श्री दाऊजी महाराज आरती – सार (भावार्थ)
यह आरती श्री बलदेव जी अर्थात दाऊजी महाराज के करुणामय, शक्तिशाली और भक्तवत्सल स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन करती है। आरती की शुरुआत में उन्हें “दुःख भंजन” और “रोहिणी नंदन” कहकर पुकारा गया है, जो भक्तों के सभी दुख, कष्ट और पीड़ाओं को हरने वाले हैं। वे संसार में भटक रहे जीवों को अपनी शरण में लेकर भवसागर से पार उतारने वाले उद्धारक हैं। भक्त उनसे विनती करता है कि वे उसे अपनी शरण में स्थान दें और जीवन के बंधनों से मुक्त करें।
आरती में दाऊजी महाराज के दिव्य श्रृंगार का सुंदर चित्रण मिलता है। उनके मस्तक पर मुकुट विराजमान है, पंचरंगी चीरा सुशोभित है और चंद्रमा के समान उज्ज्वल मुखमंडल पर ठोड़ी में जड़ा हीरा उनकी दिव्यता को और बढ़ाता है। उनके वस्त्र मनोहर हैं और झांकी मन को हर लेने वाली है। भक्त यह प्रार्थना करता है कि प्रभु कृपा दृष्टि डालें और उसके जीवन को मंगलमय बनाएं।
भोग के रूप में माखन, मिश्री और विजया अर्पित कर उनके स्नेहिल और सरल स्वभाव को स्मरण किया गया है। दाऊजी महाराज अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं और विपत्तियों को दूर कर सुख-शांति प्रदान करते हैं। माता रोहिणी के सम्मुख विराजमान होकर वे सबके दुःख हरते हैं और माता मंगल स्वरूप होकर भक्तों का कल्याण करती हैं।
इस आरती में यह भी बताया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और प्रेम से दाऊजी महाराज का ध्यान करता है, उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता। वह अमर प्रेम के पद को प्राप्त कर संसार के भवबंधन से मुक्त हो जाता है। क्षीर सागर के समीप स्थित उनके पावन तालाब में स्नान करने से भी समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं और तन-मन शुद्ध होता है।
श्रीकृष्ण के साथ वृन्दावन की महारास लीला, गिरिराज पर्वत पर सिंह रूप धारण करना और हल-मूसल धारण कर वानर द्विविद का संहार करना—ये सभी लीलाएँ दाऊजी महाराज के अद्भुत पराक्रम, शक्ति और धर्मरक्षा का प्रतीक हैं। ब्रजभूमि में उनकी अनोखी लीलाएँ भक्तों के हृदय में भक्ति और विश्वास को दृढ़ करती हैं।
आरती के अंत में यह भाव प्रकट होता है कि जो भक्त प्रतिदिन श्रद्धा से दाऊजी महाराज की आरती करता है, उसे मनवांछित फल प्राप्त होता है, उसका मन आनंद से भर जाता है और जीवन में सुख, शांति तथा भक्ति की वृद्धि होती है। इस प्रकार यह आरती श्री बलदेव जी के शरणागत वत्सल, संकटहरण और भक्त-कल्याणकारी स्वरूप को सुंदर रूप से प्रकट करती है।
श्री दाऊजी महाराज आरती – Shri Dauji Maharaj Ji ki Aarti
जय बलदेव हरे, स्वामी जय बलदेव हरे ।
हे दुःख भंजन, रोहिणी नंदन, सब दुख दूर करे ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
जय बलदेव हरे, स्वामी जय बलदेव हरे ।
हे दुःख भंजन, रोहिणी नंदन, सब दुख दूर करे ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
में जग में भटका हु, पार करो बाबा । स्वामी पार करो बाबा
अपनी शरण लगाओ उद्धार करो बाबा ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
माथे मुकुट विराजे, सिरे पंचरंग चीरा । स्वामी सि पचरंग चीरा
चन्दा के सम चमकै, ठोड़ी पै हीरा ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
सुन्दर वस्त्र मनोहर, मन हरनी झांकी । स्वामी मन हरनी झांकी
आपने भक्त जनन पै, नजर करो बाँकी ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
माखन मिश्री खावे, विजया भोग धरे । स्वामी विजया भोग धरे
सकल मनोरथ सारे , विपदा दूर करे ।।
ॐ जाये बलदेव हरे…
मैया संमुख विराजै, सबके दुःख हरनी । स्वामी सबके दुःख हरनी
सबकी करै सहाई, माँ मंगल करनी ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
जो नर तुमको ध्यावै, कष्ट नहीं पावै । स्वामी कष्ट नहीं पावै
अमर प्रेम पद पावै, भाव से तर जावै ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
सुन्दर ताल बानो है, क्षीर सागर न्यारो । स्वामी क्षीर सागर न्यारो
जो स्नान करै जन, मिट जाये दुःख सारो ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
कृष्णचन्द्र वृन्दावन, महारास कीन्हौ । स्वामी महारास कीन्हौ
गिरि के ऊपर बैठे, सिंह रूप लीन्हो ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
अजब अनौखी लीला, है ब्रज में भारी । स्वामी है ब्रज में भारी
वानर द्विविद गिराया, हलमूसल धारी ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
दाऊ बाबा की आरती, जो जन नित गावै । स्वामी जो जन नित गावै
मान वाँछित फल पावै, मन – मन हरषावै ।।
ॐ जय बलदेव हरे…
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