श्री दुर्गा चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह श्री दुर्गा चालीसा माँ जगदम्बा भवानी की सर्वशक्तिमान, करुणामयी और सर्वव्यापक सत्ता का विस्तृत वर्णन करती है। प्रारंभ में भक्त माँ दुर्गा और अम्बे को नमन करते हुए उन्हें सुख देने वाली और दुःख हरने वाली बताता है। माँ की निराकार ज्योति तीनों लोकों में फैली हुई है, जो अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर जीवन में प्रकाश भर देती है। उनके विशाल ललाट, तेजस्वी मुख, लाल नेत्र और विकराल भृकुटि उनके उग्र और रक्षक स्वरूप को दर्शाते हैं, जबकि उनका दर्शन भक्तों को अपार आनंद, शांति और संतोष प्रदान करता है।
चालीसा में माँ को सृष्टि की मूल शक्ति बताया गया है, जिन्होंने संसार की रचना, पालन और संहार का भार संभाला। अन्नपूर्णा रूप में वे जगत का पालन करती हैं और आदि सुंदरी बनकर सृष्टि की शोभा बढ़ाती हैं। प्रलयकाल में संहारिणी और गौरी रूप में भगवान शिव की प्रिय बनकर वे संतुलन स्थापित करती हैं। शिव, ब्रह्मा और विष्णु जैसे देवता भी उनके गुणों का गान और ध्यान करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बिना शक्ति के कोई भी देव कार्यशील नहीं हो सकता।
माँ के विविध अवतारों का सुंदर चित्रण भी चालीसा में है। सरस्वती रूप में वे बुद्धि, विवेक और ज्ञान प्रदान कर ऋषि-मुनियों का उद्धार करती हैं। नरसिंह रूप धारण कर उन्होंने प्रह्लाद की रक्षा की और अधर्म का नाश किया। लक्ष्मी रूप में वे श्री नारायण के संग क्षीरसागर में विराजमान होकर समृद्धि, वैभव और कृपा प्रदान करती हैं। हिंगलाज, मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगला, तारा और छिन्नमस्ता जैसे महाविद्या स्वरूपों में उनकी महिमा अमित और अवर्णनीय है।
माँ सिंह वाहन पर सवार होकर वीर हनुमान जैसे बलवानों के साथ अग्रसर होती हैं। उनके हाथों में खड्ग, खप्पर, अस्त्र-शस्त्र और त्रिशूल शोभायमान हैं, जिनसे काल भी भयभीत हो जाता है और शत्रुओं के हृदय कांप उठते हैं। उन्होंने शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज और महिषासुर जैसे अहंकारी असुरों का संहार कर धरती को अधर्म के भार से मुक्त किया। जब-जब भक्तों पर संकट आया, तब-तब माँ ने सहायता कर उनकी रक्षा की और देवताओं के लोक में आनंद और शांति स्थापित की।
चालीसा यह भी बताती है कि माँ की ज्योति अग्नि में भी विद्यमान है और स्त्री-पुरुष सभी उन्हें श्रद्धा से पूजते हैं। जो भक्त प्रेम, भक्ति और निष्ठा से माँ का यश गाते हैं, उनके जीवन से दुःख, दारिद्र्य और भय दूर हो जाते हैं। सच्चे मन से ध्यान करने पर जन्म-मरण का बंधन भी कट जाता है। योगी, मुनि और आचार्य यह स्वीकार करते हैं कि शक्ति के बिना योग और तप अधूरे हैं।
अंत में भक्त अपनी शरणागति व्यक्त करता है और माँ से कृपा, रिद्धि-सिद्धि, शत्रु नाश तथा मोह-मद जैसे दोषों के विनाश की प्रार्थना करता है। वह जीवन भर माँ का यशोगान करने और उनकी भक्ति में लीन रहने का संकल्प लेता है। दुर्गा चालीसा का नित्य पाठ करने वाला व्यक्ति संसारिक सुखों के साथ-साथ परमपद को प्राप्त करता है।
यह दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की अनंत शक्ति, करुणा और रक्षक स्वरूप का भावपूर्ण सार प्रस्तुत करती है। यह सिखाती है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से माँ की शरण में जाता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और उसे सुख, शांति, समृद्धि तथा मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है। माँ जगदम्बा की भक्ति ही जीवन को सार्थक और भयमुक्त बनाती है।
श्री दुर्गा चालीसा – Shri Durga Chalisa
॥ चौपाई ॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥१॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥२॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥३॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥४॥
तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥५॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥६॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥७॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥८॥
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥९॥
धरा रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥१०॥
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥११॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥१२॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥१३॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥१४॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥१५॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥१६॥
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥१७॥
कर में खप्पर-खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजे॥१८॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥१९॥
नगर कोटि में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥२०॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥२१॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥२२॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥२३॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥२४॥
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥२५॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥२६॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥२७॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥२८॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥२९॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥३०॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥३१॥
शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥३२॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥३३॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥३४॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥३५॥
आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब विनशावै॥३६॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥३७॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥३८॥
जब लगि जियउं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥३९॥
दुर्गा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥४०॥
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥दोहा॥
शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे नि:शंक ।
मैं आया तेरी शरण में, मातु लिजिये अंक ॥
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