जानकी माता आरती – Janaki Mata Aarti

जानकी माता की आरती – सार (भावार्थ)

जानकी माता आरती माता सीता के दिव्य, पवित्र और करुणामयी स्वरूप का भावपूर्ण स्तवन है। इस आरती में उन्हें श्री जनकनन्दिनी, रामप्रिया, प्रेम और त्याग की मूर्ति के रूप में स्मरण किया गया है। माता जानकी को कमल की कोमल कली के समान बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के हृदय में मधुर सुवास की तरह विराजमान हैं। उनका जीवन संपूर्ण रूप से धर्म, मर्यादा और नारी-शक्ति का आदर्श है।

आरती में माता सीता के अंतःकरण की पवित्रता और बाह्य सौंदर्य का सुंदर चित्रण मिलता है। वे भीतर से सांवली-सी सरलता और बाहर से उज्ज्वल गौरवर्णा हैं—अर्थात् उनका मन निष्कलुष, प्रेममय और निर्मल है। माता जानकी का स्वरूप समस्त मंगलों को प्रदान करने वाला, शुभ फल देने वाला और जीवन को सफल बनाने वाला बताया गया है।

इस आरती में माता को राम-प्रेम की रस-राशि कहा गया है। वे किशोरी भाव से श्रीराम के प्रेम में रमी हुई हैं और उनके नेत्र ऐसे हैं जो प्रियतम के मन को बाँध लेने वाले हैं। माता सीता भगवान राम के मन की विश्राम-स्थली हैं—जहाँ प्रभु को शांति, स्नेह और संतुलन प्राप्त होता है। इससे दाम्पत्य प्रेम की सर्वोच्च मर्यादा और आध्यात्मिक एकता का बोध होता है।

आगे माता जानकी को रूप, रस और गुणों की निधि तथा जगत की स्वामिनी कहा गया है। वे प्रेम में प्रवीण हैं और राम-भक्ति में अभिराम हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन त्याग, सहनशीलता और सेवा का अनुपम उदाहरण है। आरती यह भी बताती है कि माता सीता का सान्निध्य जीवन को धन्य बनाता है और हरि-भक्ति का परम धन प्रदान करता है।

समग्र रूप से, जानकी माता की यह आरती भक्तों के हृदय में श्रद्धा, प्रेम, पवित्रता और धैर्य का संचार करती है। जो भक्त भावपूर्वक इस आरती का गायन करते हैं, उनके जीवन में शांति, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह आरती नारी-शक्ति, पतिव्रता धर्म और राम-सीता के आदर्श प्रेम की दिव्य अनुभूति कराती है।

जानकी माता आरती – Janaki Mata Aarti

आरती कीजै श्रीजनक लली की।
राममधुपमन कमल कली की॥

आरती कीजै श्रीजनक लली की…॥

रामचन्द्र, मुखचन्द्र चकोरी।
अन्तर साँवर बाहर गोरी।
सकल सुमन्गल सुफल फली की॥

आरती कीजै श्रीजनक लली की…॥

पिय दृगमृग जुग-वन्धन डोरी,
पीय प्रेम रस-राशि किशोरी।
पिय मन गति विश्राम थली की॥

आरती कीजै श्रीजनक लली की…॥

रूप-रास गुननिधि जग स्वामिनि,
प्रेम प्रवीन राम अभिरामिनि।
सरबस धन हरिचन्द अली की॥

आरती कीजै श्रीजनक लली की…॥


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