शिव लिंगाष्टकम का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह शिव लिंगाष्टकम भगवान सदाशिव के लिंग स्वरूप की महिमा का अत्यंत पावन, सारगर्भित और भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तोत्र है। इसमें शिवलिंग को परम सत्य, परमात्मा और सृष्टि के मूल कारण के रूप में नमन किया गया है। प्रत्येक श्लोक शिवलिंग के अलग-अलग दिव्य गुणों, उसकी करुणा, शुद्धता, तेज और मोक्षदायिनी शक्ति को उजागर करता है, जिससे भक्त का मन श्रद्धा और विश्वास से भर उठता है।
प्रथम श्लोक में शिवलिंग को ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित बताया गया है। यह लिंग निर्मल प्रकाश से दीप्त है और जन्म-मरण से उत्पन्न दुःखों का नाश करता है। यहाँ शिवलिंग जीवन के कष्टों से मुक्ति और आत्मिक शांति का प्रतीक बनकर सामने आता है।
दूसरे श्लोक में देव-ऋषियों द्वारा अर्चित, कामदहन करने वाला और करुणाकर शिवलिंग वर्णित है। यह श्लोक बताता है कि शिवलिंग अहंकार का नाश करता है—जैसे रावण के गर्व का विनाश—और भक्त को विनम्रता व विवेक की राह दिखाता है।
तीसरे श्लोक में शिवलिंग को सुगंधित द्रव्यों से अलंकृत, बुद्धि-विवर्धक और सिद्धों, देवों तथा असुरों द्वारा वंदित कहा गया है। यह दर्शाता है कि शिवलिंग का पूजन ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
चौथे श्लोक में स्वर्ण और महा-मणियों से भूषित, नागराज से वेष्टित शिवलिंग की शोभा का वर्णन है। साथ ही यह दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विनाश करने वाला बताया गया है—जो अधर्म और अहंकार के विनाश का प्रतीक है।
पाँचवें श्लोक में शिवलिंग कुंकुम और चंदन से लेपित, कमल-हार से सुशोभित और संचित पापों का नाश करने वाला बताया गया है। यह श्लोक भक्त को आश्वस्त करता है कि सच्ची भक्ति से कर्मबंधन शिथिल होते हैं और मन निर्मल होता है।
छठे श्लोक में देवगणों द्वारा सेवित और भावपूर्ण भक्ति से पूज्य शिवलिंग का वर्णन है, जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यों के समान है। यह शिवलिंग की असीम तेजस्विता और कल्याणकारी ऊर्जा को रेखांकित करता है।
सातवें श्लोक में अष्टदल कमल से आवेष्टित, समस्त सृष्टि का कारण और आठ प्रकार की दरिद्रता का नाश करने वाला शिवलिंग बताया गया है। यहाँ शिवलिंग समृद्धि, स्थिरता और जीवन-संतुलन का आधार बनता है।
आठवें श्लोक में देवगुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ देवों द्वारा पूजित, देववन के पुष्पों से सदा अर्चित, और परात्पर परमात्मा स्वरूप शिवलिंग की स्तुति है। यह श्लोक शिवलिंग को परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है—जो शब्दों और सीमाओं से परे है।
अंतिम फलश्रुति में कहा गया है कि जो भक्त शिव के सान्निध्य में इस लिंगाष्टकम का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनंद का अनुभव करता है।
निष्कर्ष:
शिव लिंगाष्टकम शिवभक्ति का संक्षिप्त किंतु अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह सिखाता है कि शिवलिंग केवल पूज्य प्रतीक नहीं, बल्कि परम चेतना का स्वरूप है। इसके नित्य पाठ से पापों का क्षय, बुद्धि का विकास, समृद्धि, शांति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो भक्त श्रद्धा, भक्ति और नियम से इसका पाठ करता है, उसका जीवन शिवमय हो उठता है।
शिव लिंगाष्टकम – Shiv Lingashtakam
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
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