धर्मराज की आरती – Dharmraj Ji Ki Aarti – ॐ जय धर्म धुरन्धर

धर्मराज की आरती का – सार (भावार्थ)

यह आरती धर्मराज (यमराज) को न्याय, सत्य और लोक-रक्षा के परम अधिष्ठाता के रूप में नमन करती है। आरती की शुरुआत में उन्हें “धर्म धुरंधर” और “लोकत्राता” कहा गया है—अर्थात् वे समस्त लोकों में धर्म की स्थापना करने वाले और प्राणियों के रक्षक हैं। उन्हें हरि-हर धाता कहकर यह भाव प्रकट किया गया है कि वे विष्णु और शिव की व्यवस्था से जुड़े हुए, सृष्टि के नैतिक संतुलन के धारक हैं।

आगे आरती में धर्मराज को दण्डपाणि यम कहा गया है—जो अधर्म करने वालों के लिए दण्डदाता हैं, परंतु सुकृत (पुण्य) करने वालों के लिए वैतरणी से पार उतारने वाले करुणामय मार्गदर्शक भी हैं। यहाँ उनका द्वैत स्वरूप स्पष्ट होता है: एक ओर न्याय की कठोरता, दूसरी ओर धर्मपरायणों के प्रति अनुकंपा।

आरती धर्मराज को न्याय विभाग के अध्यक्ष और अंतर्यामी बताती है—जो हर प्राणी की नीयत, कर्म और भाव को भीतर तक जानते हैं। उनकी दिव्य दृष्टि से कोई भी पाप-पुण्य छिपा नहीं रहता। इस व्यवस्था में चित्रगुप्त द्वारा प्रत्येक जीव का कर्मलेखा सुरक्षित रखा जाता है, जिससे न्याय निष्पक्ष और अटल रहता है।

भक्तिपूर्वक यह भी कहा गया है कि जब मनुष्य विद्या (छात्र), पात्रता, वस्त्र, अन्न, भूमि, शय्या और आवास जैसे संसाधनों में धर्मपूर्वक आचरण करता है, तो धर्मराज की कृपा से उसे समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यह संकेत है कि धर्म के साथ अर्जित साधन ही स्थायी सुख देते हैं।

आरती में धर्मराज को समाज-व्यवस्था के संरक्षक के रूप में भी देखा गया है—वे ब्राह्मण, कन्या और तुलसी के पावन कार्यों में मर्यादा की स्थापना करते हैं और वंशवृद्धि को धर्मसम्मत मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। यह बताता है कि धर्मराज केवल मृत्यु के देव नहीं, बल्कि जीवन की नैतिक संरचना के रक्षक भी हैं।

दान, यज्ञ, उद्यापन और धार्मिक अनुष्ठानों से वे दयासिन्धु होकर प्रसन्न होते हैं। और मृत्यु के पश्चात भी वे ही जीव के एकमात्र पथप्रदर्शक बनते हैं—जो आत्मा को उसके कर्मानुसार आगे का मार्ग दिखाते हैं। अंत में भक्त विनयपूर्वक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, इस जगत-सागर से अपने सेवक को पार उतारें।

आरती का फलश्रुति भाग बताता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से धर्मराज की आरती गाता है, उसे इस लोक में सुख, शांति और मनोवांछित सिद्धि मिलती है—और परलोक में भी धर्मानुकूल गति प्राप्त होती है।

“धर्मराज की आरती” हमें सिखाती है कि धर्मराज निष्पक्ष न्याय, कर्म-सिद्धांत और करुणा—तीनों के प्रतीक हैं। उनकी उपासना का सार है: सत्य, सदाचार और दान के मार्ग पर चलना। जो भक्त धर्म का पालन करते हुए इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में आंतरिक शांति, सामाजिक संतुलन और आध्यात्मिक सुरक्षा का संचार होता है।

धर्मराज की आरती – Dharmraj Ji Ki Aarti – ॐ जय धर्म धुरन्धर

ॐ जय जय धर्म धुरन्धर, जय लोकत्राता ।
धर्मराज प्रभु तुम ही, हो हरिहर धाता ॥

जय देव दण्ड पाणिधर यम तुम, पापी जन कारण ।
सुकृति हेतु हो पर तुम, वैतरणी ताराण ॥

न्याय विभाग अध्यक्ष हो, नीयत स्वामी ।
पाप पुण्य के ज्ञाता, तुम अन्तर्यामी ॥

दिव्य दृष्टि से सबके, पाप पुण्य लखते ।
चित्रगुप्त द्वारा तुम, लेखा सब रखते ॥

छात्र पात्र वस्त्रान्न क्षिति, शय्याबानी ।
तब कृपया, पाते हैं, सम्पत्ति मनमानी ॥

द्विज, कन्या, तुलसी, का करवाते परिणय ।
वंशवृद्धि तुम उनकी, करते नि:संशय ॥

दानोद्यापन-याजन, तुष्ट दयासिन्धु ।
मृत्यु अनन्तर तुम ही, हो केवल बन्धु ॥

धर्मराज प्रभु, अब तुम दया ह्रदय धारो ।
जगत सिन्धु से स्वामिन, सेवक को तारो ॥

धर्मराज जी की आरती, जो कोई नर गावे ।
धरणी पर सुख पाके, मनवांछित फल पावे ॥


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