श्री गंगा जी की आरती – “जय जय भगीरथनन्दिनि” का सार (भावार्थ)
श्री गंगा जी की आरती माँ गंगा की दिव्य महिमा, पवित्रता और मोक्षदायिनी शक्ति का गहन स्तुतिगान है। इसमें गंगा माता को भगीरथ की पुत्री, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और नागों द्वारा वंदित देवी के रूप में नमन किया गया है। माँ गंगा न केवल धरती की जीवनरेखा हैं, बल्कि पापों का नाश करने वाली और आत्मा को शुद्ध करने वाली त्रिपथगामिनी शक्ति भी हैं।
आरती में बताया गया है कि माँ गंगा का उद्गम भगवान विष्णु के चरणकमलों से हुआ और वे भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित होकर धरती पर अवतरित हुईं। इसी कारण वे स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों लोकों में प्रवाहित होकर समस्त सृष्टि को पवित्र करती हैं। उनका जल अमृत समान है, जो जीवन के तीनों ताप—दैहिक, दैविक और भौतिक—को शांत करता है।
माँ गंगा का प्रवाह निर्मल, शीतल और विशाल है। उनकी लहरें भंवरों और तरंगों से सुसज्जित होकर भी भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं। आरती में यह भाव भी प्रकट होता है कि उनके तट पर होने वाला पूजन, दान और स्मरण भवसागर के भार को हल्का कर देता है और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
गंगा माता की करुणा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है—उनके तट पर रहने वाले पक्षी, पशु, कीट-पतंग, जलचर और तपस्वी सभी उनकी समान रूप से पालना पाते हैं। वे समस्त जीवों की रक्षक और पालनकर्ता हैं। उनका जल जीवनदायी है और उनका सान्निध्य प्रकृति को भी पवित्र बनाता है।
आरती में तुलसी-दल से सजे गंगा-तट और रघुवंश के वीरों के स्मरण का उल्लेख यह दर्शाता है कि माँ गंगा धर्म, मर्यादा और भक्ति की प्रेरणा हैं। जो भक्त उनके तट का स्मरण करता है या उनका ध्यान करता है, उसे मोह, अज्ञान और पापों से मुक्ति प्राप्त होती है।
सार रूप में, यह आरती माँ गंगा को एक ऐसी दिव्य माता के रूप में प्रस्तुत करती है जो— पापों का नाश करती हैं, भक्ति और मोक्ष का मार्ग दिखाती हैं, समस्त सृष्टि का पालन करती हैं और भक्तों को शांति, शुद्धता व कल्याण प्रदान करती हैं माँ गंगा का स्मरण और स्तुति जीवन को पवित्र, शांत और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बना देती है।
श्री गंगा जी की आरती – Shri Gangaji ki Aarti – जय जय भगीरथनन्दिनि
जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि,
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि, जय जह्नुबालिका।
जय जय भगीरथनन्दिनि…..।
विष्णु-पद-सरोजजासि, ईस-सीस पर बिभासि,
त्रिपथगासि, पुन्यरासि, पाप-छालिका॥
जय जय भगीरथनन्दिनि…।
बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर बर बिभन्गतरतरन्ग-मालिका।
जय जय भगीरथनन्दिनि…।
पुरजन पूजोपहार, सोभितससि धवल धार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्प थालिका॥
जय जय भगीरथनन्दिनि…।
निज तट बासी बिहन्ग, जल-थल-चर पसु-पतन्ग,
कीट, जटिल तापस, सब सरिस पालिका।
जय जय भगीरथनन्दिनि…।
तुलसी तव तीर तीर, सुमिरत रघुवन्स-बीर,
बिचरत मति देहिमोह-महिष-कालिका॥
जय जय भगीरथनन्दिनि…।
जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि,
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि, जय जह्नुबालिका।
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जय माँ गंगे | हर हर गंगे |