श्री ब्रह्मा जी की आरती – Shri Brahma Ji Ki Aarti

आरती श्री ब्रह्मा जी का – सार (भावार्थ)

श्री ब्रह्मा जी की आरती सृष्टि-रचना, करुणा, संरक्षण और आत्मिक आश्रय के भाव को अत्यंत कोमल और गूढ़ शब्दों में व्यक्त करती है। इस आरती का सार यह बताता है कि भगवान ब्रह्मा जी केवल संसार के रचयिता ही नहीं, बल्कि जीवमात्र के माता-पिता, मित्र, सहायक और एकमात्र सच्चे सहारे भी हैं।

आरती की शुरुआत में भक्त यह स्वीकार करता है कि ब्रह्मा जी ही उसके माता-पिता, स्वामी और सखा हैं। जिनका संसार में कोई और आधार नहीं होता, उनके लिए प्रभु ब्रह्मा ही रक्षक बनते हैं। यह पंक्ति ईश्वर की निरपेक्ष करुणा और सर्वव्यापक संरक्षण को दर्शाती है।

आगे कहा गया है कि प्रभु ब्रह्मा सदा सभी प्रकार से सुख प्रदान करने वाले हैं और अज्ञान, दुःख व नकारात्मक प्रवृत्तियों का नाश करने वाले हैं। वे पूरे जगत का पालन करते हैं और उनके हृदय में असीम दया और वात्सल्य भरा हुआ है। यह भाव ब्रह्मा जी को सृष्टि के संतुलन और व्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करता है।

भक्त विनम्रता से स्वीकार करता है कि हम चाहे प्रभु को भूल भी जाएँ, लेकिन ब्रह्मा जी कभी अपने भक्तों की सुध नहीं भूलते। उनके उपकारों की कोई सीमा नहीं है—वे हर क्षण नए-नए रूपों में जीवों पर कृपा बरसाते रहते हैं। यह ईश्वर की अखंड कृपा और अनंत दानशीलता का सुंदर चित्रण है।

आरती में आगे प्रभु ब्रह्मा की महिमा को अत्यंत विशाल बताया गया है, जिसे समझ पाना सामान्य बुद्धि के लिए कठिन है। वे शुभता, शांति और प्रेम के धाम हैं, जो भक्त के मन-मंदिर को प्रकाश से भर देते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रह्मा जी केवल बाहरी सृष्टि ही नहीं, बल्कि अंतःकरण की चेतना को भी प्रकाशित करते हैं।

अंतिम पंक्तियों में भक्त यह स्वीकार करता है कि इस जीवन का वास्तविक जीवन स्वयं प्रभु ब्रह्मा हैं और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके अतिरिक्त अब कोई और सहारा नहीं बचता। यह पूर्ण शरणागति और आत्मसमर्पण का भाव इस आरती को अत्यंत भावपूर्ण बना देता है।

समग्र सार

श्री ब्रह्मा जी की यह आरती हमें यह सिखाती है कि ईश्वर केवल सृष्टि का आरंभ करने वाला नहीं, बल्कि हर क्षण जीवन को संभालने वाला आधार भी है। उनकी भक्ति से मन में शांति, जीवन में संतुलन और आत्मा में प्रकाश उत्पन्न होता है। यही इस आरती का गहन आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी सार है।

श्री ब्रह्मा जी की आरती – Shri Brahma Ji Ki Aarti

पितु मातु सहायक स्वामी सखा,
तुम ही एक नाथ हमारे हो।
जिनके कुछ और आधार नहीं,
तिनके तुम ही रखवारे हो।

सब भाँति सदा सुखदायक हो,
दुःख निर्गुण नाशन हारे हो।
प्रतिपाल करो सिगरे जग को,
अतिशय करुणा उर धारे हो।

भुलि हैं हम तो तुमको,
तुम तो हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो।
उपकारन को कछु अन्त नहीं,
छिन ही छिन जो विस्तारे हो।

महाराज महा महिमा तुम्हरी,
मुझसे बिरले बुधवारे हो।
शुभ शान्ति निकेतन प्रेमनिधि,
मन मन्दिर के उजियारे हो।

इस जीवन के तुम जीवन हो,
इन प्राणन के तुम प्यारे हो।
तुम सों प्रभु पाय ‘प्रताप’ हरि,
केहि के अब और सहारे हो।


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🙏 जय श्री ब्रह्मा देव! प्रभु आप सभी के जीवन में ज्ञान, विवेक, शांति और सद्मार्ग का प्रकाश बनाए रखें।

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