शिवाष्टकम (शिव स्तुति) का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह शिवाष्टकम भगवान शिव के करुणामय, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी स्वरूप का भावपूर्ण स्तवन है। इसमें भक्त शिवशंकर, गंगाधर, कैलाशी, अविनाशी और करुणाकर के रूप में महादेव का जयघोष करता है। वे सुखराशी हैं—सभी सुखों का सार—और शशिशेखर होकर चंद्रमा को धारण करते हैं। डमरूधर महादेव सृष्टि की लय-ताल के स्वामी हैं, त्रिपुरारी और मदहारी बनकर अहंकार व विकारों का नाश करते हैं। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी—निराकार होते हुए साकार बनकर भक्तों की रक्षा करते हैं। हर पंक्ति में पार्वतीपति शम्भो से करुणा की याचना है—“पाहि पाहि दातार।”
दूसरे स्तवन में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण आता है—रामेश्वर, नागेश्वर, वैद्यनाथ, केदारनाथ, मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, महाकाल, ओंकारेश्वर, त्रयम्बकेश्वर, घुश्मेश्वर, भीमेश्वर और काशी विश्वनाथ। यहाँ महादेव को मंगलमय, अघ-हार और मृत्युंजय कहा गया है—जो पापों का क्षय करते हैं, भय हरते हैं और अमरता के भाव को जागृत करते हैं। नीलकण्ठ, भूतनाथ और अविकार स्वरूप उनके वैराग्य, करुणा और शाश्वत शांति को प्रकट करते हैं।
तीसरे स्तवन में महेश, भवेश, आदिदेव और महादेव की अपार महिमा का वर्णन है। भक्त स्वीकार करता है कि गुणातीत प्रभु की महिमा शब्दों से परे है। शिव भव-तारक हैं—संसार-सागर से पार कराने वाले—पातक-दारक हैं—पापों का नाश करने वाले—और प्रेम-सुधाकर हैं—भक्ति में अमृत घोलने वाले। यहाँ विनती है कि करुणाधार बनकर जीवन-नाव को भवसागर से पार लगाएँ।
चौथे स्तवन में शिव के मनभावन, अतिपावन और शोक-नाशक रूप का चित्रण है। उनके कमल-नयन, धवल-वर्ण तन और सहज वचन शांति का संचार करते हैं। वे विपद-विदारक, अधम-उबारक, सत्य-सनातन हैं। मदन-कदन-कर होकर वे काम-विकार का दमन करते हैं और विश्व-रूप, प्रलयंकर होकर भी जगत के मूलाधार बने रहते हैं।
पाँचवें स्तवन में भोलानाथ, औघड़दानी और शिव योगी की सरलता व उदारता प्रकट होती है। वे निमिष मात्र में नवनिधि देने वाले, करुणा-सागर, और भक्तों पर सर्वस्व लुटाने वाले हैं। स्वयं अकिंचन होकर भी जन-मन रंजन करते हैं—यही शिव की परम उदारता है।
छठे स्तवन में भक्त आशुतोष से आत्मिक जागरण की प्रार्थना करता है—मोह-माया की निद्रा से जगाने, विषय-वेदना से मुक्त करने और दिव्य-ज्ञान की लगन चरणों में लगाने की याचना करता है। वह चाहता है कि प्रभु उसके मन-मंदिर में पधारें और जीवन को मुक्ति की ओर ले जाएँ।
सातवें स्तवन में दान की परिभाषा बदल जाती है—यहाँ भक्त अनपायिनी भक्ति, चरणानुरक्ति और पूर्ण ब्रह्म-ज्ञान की भीख माँगता है। स्वामी से करुण पुकार सुनने की विनती है, ताकि सेवक का जीवन सार्थक हो सके।
आठवें और अंतिम स्तवन में विरह-वेदना चरम पर है। भक्त बिना शिव के व्याकुल है, उमा-रमण से चरण-शरण की बाँह थामने की गुहार करता है। दीन-दयालु प्रभु से वह अपनी दयनीय दशा पर करुण विचार की याचना करता है—कि वे आएँ, अपनाएँ और उद्धार करें।
निष्कर्ष:
यह शिवाष्टकम भक्ति, वैराग्य और करुणा का समन्वय है। इसमें भगवान शिव को निर्गुण-सगुण, निराकार-साकार, तारक, रक्षक और दाता के रूप में अनुभव किया जाता है। नियमित पाठ से मन में शांति, भक्ति, ज्ञान और मुक्ति की अभिलाषा प्रबल होती है। जो भक्त श्रद्धा से “हर हर शम्भो” का स्मरण करता है, उसके जीवन से दुःख-भय दूर होते हैं और वह भवसागर से पार होने का मार्ग पाता है।
शिवाष्टकम : जय शिवशंकर, जय गंगाधर – Shivashtakam : Jai ShivShankar Jai Gangadhar
जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणाकर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशी सुख-सार हरे,
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर, जय जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय सगुण अनामय, निराकार, साकार हरे ,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥१॥
जय रामेश्वर, जय नागेश्वर, वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्रयम्बकेश्वर, जय घुश्मेस्वर, भीमेश्वर, जगतार हरे,
काशीपति, श्री विश्वनाथ जय, मंगलमय अघ-हार हरे,
नीलकण्ठ जय, भूतनाथ, मृत्युंजय, अविकार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥२॥
जय महेश, जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुणातीत प्रभु, तव महिमा अपार वर्णन हो,
जय भवकारक, तारक, हारक, पातक-दारक, शिव शम्भो,
दीन दुःखहर, सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाकर शिव शम्भो,
पार लगा दो भवसागर से, बनकर करुणाधार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥३॥
जय मनभावन, जय अतिपावन, शोक-नशावन शिव शम्भो,
सहज वचन हर, जलज-नयन-वर, धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन, शिव शम्भो,
सहज वचन हर, जलज-नयन-वर, धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन हर-चरन मनन धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥४॥
भोलानाथ कृपालु दयामय, औघड़दानी शिव योगी,
निमित्र मात्र में देते हैं, नवनिधि मनमानी शिव योगी,
सरल ह्रदय अतिकरुणा सागर, अकथ कहानी शिव योगी,
भक्तों पर सर्वस्व लुटा कर बने मसानी शिव योगी,
स्वयं अकिंचन, जनमन रंजन, पर शिव परम उदार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥५॥
आशुतोष इस मोहमयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषय-वेदना से विषयों को माया-धीश छुड़ा देना,
रूप-सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान-भण्डार-युगल-चरणों में लगन लगा देना,
एक बार इस मन मन्दिर में कीजे पद संचार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥६॥
दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
पूर्ण ब्रह्म हो, दो तुम अपने रूप का सच्चा ज्ञान प्रभो,
स्वामी हो, निज सेवक की सुन लेना करुण पुकार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥७॥
तुम बिन, व्याकुल हूँ प्राणेश्वर आ जाओ भगवंत हरे,
चरण-शरण की बांह गहो, हे उमा-रमण प्रियकंत हरे,
विरह व्यथित हूँ, दीन दुःखी हूँ, दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमन्त हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर, कुछ तो करो विचार हरे,
पार्वती पति, हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥८॥
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हर हर महादेव! 🔱🙏