ॐ जय जगदीश हरे आरती का सार (भावार्थ)
ॐ जय जगदीश हरे आरती सनातन धर्म की सर्वाधिक प्रचलित और भावपूर्ण आरतियों में से एक है। यह आरती जगदीश्वर—अर्थात् समस्त सृष्टि के पालनकर्ता, रक्षक और नियंता—की महिमा का गान करती है। इसमें भक्त का हृदय, उसकी पीड़ा, आस्था और पूर्ण समर्पण अत्यंत सरल और प्रभावशाली शब्दों में प्रकट होता है।
इस आरती का मूल भाव यह है कि ईश्वर अपने भक्तों के सभी कष्टों को क्षण मात्र में दूर करने वाले हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनका ध्यान करता है, उसकी मानसिक व्यथा समाप्त होती है, घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है तथा शारीरिक कष्ट भी मिट जाते हैं।
आरती में भक्त यह स्वीकार करता है कि भगवान ही उसके माता-पिता हैं और उनके अतिरिक्त संसार में कोई और सहारा नहीं है। वह पूर्ण विश्वास के साथ कहता है कि प्रभु के बिना कोई दूसरा ऐसा नहीं, जिस पर वह आशा रख सके। यह पंक्तियाँ भक्त और भगवान के बीच के आत्मीय संबंध को दर्शाती हैं।
इस आरती में भगवान को पूर्ण परमात्मा, अंतर्यामी और पारब्रह्म बताया गया है—जो हर प्राणी के हृदय की बात जानते हैं और सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। वे करुणा के सागर हैं, पालनकर्ता हैं और अपने सेवकों पर सदैव कृपा बरसाते हैं। भक्त अपनी सीमित बुद्धि और स्वार्थ को स्वीकार करते हुए प्रभु से करुणा और मार्गदर्शन की प्रार्थना करता है।
आरती का एक महत्वपूर्ण भाव यह भी है कि भगवान अगोचर हैं—इंद्रियों से परे—फिर भी सबके प्राणों के स्वामी हैं। भक्त अपनी दुर्बलता स्वीकार करते हुए उनसे मिलने का मार्ग पूछता है और अपनी कुमति को दूर करने की विनती करता है।
अंत में भक्त प्रभु को दीनबंधु, दुःखहर्ता और रक्षक मानकर उनके द्वार पर शरणागत होता है। वह कामना करता है कि ईश्वर उसके विषय-विकार और पापों को नष्ट करें, हृदय में श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाएँ तथा उसे संतों की सेवा की प्रेरणा दें।
आरती का निष्कर्ष यह है कि जो कोई श्रद्धा और भक्ति से श्री जगदीश जी की आरती का गान करता है, उसे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह आरती हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, विनम्रता और विश्वास के साथ किया गया स्मरण ही जीवन के समस्त कष्टों का समाधान है।
🙏 ॐ जय जगदीश हरे! 🙏
ॐ जय जगदीश हरे आरती – Om Jai Jagdish Hare Aarti
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
जो ध्यावे फल पावे,
दुःख बिनसे मन का,
स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं किसकी,
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख फलकामी,
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी रक्षक तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा ॥
श्री जगदीशजी की आरती,
जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,
सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥
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जय श्री जगदीश! 🙏