श्रीमद् भगवद् गीता की आरती – सार (भावार्थ)
श्रीमद् भगवद् गीता को इस आरती में केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि माता के रूप में पूजित किया गया है—जो मानव जीवन को दिशा देने वाली, मन को शुद्ध करने वाली और आत्मा को परम सत्य से जोड़ने वाली दिव्य वाणी है। आरती का प्रत्येक चरण गीता की शिक्षाओं, उसके आध्यात्मिक प्रभाव और जीवन-परिवर्तनकारी शक्ति को भावपूर्ण ढंग से उजागर करता है।
आरती की शुरुआत गीता को “हरि के हृदय-कमल में निवास करने वाली” सुंदर और पवित्र माता के रूप में करती है। इसका अर्थ है कि गीता स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की अंतःप्रेरणा है—अर्थात् उनकी चेतना से उद्भूत वह ज्ञान, जो मानवता को मार्ग दिखाता है।
गीता को कर्म के रहस्य को उजागर करने वाली बताया गया है—जो बताती है कि कर्म कैसे करें और फल में आसक्ति कैसे त्यागें। वह कामना और मोह को हरने वाली है तथा तत्त्वज्ञान का विकास कराकर हमें ब्रह्म-विद्या (परम सत्य के ज्ञान) तक पहुँचाती है। यही कारण है कि गीता को जीवन-दर्शन की सर्वोच्च पुस्तक माना गया है।
आरती गीता को निश्चल भक्ति उत्पन्न करने वाली और मल (अज्ञान, अहंकार) को हरने वाली बताती है। यह हमें शरणागति का रहस्य सिखाती है—कि ईश्वर की शरण में जाकर जीवन कैसे सरल, संतुलित और सर्वविधि सुखकारी बनता है।
गीता राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) को नष्ट कर मन में सदैव आनंद का भाव जगाती है। वह भव-भय को हरने वाली है—अर्थात् जन्म-मरण के भय से उबारकर परमानंद की अनुभूति कराती है। यह गीता की वह शक्ति है जो जीवन को भयमुक्त और अर्थपूर्ण बनाती है।
आरती बताती है कि गीता आसुरी वृत्तियों का विनाश करती है, तम (अज्ञान) और रज (अशांति) को दूर करती है और मन में दैवी सद्गुण—जैसे सत्य, करुणा, संयम और पवित्रता—भरती है। वह हरि-रस में अनुरक्त आत्मा को ईश्वर-प्रेम की ओर प्रेरित करती है।
गीता हमें समता (सुख-दुःख, लाभ-हानि में संतुलन) और त्याग का अभ्यास कराती है। इसे “हरिमुख की वाणी” कहा गया है—अर्थात् श्रीकृष्ण के मुख से निकला शाश्वत सत्य। साथ ही, इसे सभी शास्त्रों की स्वामिनी और श्रुतियों की रानी बताया गया है, क्योंकि गीता वेदांत का सार है और समस्त शास्त्रीय ज्ञान का निचोड़ प्रस्तुत करती है।
आरती के अंत में माता गीता से कृपा की प्रार्थना की जाती है—कि वह अपने उपासक पर दया-सुधा बरसाएँ, उसे हरि-पद (ईश्वर चरणों) का प्रेम प्रदान करें और अपना बना लें। यह भाव गीता की उस शक्ति को दर्शाता है, जो साधक को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
श्रीमद् भगवद् गीता की आरती गीता को ज्ञान की जननी, भक्ति की आधारशिला और मोक्ष का मार्गदर्शक घोषित करती है। यह आरती बताती है कि गीता— कर्म का सही अर्थ सिखाती है, आसक्ति, भय और अज्ञान से मुक्त करती है, दैवी गुणों से जीवन को आलोकित करती है, और अंततः ईश्वर-प्रेम और परम शांति की ओर ले जाती है। संक्षेप में, यह आरती मानव जीवन के हर आयाम—कर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य—को संतुलित करने वाली दिव्य वाणी के रूप में गीता की महिमा का गान करती है।
श्रीमद भगवद् गीता की आरती – Shrimad Bhagwat Geeta Ji Ki Aarti
जय भगवद् गीते, माता जय भगवद् गीते।
हरि हिय कमल विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
कर्म सुमर्म प्रकाशिनि, कामासक्तिहरा।
तत्त्वज्ञान विकाशिनि, विद्या ब्रह्म परा॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
निश्चल भक्ति विधायिनि, निर्मल मलहारी।
शरण रहस्य प्रदायिनि, सब विधि सुखकारी॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
राग द्वेष विदारिणि, कारिणि मोद सदा।
भव भय हारिणि , तारिणिपरमानन्दप्रदा॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
आसुर-भाव-विनाशिनि, नाशिनि तम रजनी।
दैवी सद्गुण दायिनि, हरि-रसिका सजनी॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
समता त्याग सिखावनि, हरिमुख की बानी।
सकल शास्त्र की स्वामिनि, श्रुतियों की रानी॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
दया-सुधा बरसावनि, मातु! कृपा कीजै।
हरिपद प्रेम दान कर, अपनो कर लीजै॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
जय भगवद् गीते, माता जय भगवद् गीते।
हरि हिय कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥
जय भगवद् गीते, माता जय…॥
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