भगवान महावीर इस युग के जैन धर्म के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे। जैन दर्शन के अनुसार सभी तीर्थंकर सामान्य मानव रूप में जन्म लेते हैं, लेकिन गहन तप, ध्यान और आत्मबोध के माध्यम से पूर्णता और मोक्ष की अवस्था प्राप्त करते हैं; इसलिए जैन परंपरा में उन्हें ईश्वर तुल्य माना जाता है, जबकि सृष्टि के रचयिता या अवतार की अवधारणा जैन मत में स्वीकार नहीं है। महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को बिहार में हुआ, जो अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार अप्रैल में पड़ता है और आज महावीर जयंती के रूप में मनाया जाता है। राजकुमार के रूप में उनका नाम वर्धमान रखा गया था और उन्हें राजसी सुख-सुविधाएँ सहज उपलब्ध थीं, परंतु तीस वर्ष की आयु में उन्होंने परिवार और ऐश्वर्य का त्याग कर संन्यास धारण किया और दुःख, पीड़ा तथा संसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए तपस्या के पथ पर अग्रसर हुए।
भगवान महावीर आरती का – सार (भावार्थ)
भगवान महावीर की आरती उन्हें जगनायक, सुखदायक और अत्यंत गंभीर प्रभु के रूप में नमन करती है—ऐसे महापुरुष के रूप में जिनका जीवन स्वयं धर्म, करुणा और आत्मसंयम का आदर्श है। यह आरती उनके जन्म, चरित्र, उपदेश और लोककल्याणकारी कार्यों का सारगर्भित स्मरण कराती है।
आरती के अनुसार भगवान महावीर का जन्म कुण्डलपुर में हुआ, जहाँ वे माता त्रिशला के पुत्र और राजा सिद्धार्थ के वंश में अवतरित हुए। उनके जन्म से देवता, मनुष्य और समस्त जगत में आनंद की लहर दौड़ पड़ी—यह संकेत देता है कि उनका अवतरण मानवता को सही मार्ग दिखाने के लिए हुआ।
भगवान महावीर को दीनानाथ और दयानिधि कहा गया है—अर्थात वे दुखियों के सहायक और करुणा के सागर हैं। आरती यह स्पष्ट करती है कि उन्होंने संयम, तप, और अहिंसा के माध्यम से जगत के कल्याण का मार्ग अपनाया। उनका जीवन परोपकार का प्रतीक है, जहाँ आत्मसंयम के द्वारा उन्होंने समाज को सत्य और शांति का पथ दिखाया।
आरती में यह भी कहा गया है कि भगवान महावीर ने पापाचार का नाश किया और सत्पथ का प्रकाश फैलाया। उन्होंने दया और धर्म का ध्वज पूरे संसार में लहराया—अर्थात उनके उपदेशों से नैतिकता, अहिंसा और करुणा को सामाजिक आधार मिला। यह शिक्षाएँ आज भी जीवन को शुद्ध, सरल और अर्थपूर्ण बनाने का मार्ग दिखाती हैं।
आगे, आरती उनके प्रमुख अनुयायियों—गौतम गणधर, चंदनबाला और अन्य भक्तों—का उल्लेख करती है, जिनके जीवन को उन्होंने सांसारिक बंधनों से पार कराया। यह भाव दर्शाता है कि भगवान महावीर की शरण में आने वाला व्यक्ति आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है और मोह-माया से मुक्त होने का साहस पाता है।
आरती का यह भी संदेश है कि भगवान महावीर का पावन नाम जगत का उद्धार करने वाला है। जो भक्त नित्य श्रद्धा से उनका ध्यान करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मन में शांति, विवेक व स्थिरता आती है। अंत में, उन्हें करुणासागर कहा गया है—जिनकी महिमा अनंत है और जिनके गुणों का गान करना ही जीवन को पवित्र बनाता है।
समग्र रूप से, यह आरती भगवान महावीर के जीवन-दर्शन को संक्षेप में प्रस्तुत करती है:
अहिंसा, सत्य, संयम, करुणा और परोपकार—यही उनके संदेश का सार है। आरती हमें स्मरण कराती है कि इन मूल्यों को अपनाकर ही व्यक्ति अपने भीतर की अशांति को शांत कर सकता है और समाज में धर्म, शांति व सद्भाव का प्रकाश फैला सकता है।
भगवान महावीर आरती – Mahaveer Bhagwan Ki Aarti
जय महावीर प्रभो!,स्वामी जय महावीर प्रभो!।
जगनायक सुखदायक,अति गम्भीर प्रभो॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
कुण्डलपुर में जन्में,त्रिशला के जाये।
पिता सिद्धार्थ राजा,सुर नर हर्षाए॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
दीनानाथ दयानिधि,हैं मंगलकारी।
जगहित संयम धारा,प्रभु परउपकारी॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
पापाचार मिटाया,सत्पथ दिखलाया।
दयाधर्म का झण्डा,जग में लहराया॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
अर्जुनमाली गौतम,श्री चन्दनबाला।
पार जगत से बेड़ा,इनका कर डाला॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
पावन नाम तुम्हारा,जगतारणहारा।
निसिदिन जो नर ध्यावे,कष्ट मिटे सारा॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
करुणासागर! तेरी,महिमा है न्यारी।
ज्ञानमुनि गुण गावे,चरणन बलिहारी॥
ॐ जय महावीर प्रभु।
अगर भगवान महावीर आरती आपके हृदय को स्पर्श करे, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य साझा करें। नीचे कमेंट करके अपनी श्रद्धा प्रकट करें और धर्म, अहिंसा व करुणा का संदेश आगे बढ़ाएँ।
जय महावीर प्रभु।