चिंतपूर्णी देवी की आरती – Mata Chintpurni Devi Ji Ki Aarti

चिंतपूर्णी देवी की आरती का – सार (भावार्थ)

चिंतपूर्णी देवी की आरती, माँ चिंतपूर्णी को “भोली माँ” कहकर उनके करुणामय, रक्षक और दुःखहर्ता स्वरूप का भावपूर्ण गुणगान करती है। आरती का मूल संदेश स्पष्ट है—माँ चिंतपूर्णी भक्तों की सभी चिंताएँ दूर करती हैं, संसार का उद्धार करती हैं और शरणागतों को भय, संकट और क्लेश से मुक्त करती हैं। जो भी प्रेम और विश्वास के साथ उनका स्मरण करता है, माँ उसकी पीड़ा हरकर उसे शांति और आश्वासन देती हैं।

आरती में माँ को सिंह पर आरूढ़ दिखाया गया है, जो उनके अदम्य साहस, शक्ति और न्याय का प्रतीक है। उनके अनेक हाथों में धारण किए गए दिव्य अस्त्र-शस्त्र—खड्ग, खांडा, त्रिशूल, चक्र, गदा—यह दर्शाते हैं कि वे अधर्म, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली महाशक्ति हैं। साथ ही मुण्डों की माला और असुर-संहार के उल्लेख से उनका उग्र, रक्षक और धर्म-संस्थापक रूप प्रकट होता है—जहाँ माँ दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत कर भक्तों की रक्षा करती हैं।

आरती आगे माँ के धाम और दिव्य वातावरण का चित्र खींचती है—चम्पे का सुंदर बाग़, दिव्य आसन (दीवान), तथा उनके भवन में हरि (विष्णु) और ब्रह्मा का विराजना। यह संकेत देता है कि चिंतपूर्णी देवी केवल लोकदेवी नहीं, बल्कि त्रिदेवों द्वारा भी पूजित आदिशक्ति हैं। “लाल चंदोया” (लाल छत्र/आसन) पर उनका विराजमान होना उनके राजसी, सर्वाधिपत्य और मंगलकारी स्वरूप को दर्शाता है।

आरती में औखी घाटी, विकट पैंडा और नीचे बहती नदी जैसे स्थल-वर्णन यह बताते हैं कि माँ का धाम भौगोलिक रूप से कठिन हो सकता है, पर भक्ति का पथ कभी कठिन नहीं—जो भक्त श्रद्धा से चलता है, उसे माँ तक अवश्य पहुँचाती हैं। यह भाव भक्तों को यह विश्वास देता है कि जीवन की कठिनाइयों में भी माँ की कृपा सदा मार्गदर्शक रहती है।

अंतिम पंक्तियों में भक्त ध्यानु के यश-गान के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि सच्ची भक्ति और समर्पण से माँ की कृपा निश्चित है। “भक्तां दी पज निभाओ”—अर्थात् माँ अपने भक्तों की लाज रखती हैं, वचन निभाती हैं और संकट में साथ देती हैं। पूरे आरती-पाठ का निष्कर्ष यही है कि माँ चिंतपूर्णी चिंताओं को हरने वाली, दुःख-क्लेश दूर करने वाली और भक्तों को तारने वाली करुणामयी शक्ति हैं।

“चिंतपूर्णी देवी की आरती” हमें यह सिखाती है कि माँ चिंता-हरण, रक्षा और कल्याण की प्रतिमूर्ति हैं। उनके उग्र अस्त्र-धारी रूप से अधर्म का नाश होता है, जबकि उनके “भोली माँ” स्वरूप से भक्तों को सांत्वना, शांति और आश्वासन मिलता है। जो भी श्रद्धा, विश्वास और नियमित भक्ति से इस आरती का पाठ करता है, उसकी चिंताएँ दूर होती हैं, बाधाएँ कटती हैं और जीवन में संतुलन, सुरक्षा व आध्यात्मिक उन्नति आती है।

चिंतपूर्णी देवी की आरती – Mata Chintpurni Devi Ji Ki Aarti

चिंतपूर्णी चिंता दूर करनी,
जग को तारो भोली माँ
जन को तारो भोली माँ,
काली दा पुत्र पवन दा घोड़ा ॥
॥ भोली माँ ॥

सिन्हा पर भाई असवार,
भोली माँ, चिंतपूर्णी चिंता दूर ॥
॥ भोली माँ ॥

एक हाथ खड़ग दूजे में खांडा,
तीजे त्रिशूल सम्भालो ॥
॥ भोली माँ ॥

चौथे हाथ चक्कर गदा,
पाँचवे-छठे मुण्ड़ो की माला ॥
॥ भोली माँ ॥

सातवे से रुण्ड मुण्ड बिदारे,
आठवे से असुर संहारो ॥
॥ भोली माँ ॥

चम्पे का बाग़ लगा अति सुन्दर,
बैठी दीवान लगाये ॥
॥ भोली माँ ॥

हरी ब्रम्हा तेरे भवन विराजे,
लाल चंदोया बैठी तान ॥
॥ भोली माँ ॥

औखी घाटी विकटा पैंडा,
तले बहे दरिया ॥
॥ भोली माँ ॥

सुमन चरण ध्यानु जस गावे,
भक्तां दी पज निभाओ ॥
॥ भोली माँ ॥

चिंतपूर्णी चिंता दूर करनी,
जग को तारो ,भोली माँ


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