भगवान कैलासवासी आरती का सार (भावार्थ)
भगवान कैलासवासी आरती महादेव शिव के दिव्य कैलास-स्वरूप, उनकी लीलाओं, करुणा और सर्वशक्तिमत्ता को अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण शब्दों में प्रकट करती है। इस आरती में कैलास पर्वत को शिवलोक के रूप में चित्रित किया गया है, जहाँ स्वयं भगवान शिव माता पार्वती के साथ अर्धनारीश्वर रूप में सदा विराजमान हैं।
आरती के अनुसार, कैलास पर्वत पर नंदी और भृंगी नृत्य करते हैं, देवता ध्यानमग्न रहते हैं और संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आनंद से भरा हुआ है। शीतल, सुगंधित वायु बहती है, जिससे शिव का अविनाशी और शांत स्वरूप और भी मनोहारी बन जाता है। गंधर्व मधुर सप्त स्वरों में राग-रागिनियों का गान करते हैं, जो कैलास को एक दिव्य संगीतलोक बना देता है।
इस पावन धाम में यक्ष, रक्षक, भैरव और वनवासी जीव निर्भय होकर विचरण करते हैं। कोयल की मधुर कूक और भ्रमरों की गुंजार संपूर्ण प्रकृति को शिवमय कर देती है। कल्पवृक्ष और पारिजात जैसे दिव्य वृक्ष शोभायमान हैं तथा कामधेनु से निरंतर दुग्ध-वर्षा होती रहती है, जो समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक है।
आरती में कैलास की प्राकृतिक महिमा का भी वर्णन है—सूर्यकांत और चंद्रकांत के समान पर्वत, हिमराशियाँ और ऐसी भूमि जहाँ छहों ऋतुएँ सदा संतुलित रूप में विराजमान रहती हैं। यहाँ प्रकृति स्वयं शिव की दासी बनकर उनकी सेवा करती है।
ऋषि, मुनि, देवता और दनुज सभी शिव की निरंतर सेवा और स्तुति करते हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी दिन-रात महादेव के स्वरूप का दर्शन करते रहते हैं। भगवान शंकर को ऋद्धि-सिद्धि का दाता, सत्-चित्-आनंद स्वरूप बताया गया है, जिनका स्मरण मात्र करने से ही कठिन से कठिन काल और यम के बंधन कट जाते हैं।
आरती में यह संदेश भी दिया गया है कि जो भक्त प्रेमपूर्वक त्रिशूलधर भगवान शिव का नाम निरंतर जपता है, उसके जीवन से सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं और वह जन्म-जन्मांतर तक शिवचरणों की प्राप्ति करता है।
अंत में भक्त भगवान कैलासवासी और काशीवासी शिव से विनम्र प्रार्थना करता है कि वे उसे अपना सेवक मानकर शरण दें, उसके अवगुणों को ढक लें और सभी अपराध क्षमा करें। यह आरती पूर्ण शरणागति, भक्ति और करुणा की भावना से ओत-प्रोत है।
सार रूप में, यह आरती भगवान शिव को कैलास के अधिपति , प्रकृति और देवताओं के स्वामी , ऋद्धि-सिद्धि के दाता और दयालु, क्षमाशील शरणदाता के रूप में स्थापित करती है। यह आरती मन को शांति, श्रद्धा और शिव-भक्ति से भर देने वाली एक अत्यंत दिव्य स्तुति है।
🙏 हर हर महादेव | जय कैलासवासी शंकर 🙏
भगवान कैलासवासी आरती – शीश गंग अर्धन्ग पार्वती – Arati Bhagavana Kailasavasi
शीश गंग अर्धन्ग पार्वतीसदा विराजत कैलासी।
नन्दी भृन्गी नृत्य करत हैं,धरत ध्यान सुर सुखरासी॥
शीतल मन्द सुगन्ध पवन बहबैठे हैं शिव अविनाशी।
करत गान गन्धर्व सप्त स्वरराग रागिनी मधुरासी॥
यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत,बोलत हैं वनके वासी।
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर,भ्रमर करत हैं गुन्जा-सी॥
कल्पद्रुम अरु पारिजात तरुलाग रहे हैं लक्षासी।
कामधेनु कोटिन जहँ डोलतकरत दुग्ध की वर्षा-सी॥
सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित,चन्द्रकान्त सम हिमराशी।
नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभितसेवत सदा प्रकृति-दासी॥
ऋषि-मुनि देव दनुज नित सेवत,गान करत श्रुति गुणराशी।
ब्रह्मा-विष्णु निहारत निसिदिनकछु शिव हमकूँ फरमासी॥
ऋद्धि सिद्धिके दाता शंकरनित सत् चित् आनँदराशी।
जिनके सुमिरत ही कट जातीकठिन काल-यमकी फाँसी॥
त्रिशूलधरजीका नाम निरन्तरप्रेम सहित जो नर गासी।
दूर होय विपदा उस नर कीजन्म-जन्म शिवपद पासी॥
कैलासी काशी के वासीअविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन कोअपनो जान कृपा कीजो॥
तुम तो प्रभुजी सदा दयामयअवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकरकिंकरकी विनती सुनियो॥
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🔱 हर हर महादेव | ॐ नमः शिवाय 🔱