संकटा माता की आरती का – सार (भावार्थ)
संकटा माता आरती, माँ संकटा भवानी के करुणामय, रक्षक और संकट-निवारक स्वरूप का भक्तिपूर्ण स्तवन है। आरती की शुरुआत में भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ माँ की शरण में आता है और उनसे अपनी प्रार्थना सुनने का निवेदन करता है। “शरण पड़ी हूँ तेरी माता” का भाव बताता है कि जब जीवन में सभी सहारे छूट जाते हैं, तब माँ संकटा ही अंतिम और अडिग आश्रय बनती हैं।
आरती में माँ को जगत की महान दाता कहा गया है—जिनके समान कोई नहीं। देव, मनुष्य और ऋषि सभी उनकी महिमा का स्मरण करते हैं। भक्त अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए माँ से निवेदन करता है कि वे उसके कष्टों का निवारण शीघ्र करें और कृपा में विलंब न करें। यह भाव दर्शाता है कि माँ संकटा केवल पूजनीय नहीं, बल्कि तुरंत सहारा देने वाली मातृशक्ति हैं।
आगे भक्त अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करता है—काम, क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर किए गए पापों की क्षमा माँ से मांगता है। यह आत्मस्वीकृति बताती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि पश्चाताप और सुधार की भावना होती है। माँ से प्रार्थना की जाती है कि वे हृदय के संताप, मोह और ममता के बंधनों को दूर करें और आत्मा को शांति प्रदान करें।
माँ के दिव्य वैभव का चित्रण भी अत्यंत प्रभावशाली है—वे सिंहासन पर विराजमान हैं, उनके सिर पर छत्र-छत्रियाँ और चंवर डुल रहे हैं, जो उनके राजसी और सर्वोच्च स्वरूप का संकेत है। उनके हाथों में खप्पर और खड्ग जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं, जिनकी शोभा अवर्णनीय बताई गई है। यहाँ माँ को शक्ति और करुणा का संतुलित स्वरूप दिखाया गया है—जो एक ओर दुष्टों का दमन करती हैं और दूसरी ओर भक्तों की रक्षा करती हैं।
आरती में बताया गया है कि देवगण भी उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर पाए—अर्थात् उनकी शक्ति अनंत और असीम है। असुरों के संहार का उल्लेख माँ की अदम्य वीरता और अधर्म के विरुद्ध उनके संघर्ष को दर्शाता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि माँ सदा संतों और भक्तों को सुख देती हैं और उनकी पुकार कभी अनसुनी नहीं करतीं।
अंतिम भाग में भक्त यह स्वीकार करता है कि वह माँ को अपना मानकर पूर्ण शरण में आया है। माँ की स्तुति, गुणगान और आरती करने से जीवन में भव-बन्धनों से मुक्ति मिलती है। जो भक्त दिन-रात माँ का ध्यान करता है, वह संसार के बंधनों में नहीं फँसता—अर्थात् उसकी चेतना ऊँची होती जाती है और जीवन में शांति, साहस और सुरक्षा का अनुभव होता है।
“संकटा माता की आरती” हमें सिखाती है कि माँ संकटा कष्ट-हरिणी, पाप-नाशिनी और भक्त-रक्षिका हैं। उनकी शरण में आने से भय, दुख और मानसिक अशांति का अंत होता है। जो भक्त विनम्रता, पश्चाताप और विश्वास के साथ इस आरती का पाठ करता है, उसे माँ की कृपा से संकटों से मुक्ति, आत्मिक शांति और जीवन में स्थिर मंगल की प्राप्ति होती है।
संकटा माता आरती – Sankata Mata Aarti
जय जय संकटा भवानी, करहूं आरती तेरी ।
शरण पड़ी हूँ तेरी माता, अरज सुनहूं अब मेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
नहिं कोउ तुम समान जग दाता, सुर-नर-मुनि सब टेरी ।
कष्ट निवारण करहु हमारा, लावहु तनिक न देरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
काम-क्रोध अरु लोभन के वश, पापहि किया घनेरी ।
सो अपराधन उर में आनहु, छमहु भूल बहु मेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
हरहु सकल सन्ताप हृदय का, ममता मोह निबेरी ।
सिंहासन पर आज बिराजें, चंवर ढ़ुरै सिर छत्र-छतेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
खप्पर, खड्ग हाथ में धारे, वह शोभा नहिं कहत बनेरी ॥
ब्रह्मादिक सुर पार न पाये, हारि थके हिय हेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
असुरन्ह का वध किन्हा, प्रकटेउ अमत दिलेरी ।
संतन को सुख दियो सदा ही, टेर सुनत नहिं कियो अबेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
गावत गुण-गुण निज हो तेरी, बजत दुंदुभी भेरी ।
अस निज जानि शरण में आयऊं, टेहि कर फल नहीं कहत बनेरी ॥
जय जय संकटा भवानी..॥
जय जय संकटा भवानी, करहूं आरती तेरी ।
भव बंधन में सो नहिं आवै, निशदिन ध्यान धरीरी ॥
जय जय संकटा भवानी, करहूं आरती तेरी ।
शरण पड़ी हूँ तेरी माता, अरज सुनहूं अब मेरी ॥
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