उज्जैन के महाकाल की आरती का सार (भावार्थ)
उज्जैन की महाकाल की आरती भगवान शिव के महाकाल स्वरूप का भक्तिपूर्ण स्तवन है, जिसमें उन्हें “कालों के काल” और ज्योतिर्लिंग स्वरूप में नमन किया गया है। आरती का केंद्रीय भाव यह है कि महाकाल समय, जन्म और मृत्यु से परे हैं—वे ही सृष्टि के परम नियंत्रक और करुणामय रक्षक हैं। भक्त उन्हें “स्वामी शंभू महाकाल” कहकर पुकारता है और उनकी शरण में मंगल, सुरक्षा और शांति की कामना करता है।
आरती उज्जैन को विशेष महिमा प्रदान करती है। बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर का नाम अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है और क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन को उनका पावन धाम कहा गया है। यह संकेत करता है कि उज्जैन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि मोक्ष-पथ का द्वार और शिव-भक्ति का जीवंत केंद्र है।
अगली पंक्तियाँ शिव के अखिल-व्यापक स्वरूप को उजागर करती हैं—वे काशी के विश्वनाथ, गोमती तट के त्र्यंबकेश्वर और दारूकवन के नागनाथ भी हैं। अर्थात् महाकाल केवल उज्जैन तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त ज्योतिर्लिंगों में एक ही परम शिव-तत्व के रूप में विराजमान हैं। यह भाव भक्त को एकता और सर्वव्यापकता का बोध कराता है।
आरती में महाकाल के द्वार पर काल का भी लाचार होकर खड़ा होना उनकी सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है। देव, मनुष्य, असुर और समस्त चराचर जगत उनके सृजन, संरक्षण और संहार के अधीन हैं—यही उन्हें सृष्टि का कर्ता-धर्ता सिद्ध करता है। भक्त इस विराट सत्ता के सामने विनम्र होकर नमन करता है।
महाकाल के चिता-भस्म से अलंकृत शृंगार का उल्लेख उनके वैराग्य और अनासक्ति को दर्शाता है। यह भस्म-शृंगार भक्तों के मन को मोहित करता है, क्योंकि इसमें संसारिक बंधनों से परे शुद्ध चेतना और आत्म-वैभव की झलक मिलती है। इसी संदर्भ में भस्म आरती को अद्भुत बताया गया है—जिसके दर्शन से नर-नारी स्वयं को धन्य मानते हैं।
आरती में शिव-परिवार की पावन उपस्थिति भी रेखांकित है—गणपति, गौरा (पार्वती) और कार्तिकेय उनके साथ विराजमान हैं, तथा नंदी द्वार पर नित्य सेवा में तत्पर हैं। यह दृश्य बताता है कि महाकाल का धाम केवल उपासना-स्थल नहीं, बल्कि दिव्य परिवार, सेवा और अनुशासन का केंद्र है।
अंतिम पंक्तियाँ आरती के फल को स्पष्ट करती हैं—जो भक्त श्रद्धा से दर्शन करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता, और जीवन में सुख, वैभव तथा मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। जो नर-नारी प्रेमपूर्वक महाकाल की आरती गाते हैं, उनकी प्रार्थनाएँ महेश्वर तक पहुँचती हैं और वे इच्छित फल पाते हैं।
“उज्जैन की महाकाल की आरती” महाकाल को ज्योतिर्लिंग स्वरूप, काल-विजयी, सर्वव्यापक और करुणामय प्रभु के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह आरती सिखाती है कि उनकी भक्ति से भय का नाश, शांति का विस्तार और जीवन में मंगल आता है। जो श्रद्धा, समर्पण और भक्ति से महाकाल का स्मरण करता है, उसके लिए उज्जैन का धाम मोक्ष, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बन जाता है।
उज्जैन की महाकाल की आरती – Ujjain Mahakal Aarti
ऊं जय शिव जय महाकाल
स्वामी जय शंभू महाकाल,
ज्योतिर्लिंग स्वरूपा
ज्योतिर्लिंग स्वरूपा,
तुम कालो के काल
ओम जय शिव जय महाकाल।
बारह ज्योतिर्लिंग में
महिमा बड़ों है नाम,
क्षिप्रा तट उज्जैन में,
महाकाल को धाम
ऊं जय शिव जय महाकाल।
प्रभु तुम भीमेश्वर देवा
तुम काशी विश्वनाथ,
गोमती तट त्रयंभकेश्वर
दारूकवन नागनाथ,
ओम जय शिव जय महाकाल।
हाथ जोड़ तेरे द्वारे
काल खड़ा लाचार,
सुर नर असुर चराचर,
सब के हो करतार,
ऊं जय शिव जय महाकाल।
चिता भस्म से तेरो
नित नित हो शृंगार,
भक्तन का मन मोहे,
तेरो रूप निहार,
ऊं जय शिव जय महाकाल।
भस्म आरती तेरी
अद्भुत है भगवान,
भाग्यवान नर नारी,
पाएं शुभ दर्शन
ऊं जय शिव जय महाकाल।
साथ में गणपति गौरा,
कार्तिक है देवा,
द्वार खड़े हैं नंदी,
नित्य उठ करें सेवा,
ऊं जय शिव जय महाकाल।
जो जन तेरा दर्शन
श्रद्धा से कर जाए,
मौत अकाल ना आए,
सुख वैभव पा जाए
ऊं जय शिव जय महाकाल।
महाकाल की आरती
जो नर नारी गाए,
कहत महेश प्रभु से,
मन इच्छा फल पाए
ऊं जय शिव जय महाकाल।
ऊं जय शिव जय महाकाल
स्वामी जय शंभू महाकाल,
ज्योतिर्लिंग स्वरूपा,
ज्योतिर्लिंग स्वरूपा,
तुम कालो के काल,
ऊं जय शिव जय महाकाल।।
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