गौरीनंदन (श्री गणेश) की आरती का – सार (भावार्थ)
यह आरती माँ गौरी के पुत्र, श्री गणेश—गौरीनंदन के मंगलमय, करुणामय और विघ्न-विनाशक स्वरूप का भक्तिपूर्ण स्तवन है। आरती की पहली ही पंक्तियाँ उन्हें “विघ्न निकंदन” और “मंगल नि:स्पन्दन” कहकर नमन करती हैं—अर्थात् वे समस्त बाधाओं का नाश करने वाले और जीवन में स्थिर मंगल प्रदान करने वाले देव हैं। इसका भाव यह है कि गणपति का स्मरण जीवन की उलझनों को शांत कर शुभ मार्ग प्रशस्त करता है।
आरती में कहा गया है कि ऋषि और सिद्धियाँ निरंतर उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं। हाथी-मुख वाले गणपति को सुखदायक बताया गया है, जो भक्तों के कष्टों को हर लेते हैं। यह संकेत देता है कि उनकी उपासना से न केवल बाहरी समस्याएँ मिटती हैं, बल्कि मन को भी संतोष और स्थिरता मिलती है।
देवताओं में सर्वप्रथम पूजा गणपति की होने का उल्लेख यह दर्शाता है कि हर शुभ कार्य का प्रारंभ उनके आशीर्वाद से ही पूर्ण होता है। उनकी मुख-छवि को देखते ही भक्तों के दुःख और दरिद्रता दूर होने की बात कही गई है—अर्थात् उनका सान्निध्य आत्मविश्वास, आशा और समृद्धि का द्वार खोलता है।
भोग में गुड़ और मोदक का वर्णन उनकी प्रियता और सौम्यता को प्रकट करता है। ऋषि-सिद्धियों के साथ उनकी शोभा त्रिभुवन को मोहित करती है—यह भाव बताता है कि गणपति की महिमा लोक, देव और पाताल—तीनों में व्याप्त है। उनका स्वरूप भक्त के मन में भक्ति और आनंद की अनुभूति जगाता है।
लंबोदर रूप में उन्हें भय-नाशक और भक्तों का रक्षक कहा गया है। “मातृ-भक्त” और “वांछित फलदाता” के रूप में वे माँ गौरी के प्रति उनकी निष्ठा तथा भक्तों के प्रति उनकी उदारता को दर्शाते हैं—जो सच्चे मन से शरण लेता है, उसे मनचाहा फल मिलता है।
उनका मूषक वाहन, स्वर्णिम छत्र और “विघ्नारण्य-दवानल” (अर्थात् विघ्नों के जंगल को भस्म करने वाली अग्नि) का रूपक यह सिखाता है कि वे सूक्ष्म से सूक्ष्म बाधा को भी दूर करने में समर्थ हैं और जीवन को शुभ-मंगलकारी बनाते हैं।
अंत में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा से यह आरती गाता है, वह सुख, संपत्ति और मनोवांछित फल प्राप्त करता है। इसका सार यह है कि गणपति-भक्ति जीवन को व्यवस्थित, सफल और आनंदमय बनाती है।
“गौरीनंदन की आरती” हमें यह संदेश देती है कि श्री गणेश विघ्नहर्ता, मंगलदाता और करुणामय रक्षक हैं। उनकी आराधना से भय का नाश, दुःख-दरिद्रता से मुक्ति और कार्यों में सिद्धि मिलती है। जो भक्त प्रेम, विश्वास और नियमित भक्ति के साथ उनका स्मरण करता है, उसका जीवन शुभता, समृद्धि और संतुलन से भर जाता है।
गौरीनंदन की आरती – Gouri Nandan Ki Aarti
ओम जय गौरी नन्दन, प्रभु जय गौरी नंदन।
गणपति विघ्न निकंदन, मंगल नि:स्पन्दन॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
ऋषि सिद्धियाँ जिनके, नित ही चवर करे।
करिवर मुख सुखकारक, गणपति विध्न हरे॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
देवगणो मे पहले तव पूजा होती।
तव मुख छवि भक्तो के दुख दारिद खोती॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
गुड का भोग लगत है कर मोदक सोहे।
ऋषि सीद्धि सह शोभित, त्रिभुवन मन मोहै॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
लंबोदर भय हारी, भक्तो के त्राता।
मातु भक्त हो तुम्ही, वांछित फल दाता॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
मूषक वाहन राजत कनक छत्रधारी।
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
विघ्नारन्येदवानल, शुभ मंगलकारी।
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
धरणीधर कृत आरती गणपति की गावे।
सुख सम्पत्ति युत होकर वह वांछित पावे॥
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन॥
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