विश्वकर्मा जी की आरती – प्रभु श्री विश्वकर्मा, घर आवो प्रभु विश्वकर्मा – Vishwakarma Ji Ki Aarti

श्री विश्वकर्मा आरती का – सार (भावार्थ)

विश्वकर्मा जी की आरती सृजन, शिल्पकला, कर्मयोग और ईश्वरीय कृपा का अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक भाव प्रस्तुत करती है। आरती का सार यह बताता है कि भगवान विश्वकर्मा केवल देवताओं के शिल्पकार ही नहीं, बल्कि भक्तों के कष्ट हरने वाले, परिश्रम को सफलता में बदलने वाले और जीवन को अर्थ देने वाले दिव्य देवता हैं।

आरती की शुरुआत में भक्त प्रभु विश्वकर्मा से अपने घर पधारने की प्रार्थना करता है। यह भाव दर्शाता है कि जहाँ भगवान विश्वकर्मा की कृपा होती है, वहाँ समृद्धि, सृजन और समाधान स्वतः आ जाते हैं। सुदामा की विनय सुनकर कंचन महल बनाने का प्रसंग यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति और विनम्रता के आगे प्रभु कभी खाली हाथ नहीं लौटाते। वे दुखियों के दुख हरकर उन्हें आवश्यक साधन और सम्मान प्रदान करते हैं।

आगे आरती में भगवान श्रीकृष्ण का प्रसंग आता है, जहाँ उनके निवेदन पर प्रभु विश्वकर्मा ने द्वारिकापुरी का निर्माण किया। यह केवल एक नगरी नहीं, बल्कि दिव्य सुरक्षा, सौंदर्य और वैभव का प्रतीक है। ग्वाल-बालों की रक्षा कर प्रभु ने यह सिद्ध किया कि उनका शिल्प केवल निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि रक्षा और मर्यादा की रक्षा से भी जुड़ा है।

भगवान श्रीराम के समय रामेश्वर से लंका तक सेतु निर्माण का उल्लेख प्रभु विश्वकर्मा की अद्भुत रचनात्मक शक्ति को दर्शाता है। उनके द्वारा रचित सेतु के कारण वानर सेना समुद्र पार कर सकी और लंका पर विजय संभव हुई। यह प्रसंग यह संदेश देता है कि सही योजना, ज्ञान और कर्म से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

आरती के अंतिम भाग में भक्त प्रभु से शिल्प विद्या का प्रकाश देने की प्रार्थना करता है। यहाँ शिल्प विद्या केवल कारीगरी नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल, नवाचार और ईमानदार परिश्रम का प्रतीक है। भक्त चाहता है कि प्रभु की कृपा से उसका जीवन उपयोगी, सफल और सार्थक बने।

समग्र सार

श्री विश्वकर्मा जी की यह आरती हमें यह सिखाती है कि सृजन और निर्माण भी ईश्वर की उपासना का ही रूप हैं। जो व्यक्ति मेहनत, कौशल और श्रद्धा के साथ अपने कार्य को करता है, उस पर भगवान विश्वकर्मा की विशेष कृपा बनी रहती है। यह आरती कर्मयोग, आत्मसम्मान और सृजनशील जीवन की प्रेरणा देती है—यही इसका गहन आध्यात्मिक और व्यावहारिक सार है।

विश्वकर्मा जी की आरती – Vishwakarma Ji Ki Aarti

प्रभु श्री विश्वकर्मा , घर आवोप्रभु विश्वकर्मा।
सुदामा की विनय सुनी, और कंचन महल बनाये।
सकल पदारथ देकर, प्रभु जी दुखियों के दुख टारे॥

प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो…॥

विनय करी भगवान कृष्ण ने, द्वारिकापुरी बनाओ।
ग्वाल बालों की रक्षा की, प्रभु की लाज बचायो॥

प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो…॥

रामचन्द्र ने पूजन की, तब सेतु बांध रचि डारो।
सब सेना को पार किया, प्रभु लंका विजय करावो॥

प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो…॥

श्री कृष्ण की विजय सुनो, प्रभु आके दर्श दिखावो।
शिल्प विद्या का दो प्रकाश, मेरा जीवन सफल बनावो॥

प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो…॥


यदि विश्वकर्मा जी की यह पावन आरती — “प्रभु श्री विश्वकर्मा, घर आवो प्रभु विश्वकर्मा” — और उसका सार आपके मन को प्रेरित कर सका हो, तो कृपया इसे अपने परिवार, मित्रों और कार्यस्थल के साथियों के साथ शेयर अवश्य करें, ताकि सृजन, कर्मयोग और शिल्प विद्या का यह दिव्य संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके।

आपके विचार, अनुभव और भावनाएँ हमारे लिए बहुत मूल्यवान हैं—नीचे कमेंट करके अवश्य बताएँ कि भगवान विश्वकर्मा जी की भक्ति और इस आरती से आपको अपने कार्य और जीवन में क्या प्रेरणा मिली। यदि आप ऐसी ही आरती, भजन, कथा और आध्यात्मिक लेख पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे साथ जुड़े रहें और कर्म, कौशल व सृजन के इस पावन मार्ग में सहभागी बनें।

🙏 प्रभु श्री विश्वकर्मा जी आप सभी को उत्तम विद्या, कुशलता, सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।

Leave a Comment