श्री रविदास जी की आरती – Shri Ravidas Ji Ki Aarti

संत शिरोमणि रविदास जी का जन्म लगभग 1377 ईस्वी में (कुछ मतों के अनुसार 1433 या 1450 ई.) उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित सीर गोवर्धनपुर में हुआ था। सामाजिक रूप से वे उस समय के तथाकथित निम्न वर्ग से आते थे, किंतु अपनी विलक्षण बुद्धि, गहन आध्यात्मिक अनुभूति और प्रभावशाली वाणी के बल पर उन्होंने समाज में अत्यंत सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया। रविदास जी ने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से जाति-पाति और भेदभाव का दृढ़ता से विरोध किया तथा समस्त मानवता को समान मानने का संदेश दिया। वे आत्मज्ञान, भक्ति और व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता को आध्यात्मिक उन्नति का मूल आधार मानते थे। उनका साहित्यिक योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है—उनके पद और वाणी “गुरु ग्रंथ साहिब” में संकलित हैं, जिसके कारण सिख परंपरा में भी उन्हें ‘भगत’ के रूप में विशेष आदर प्राप्त है।

संत कबीर के समकालीन रविदास जी को संत परंपरा में गुरु के रूप में मान्यता मिली, और भक्त कवयित्री मीराबाई उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानती थीं। वे रैदास, रोहिदास, रुहिदास तथा संत शिरोमणि जैसे अनेक सम्मानसूचक नामों से प्रसिद्ध हैं, और पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा हरियाणा सहित अनेक क्षेत्रों में उनकी जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। उनकी शिक्षाओं पर आधारित रविदासिया पंथ का उद्भव भी उन्हीं से जुड़ा है, जिसमें उन्हें केंद्रीय और प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता है।

श्री रविदास जी की आरती का – सार (भावार्थ)

श्री रविदास जी की आरती हमें भक्ति के उस मार्ग पर ले जाती है जहाँ बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि ईश्वर के नाम का स्मरण ही सच्ची पूजा माना गया है। आरती की शुरुआत इस गहन सत्य से होती है कि भगवान का नाम ही सबसे बड़ा भजन, सबसे पवित्र आराधना और समस्त कर्मकांडों से ऊपर की साधना है। यह आरती स्पष्ट करते हैं कि हरि-नाम के बिना संसार के सभी भौतिक विस्तार और दिखावे निरर्थक हैं।

इस आरती में ईश्वर के नाम को ही आसन, चंदन, केसर, दीप, बाती, तेल, माला और चंवर बताया गया है। अर्थात भक्त को किसी बाहरी सामग्री की आवश्यकता नहीं—नाम ही पूजा की हर वस्तु बन जाता है। जब भक्त सच्चे मन से प्रभु-नाम का जाप करता है, तो वही दीप बनकर भीतर के अंधकार को दूर करता है और पूरे जीवन को उजाले से भर देता है।

श्री रविदास जी समझाते हैं कि नाम की ज्योति जलते ही मन, घर और संसार पवित्र हो जाता है। इस आरती में यह भाव भी प्रकट होता है कि संसार की सारी माया, दिखावटी रस्में और भौतिक बोझ अंततः “जूठे” हैं—अर्थात अस्थायी और व्यर्थ। केवल सत्यनाम ही शाश्वत है, वही मनुष्य को वास्तविक शांति, संतोष और मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।

भक्त अंत में विनम्र भाव से कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया, वह सब प्रभु को ही समर्पित है। उनकी आरती का सार यही है कि सच्ची भक्ति भीतर से उपजती है—जहाँ अहंकार नहीं, केवल समर्पण होता है; जहाँ शब्दों से अधिक भाव का महत्व होता है।

यह आरती हमें यह आध्यात्मिक संदेश देती है कि ईश्वर का नाम ही सबसे बड़ा साधन है—वही हमारी पूजा है, वही हमारा प्रकाश है और वही हमारे जीवन की वास्तविक संपदा है। जो भक्त इस सत्य को स्वीकार करता है, उसका जीवन सहज, पवित्र और आनंदमय बन जाता है।

श्री रविदास जी की आरती – Shri Ravidas Ji Ki Aarti

नामु तेरो आरती भजनु मुरारे,
हरि के नाम बिनु झूठे सगल पसारे।

नाम तेरा आसनो नाम तेरा उरसा,
नामु तेरा केसरो ले छिटकारो।

नाम तेरा अंभुला नाम तेरा चंदनोघसि,
जपे नाम ले तुझहि कउ चारे।

नाम तेरा दीवा नाम तेरो बाती,
नाम तेरो तेल ले माहि पसारे।

नाम तेरे की ज्योति जगाई,
भइलो उजिआरो भवन सगलारे।

नाम तेरो तागा नाम फूल माला,
भार अठारह सगल जूठारे।

तेरो कियो तुझ ही किया अरपउ,
नाम तेरो तुही चंवर ढोलारे।

दस अठा अठसठे चारे खानी,
इहै वरतणि है सगल संसारे।

कहै ‘रविदास’ नाम तेरो आरती,
सतिनाम है हरिभोग तुम्हारे।


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