श्री कल्कि भगवान आरती – Kalki Ji Ki Aarti

श्री कल्कि भगवान आरती – सार (भावार्थ)

श्री कल्कि भगवान की यह आरती भविष्य में अवतरित होने वाले भगवान विष्णु के अंतिम अवतार की महिमा का गान करती है, जो कलियुग के अंत में धर्म की पुनः स्थापना हेतु प्रकट होंगे। आरती की प्रत्येक पंक्ति कल्कि भगवान को सुरों के रक्षक और असुरों के विनाशक के रूप में वर्णित करती है। वे भक्तों के हितैषी हैं, दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करने वाले हैं और सदैव धर्म, गौ तथा ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले परम योद्धा माने गए हैं। उनके हाथों में खड्ग धारण किया हुआ रूप न्याय, साहस और अधर्म-विनाश का प्रतीक है।

आरती में यह भी बताया गया है कि भगवान कल्कि क्षीर सागर के निवासी, अविनाशी और अनंत शक्तियों से युक्त हैं, जो पृथ्वी पर बढ़ते पाप और अधर्म के भार को उतारने के लिए अवतरित होंगे। “अलख निरंजन” कहकर उन्हें निराकार, शुद्ध और माया से परे बताया गया है, जो संसार के भय और संकटों को हरने वाले हैं। संभल नगर को उनका दिव्य प्राकट्य स्थल बताया गया है, जिससे भक्तों के मन में आशा और विश्वास का संचार होता है।

भक्तों की करुण पुकार इस आरती का मुख्य भाव है—वे प्रभु से शीघ्र अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं ताकि संसार में फैली अराजकता, अन्याय और अधर्म का अंत हो सके। आरती के अंतिम दोहे में संसार को बढ़ते पाप, ताप और संकटों के समुद्र के रूप में दर्शाया गया है और भगवान कल्कि से विनती की गई है कि वे भक्तों को इस भवसागर से पार उतारें।

इस प्रकार यह आरती आशा, धर्म, न्याय और ईश्वर पर अटूट विश्वास का सशक्त संदेश देती है, जो हर भक्त के हृदय में धर्म की पुनर्स्थापना की आकांक्षा जगाती है।

श्री कल्कि भगवान आरती – Kalki Ji Ki Aarti

ॐ जय जय सुर रक्षक असुर विनाशक,
पद्मावत के प्यारे॥

जय जय श्री कल्कि भक्त हितकारी,
दुष्टन मारन हारे॥

जय जय खड्गधारी जय असुरारी,
गऊ विप्रन के रखवारे॥

क्षीर सागरवासी जय अविनाशी,
भूमि भार उतारन हारे॥

अलख निरंजन भव भय भंजन,
जय संभल सरकारे॥

भक्त जानो के पालनकर्ता,
जय गउन रखवारे॥

जय जयकार करत सब भक्तजन,
सुनिए प्राण प्यारे॥

वेगहि सुधि लेना मेरे स्वामी,
हम सब दास पुकारे॥

ॐ जय जय कल्कि भगवान
ॐ जय जय कल्कि भगवान

बार बरोबर बाढ़ है,
तापर चलत ब्यार॥
श्री कल्कि पार उतारिये,
अपनी और निहार॥


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