माँ महामाया की आरती का – सार (भावार्थ)
यह आरती माँ महामाया के करुणामय, सर्वशक्तिमान और विश्वपालक स्वरूप का गहन भाव से गुणगान करती है। आरती का मूल स्वर है—“कृपा, दया और क्षमा” की विनती। भक्त बार-बार प्रणाम करते हुए स्वीकार करता है कि उसके पास न पर्याप्त शक्ति है, न भक्ति, न विवेक और न ही शुद्ध पुण्य; फिर भी वह माँ की शरण में आता है, क्योंकि वही उसकी अंतिम आशा हैं।
आरती में मानव जीवन की वास्तविक स्थिति को विनम्रता से प्रस्तुत किया गया है—मनुष्य स्वयं को मलिन, दीन-हीन, अशांत और भय से घिरा हुआ अनुभव करता है। संसार की धाराओं में वह डूबता-सा प्रतीत होता है; चिंता, शोक और अनिश्चितता उसे लगातार घेरे रहते हैं। ऐसे समय में भक्त माँ महामाया से प्रार्थना करता है कि वे अनंत विपत्तियों और अपार आपदाओं से रक्षा करें, क्योंकि वही करुणा की एकमात्र शरण हैं।
अगले भाव में स्पष्ट किया गया है कि यदि माँ की कृपा न हो तो दुख-कथा कौन सुनेगा? यहाँ माँ महामाया को “श्रीगण विनाशिनी” (विघ्नों का नाश करने वाली), “समस्त विश्व की स्वामिनी” और “दृश्य-अदृश्य प्राण-शक्ति की एकमेव आधारशिला” कहा गया है। इसका अर्थ है कि सृष्टि की हर गतिविधि—चेतन और अचेतन—माँ की शक्ति से संचालित है। यद्यपि वे कठोर न्याय की प्रतीक भी हैं, फिर भी भक्तों के लिए अत्यंत उदार और दयालु हैं।
आरती में माँ के असंख्य विभूतियों, अनंत तेज और अपार शौर्य का उल्लेख है। उन्हें अखंड तेज की राशि, मुण्डमालिनी और ऐसी देवी बताया गया है जिनके एक अंश से समग्र सृष्टि प्रकाशित होती है। वे विवेक प्रदान करने वाली और पाप-कष्टों का नाश करने वाली हैं—अर्थात् आध्यात्मिक उन्नति और नैतिक शुद्धि दोनों की अधिष्ठात्री।
भक्त की पुकार अत्यंत करुण है—वह स्वयं को अबोध पुत्र मानते हुए माँ के चरण-कमलों में पड़ा हुआ बताता है। वह माँ से केवल एक दृष्टि-भर कृपा की याचना करता है—ताकि अशांति, शोक और क्लेश दूर हो जाएँ। आरती यह भी स्वीकार करती है कि हर वस्तु में माँ का ही विहार है; अर्थात् वे सर्वव्यापी हैं—जीवन का कोई भी पक्ष उनकी सत्ता से बाहर नहीं।
समापन में तीन भाव—कृपा, दया और क्षमा—बार-बार दोहराए जाते हैं। यह दोहराव केवल शब्द नहीं, बल्कि भक्त का पूर्ण समर्पण है:
- कृपा—जीवन में अनुग्रह और मार्गदर्शन के लिए,
- दया—दुःखों और दुर्बलताओं पर करुणा के लिए,
- क्षमा—अज्ञान, त्रुटि और पापों के परिमार्जन के लिए।
यही आरती का हृदय है—माँ महामाया की शरण में पूर्ण आत्मसमर्पण।
“माँ महामाया की आरती” हमें सिखाती है कि जब मनुष्य स्वयं को अशक्त, अशांत और संकटग्रस्त पाता है, तब माँ की कृपा ही उसका सहारा बनती है। वे विश्व की अधिष्ठात्री शक्ति, विघ्न-नाशिनी, विवेक-दायिनी और पाप-हरिणी हैं। जो भक्त विनम्रता, भक्ति और समर्पण से इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में शांति, साहस, शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का संचार होता है।
माँ महामाया की आरती – Maa Mahamaya Ki Aarti
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ।
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ॥
न शक्ति न भक्ति है विवेक बुद्धि है नहीं ।
मलिन दीन हीन हूँ न पूण्य शुद्धि है नहीं ॥
अधीर विश्व धार बीच डूबता सीवे सदा ।
अशान्ति भीति मोहे सोक रहा रोक ते सदा ॥
विपत्ति है अनंन्त अम्बे आपदा अपार है ।
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ।
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ॥
तुम्हे अगर तजु कहु कहा विपत्ति की कथा ।
सूने उसे कौन अगर सुनो ना देवी सर्वथा ॥
श्रीगण विनाशनी स्वामिनी समस्त विश्वपालिका ।
अदृश्य दृश्य प्राण शक्ति एक मेव तालिका ॥
कठोर तू तथापि भक्त के लिए उदार है ।
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ।
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ॥
असंख्य है विभूतियाँ अनन्त सौर्य शालिनी ।
अखंड तेज राशि युक्त देवी मुण्ड मालिनी ॥
समग्र सृष्टि एक अंश से प्रखर प्रकाशिका ।
विवेक दाई का विभो पाप शूल्य नाशिका ॥
क्षमा मई क्षमा करो कि यही पुकार है ।
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ।
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ॥
श्रीवेवनी नित भावना लिये हुए खड़ा हुआ ।
चरण सरोज में अबोध पुत्र है पड़ा हुआ ॥
कृपा भरी सुदृष्टि एक बार तू पसार दे ।
मिटे अशांति शोक एक बार तू निहार दे ॥
हर एक वस्तु बीच अम्बे आपका विहार है ।
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ॥
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ।
क्षमा मई क्षमा करो प्रणाम बार बार है ॥
कृपा मई कृपा करो प्रणाम बार बार है ।
दया मई दया करो प्रणाम बार बार है ॥
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