गोवर्धन महाराज जी की आरती का – सार (भावार्थ)
इस आरती में श्री गोवर्धन महाराज को साक्षात भगवान के रूप में नमन किया गया है। उन्हें राजसी स्वरूप में दर्शाते हुए कहा गया है कि उनके मस्तक पर दिव्य मुकुट सुशोभित है, जो उनकी ईश्वरीय सत्ता और महिमा का प्रतीक है। यह मुकुट यह दर्शाता है कि गिरिराज केवल पर्वत नहीं, बल्कि स्वयं भगवान का स्वरूप हैं।
आरती में बताया गया है कि गोवर्धन महाराज को पान, पुष्प और दूध की धार अर्पित की जाती है। ये सभी अर्पण भक्तों की निष्कलुष भक्ति, प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक हैं। दूध की धार विशेष रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं और ब्रज संस्कृति से जुड़ी हुई है, जो गोवर्धन पूजा के महत्व को और गहराई देती है।
यह भी कहा गया है कि गोवर्धन महाराज की सात कोस की परिक्रमा अत्यंत पुण्यदायी है। परिक्रमा के मार्ग में स्थित चकलेश्वर विश्राम भक्तों के लिए आध्यात्मिक शांति और विश्राम का स्थान है। यह संकेत करता है कि गिरिराज की परिक्रमा मात्र शारीरिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मिक साधना है।
आरती में गोवर्धन महाराज के दिव्य श्रृंगार का सुंदर वर्णन मिलता है—उनके गले में कंठा, ठोड़ी पर हीरा-लाल और कानों में चमकते कुंडल। यह अलंकरण उनकी भव्यता, सौंदर्य और देवत्व को दर्शाता है। उनकी झांकी को विशाल और दिव्य बताया गया है, जो भक्तों के मन को आनंद और भक्ति से भर देती है।
अंत में, भक्त गिरिराज धरण प्रभु की शरण में आकर विनती करता है कि वे उसकी नैया को संसार-सागर से पार लगाएँ। यह पंक्तियाँ गोवर्धन महाराज को रक्षक, पालनहार और उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो अपने भक्तों की हर विपत्ति को हर लेते हैं।
यह आरती हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, सरल भक्ति और गोवर्धन महाराज की शरणागति से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और भक्त को आध्यात्मिक शांति व कृपा प्राप्त होती है। गोवर्धन महाराज न केवल ब्रजभूमि के रक्षक हैं, बल्कि हर भक्त के संकटमोचक भी हैं।
श्री गोवर्धन महाराज जी की आरती – Shri Govardhan Maharaj Ki Aarti
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े,तोपे चढ़े दूध की धार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरी सात कोस की परिकम्मा,चकलेश्वर है विश्राम।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ,ठोड़ी पे हीरा लाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ,तेरी झाँकी बनी विशाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण,करो भक्त का बेड़ा पार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
श्री गोवर्धन महाराज की यह पावन आरती हमें सच्ची भक्ति, शरणागति और विश्वास का मार्ग दिखाती है। गिरिराज प्रभु की कृपा से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है।
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