श्री पुरुषोत्तम देव की आरती – Shri Purushottam Dev Ki Aarti

श्री पुरुषोत्तम देव की आरती का सार (विस्तृत)

श्री पुरुषोत्तम देव की आरती भगवान विष्णु के उस सर्वोच्च स्वरूप का गुणगान करती है, जिन्हें समस्त महीनों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास का अधिपति माना गया है। आरती की शुरुआत में प्रभु की असीम महिमा का वर्णन किया गया है, जिनकी सेवा स्वयं देवता, ऋषि और मुनि भी करते हैं। यह दर्शाया गया है कि भगवान पुरुषोत्तम न केवल पूज्य हैं, बल्कि भक्तों के जीवन को पवित्र करने वाले कृपालु स्वामी भी हैं।

आरती में बताया गया है कि जब भगवान हरि की विशेष कृपा हुई, तब उन्होंने श्रीकृष्ण रूप धारण किया और संसार का कल्याण किया। जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक उनकी पूजा करता है, उसे सर्वसुख की प्राप्ति होती है। प्रभु की उपासना से शरीर और मन दोनों निर्मल हो जाते हैं तथा जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

इस आरती में विभिन्न भक्तों के उदाहरणों के माध्यम से प्रभु की करुणा और न्याय का वर्णन किया गया है। मेधावी मुनि की कन्या द्रौपदी की कथा से यह स्पष्ट होता है कि जो नारी प्रभु में अटूट विश्वास रखती है, वही संसार में सम्मान की पात्र बनती है। इसी प्रकार, विप्र सुदेव की सेवा और भक्ति से मृत पुत्र का पुनः जीवन प्राप्त होना यह दर्शाता है कि भगवान पुरुषोत्तम असंभव को भी संभव कर देते हैं।

राजा दृढ़धन्वा पर की गई प्रभु की कृपा यह सिखाती है कि व्रत, नियम और विधिपूर्वक की गई भक्ति जीवन को सफल बना देती है। वहीं, शूद्र मणिग्रीव जैसे पापी व्यक्ति द्वारा किए गए दीपदान से यह संदेश मिलता है कि सच्ची श्रद्धा और सेवा से कोई भी व्यक्ति पवित्र बन सकता है और हरि धाम को प्राप्त कर सकता है।

आरती का निष्कर्ष यह बताता है कि जो भक्त पुरुषोत्तम व्रत और पूजा को पूरे मन से करता है, वह इस संसार रूपी भवसागर को सहजता से पार कर लेता है। भगवान पुरुषोत्तम अपने भक्तों को न केवल सांसारिक सुख देते हैं, बल्कि अंततः उन्हें मोक्ष का मार्ग भी दिखाते हैं।

श्री पुरुषोत्तम देव की आरती – Shri Purushottam Dev Ki Aarti

जय पुरुषोत्तम देवा,स्वामी जय पुरुषोत्तम देवा।
महिमा अमित तुम्हारी,सुर-मुनि करें सेवा॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

सब मासों में उत्तम,तुमको बतलाया।
कृपा हुई जब हरि की,कृष्ण रूप पाया॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

पूजा तुमको जिसनेसर्व सुक्ख दीना।
निर्मल करके काया,पाप छार कीना॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

मेधावी मुनि कन्या,महिमा जब जानी।
द्रोपदि नाम सती से,जग ने सन्मानी॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

विप्र सुदेव सेवा कर,मृत सुत पुनि पाया।
धाम हरि का पाया,यश जग में छाया॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

नृप दृढ़धन्वा पर जब,तुमने कृपा करी।
व्रतविधि नियम और पूजा,कीनी भक्ति भरी॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

शूद्र मणीग्रिव पापी,दीपदान किया।
निर्मल बुद्धि तुम करके,हरि धाम दिया॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥

पुरुषोत्तम व्रत-पूजाहित चित से करते।
प्रभुदास भव नद सेसहजही वे तरते॥

जय पुरुषोत्तम देवा॥


यदि आपको श्री पुरुषोत्तम देव की आरती का यह भावपूर्ण सार उपयोगी और प्रेरणादायक लगा हो, तो कृपया इसे लाइक करें , अपने परिवार व मित्रों के साथ शेयर करें, और नीचे कमेंट में अपनी श्रद्धा व अनुभव अवश्य लिखें। आपकी सहभागिता से यह दिव्य भक्ति संदेश अधिक से अधिक भक्तों तक पहुँचेगा।
जय श्री पुरुषोत्तम देव! 🕉️✨

Leave a Comment