श्री भैरव चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह पावन श्री भैरव चालीसा भगवान श्री भैरव के उग्र, रक्षक, कालस्वरूप और भक्तवत्सल रूप की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन करती है। प्रारंभिक दोहे में भक्त भगवान भैरव को संकट हरने वाले, मंगल करने वाले, और करुणामय दीनदयालु कहकर उनसे नित्य कृपा की प्रार्थना करता है।
चौपाइयों के आरंभ में भगवान भैरव के स्वरूप का वर्णन किया गया है। वे डमरू और त्रिशूल धारण करने वाले, विशाल लाल नेत्रों वाले, श्यामवर्ण तथा भीषण तेजस्वी शरीर से युक्त देवता हैं। उन्हें विशेष रूप से “काशी के कोतवाल” कहा गया है — अर्थात् वे सम्पूर्ण काशी नगरी के रक्षक और न्यायकारी अधिपति हैं। उनका मुख्य कार्य है भक्तों के संकटों का नाश करना और उन्हें भय, भ्रम और बाधाओं से मुक्त करना।
चालीसा में भैरव जी को गिरिजासुत, अर्थात् माता पार्वती के पुत्र तथा भगवान शिव के अनुगामी और स्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है। वे बटुक भैरव और काल भैरव दोनों रूपों में पूजे जाते हैं — एक ओर वे बाल स्वरूप में करुणामय, तो दूसरी ओर कालरूप में अत्यंत शक्तिशाली और भयहारी हैं। उनके अष्ट रूपों की महिमा बताई गई है, जो अलग-अलग दिशाओं और शक्तियों की रक्षा करते हैं।
उनका स्वरूप अत्यंत विशिष्ट बताया गया है — जटाजूट पर मुकुट, मस्तक पर चंद्रमा, कमर में घुँघरू की करधनी, हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर और खड्ग, और वाहन रूप में श्वान (कुत्ता) — जो उनकी रक्षक शक्ति और न्यायभाव का प्रतीक है। उनके दर्शन मात्र से ही भक्तों के समस्त भय नष्ट हो जाते हैं।
भैरव जी को त्रिनेत्री, चतुर्भुज, दशभुज, तथा अनेक उग्र रूपों में वर्णित किया गया है। उनका शरीर कभी रक्तवर्ण, कभी श्यामवर्ण, और कभी श्वेतवर्ण बताया गया है — जो यह दर्शाता है कि वे तीनों गुणों के स्वामी और समस्त शक्तियों के अधिपति हैं।
चालीसा में कहा गया है कि वे प्रेतनाथ, भूतेश, कालधर, और भविष्य-वर्तमान-अतीत के ज्ञाता हैं। वे कालजयी हैं — अर्थात् स्वयं काल भी उनके अधीन है। उनके साथ चौंसठ योगिनियाँ नृत्य करती हैं, और वे रणभूमि में अत्यंत पराक्रमी योद्धा के रूप में विराजमान होते हैं।
एक महत्वपूर्ण प्रसंग में बताया गया है कि भगवान भैरव ने ऐलादी भक्त के संकट का निवारण किया और अपने सच्चे भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण कीं। इसी कारण उन्हें “कालीपुत्र” और भक्तों के परम रक्षक कहा गया है।
भक्त उनसे बार-बार प्रार्थना करता है कि वे उसके भवसागर से उद्धार करें, दुःख, रोग, भय, शत्रु बाधा और प्रेत दोष से रक्षा करें, तथा उसे शुद्ध भक्ति का वरदान प्रदान करें। यह भी कहा गया है कि जिस स्थान पर भैरव का भक्त निवास करता है, वहाँ कोई संकट नहीं आता और सदा सुरक्षा कवच बना रहता है।
