर, मुण्डमाला, नाग-उपवीत, त्रिशूल, डमरू और पिनाक धारण किए हुए शिव संहार और करुणा दोनों के अधिष्ठाता हैं। माता पार्वती उनके वाम अंग में विराजमान होकर अर्धनारीश्वर रूप को पूर्ण करती हैं, जो शक्ति और शिव के अभिन्न एकत्व का प्रतीक है।
आरती के अंतिम भाग में बताया गया है कि ब्रह्मा स्वयं वेद मंत्रों से शिव की आरती करते हैं। जो भक्त इस आरती को ध्यानपूर्वक, श्रद्धा और भक्ति से नित्य पढ़ता या सुनता है, वह शिव की कृपा से भवबंधन से मुक्त होकर शिवसायुज्य को प्राप्त करता है।
सार रूप में, यह आरती भगवान गंगाधर को केवल संहारक नहीं, बल्कि
- करुणामय पालनकर्ता
- नृत्य, सौंदर्य और आनंद के स्रोत
- शक्ति सहित पूर्ण ब्रह्म
- और भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाले महादेव
के रूप में स्थापित करती है। यह आरती मन को शांति, भक्ति और शिव-चेतना से भर देने वाली एक दिव्य स्तुति है।
🙏 ॐ हर हर हर महादेव 🙏
भगवान गंगाधर आरती – Om Jai Gangadhar – ॐ जय गंगाधर
ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने।
गुन्जति मधुकरपुन्जे कुन्जवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हन्सावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
तस्मिन्ल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भुषारज्जित निजमीशम्।
इन्द्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत हृदये मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वरसहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदङ्ग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अङ्गुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
कर्पूरघुतिगौरं पन्चाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणम्॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
शङ्खनिनदम् कृत्वा झल्लरि नादयते।
नीराजयते ब्रह्मा वेद-ऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
सन्गतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
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🕉️ ॐ जय गंगाधर | हर हर महादेव 🕉️