अंतिम भाग में यह स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और प्रेम से श्री भैरव चालीसा का पाठ करता है, उस पर भगवान भैरव की विशेष कृपा होती है। उसके सभी अपराध क्षमा हो जाते हैं, जीवन में आनंद, निर्भयता, समृद्धि और शांति का वास होता है।
समापन दोहे में भगवान भैरव को भूतपति, सुखकंद, और दीन रक्षक कहकर नमन किया गया है और उनसे नित्य आनंद और कृपा की कामना की गई है।
श्री भैरव चालीसा – Shri Bhairav Chalisa
॥ दोहा ॥
श्री भैरव सङ्कट हरन, मंगल करन कृपालु।
करहु दया जि दास पे, निशिदिन दीनदयालु॥
॥ चौपाई ॥
जय डमरूधर नयन विशाला। श्याम वर्ण, वपु महा कराला॥१॥
जय त्रिशूलधर जय डमरूधर। काशी कोतवाल, संकटहर॥२॥
जय गिरिजासुत परमकृपाला। संकटहरण हरहु भ्रमजाला॥३॥
जयति बटुक भैरव भयहारी। जयति काल भैरव बलधारी॥४॥
अष्टरूप तुम्हरे सब गायें। सकल एक ते एक सिवाये॥५॥
शिवस्वरूप शिव के अनुगामी। गणाधीश तुम सबके स्वामी॥६॥
जटाजूट पर मुकुट सुहावै। भालचन्द्र अति शोभा पावै॥७॥
कटि करधनी घुँघरू बाजै। दर्शन करत सकल भय भाजै॥८॥
कर त्रिशूल डमरू अति सुन्दर। मोरपंख को चंवर मनोहर॥९॥
खप्पर खड्ग लिये बलवाना। रूप चतुर्भुज नाथ बखाना॥१०॥
वाहन श्वान सदा सुखरासी। तुम अनन्त प्रभु तुम अविनाशी॥११॥
जय जय जय भैरव भय भंजन। जय कृपालु भक्तन मनरंजन॥१२॥
नयन विशाल लाल अति भारी। रक्तवर्ण तुम अहहु पुरारी॥१३॥
बं बं बं बोलत दिनराती। शिव कहँ भजहु असुर आराती॥१४॥
एकरूप तुम शम्भु कहाये। दूजे भैरव रूप बनाये॥१५॥
सेवक तुमहिं तुमहिं प्रभु स्वामी। सब जग के तुम अन्तर्यामी॥१६॥
रक्तवर्ण वपु अहहि तुम्हारा। श्यामवर्ण कहुं होई प्रचारा॥१७॥
श्वेतवर्ण पुनि कहा बखानी। तीनि वर्ण तुम्हरे गुणखानी॥१८॥
तीनि नयन प्रभु परम सुहावहिं। सुरनर मुनि सब ध्यान लगावहिं॥१९॥
व्याघ्र चर्मधर तुम जग स्वामी। प्रेतनाथ तुम पूर्ण अकामी॥२०॥
चक्रनाथ नकुलेश प्रचण्डा। निमिष दिगम्बर कीरति चण्डा॥२१॥
क्रोधवत्स भूतेश कालधर। चक्रतुण्ड दशबाहु व्यालधर॥२२॥
अहहिं कोटि प्रभु नाम तुम्हारे। जयत सदा मेटत दुःख भारे॥२३॥
चौंसठ योगिनी नाचहिं संगा। क्रोधवान तुम अति रणरंगा॥२४॥
भूतनाथ तुम परम पुनीता। तुम भविष्य तुम अहहू अतीता॥२५॥
वर्तमान तुम्हरो शुचि रूपा। कालजयी तुम परम अनूपा॥२६॥
ऐलादी को संकट टार्यो। साद भक्त को कारज सारयो॥२७॥
कालीपुत्र कहावहु नाथा। तव चरणन नावहुं नित माथा॥२८॥
श्री क्रोधेश कृपा विस्तारहु। दीन जानि मोहि पार उतारहु॥२९॥
भवसागर बूढत दिनराती। होहु कृपालु दुष्ट आराती॥३०॥
सेवक जानि कृपा प्रभु कीजै। मोहिं भगति अपनी अब दीजै॥३१॥
करहुँ सदा भैरव की सेवा। तुम समान दूजो को देवा॥३२॥
अश्वनाथ तुम परम मनोहर। दुष्टन कहँ प्रभु अहहु भयंकर॥३३॥
तम्हरो दास जहाँ जो होई। ताकहँ संकट परै न कोई॥३४॥
हरहु नाथ तुम जन की पीरा। तुम समान प्रभु को बलवीरा॥३५॥
सब अपराध क्षमा करि दीजै। दीन जानि आपुन मोहिं कीजै॥३६॥
जो यह पाठ करे चालीसा। तापै कृपा करहु जगदीशा॥३७॥
॥ दोहा ॥
जय भैरव जय भूतपति, जय जय जय सुखकंद।
करहु कृपा नित दास पे, देहुं सदा आनन्द॥
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