शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् भगवान महादेव के उन बारह दिव्य ज्योतिर्लिंगों की महिमा का भावपूर्ण स्तवन है, जो भारत की पावन धरती पर स्थापित होकर भक्ति, मुक्ति, रक्षा और कल्याण प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र बताता है कि शिव स्वयं ज्योतिर्मय होकर भक्तों के उद्धार हेतु विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए। प्रत्येक श्लोक एक-एक ज्योतिर्लिंग की विशेषता, स्थान-वैशिष्ट्य और आध्यात्मिक फल को सरल भाव में प्रकट करता है।
प्रथम श्लोक में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का स्मरण है, जो सौराष्ट्र की रमणीय भूमि में चन्द्रकलाधारी शिव के रूप में प्रतिष्ठित है। यह ज्योतिर्लिंग भक्ति प्रदान करने वाला और करुणा से अवतीर्ण माना गया है—यहाँ शरणागत को आंतरिक शांति मिलती है।
दूसरे श्लोक में मल्लिकार्जुन (श्रीशैल) का गुणगान है, जो संसार-सागर से पार लगाने वाला सेतु है। यह स्थान साधकों को स्थिर भक्ति और वैराग्य देता है।
तीसरे श्लोक में महाकाल (उज्जैन) का वर्णन है, जो अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं और सज्जनों को मोक्ष प्रदान करते हैं। महाकाल का स्मरण भय का नाश करता है।
चौथे श्लोक में ओंकारेश्वर का स्तवन है, जो नर्मदा-क्षेत्र में स्थित होकर ईश्वर-तत्त्व (ॐ) का बोध कराते हैं। यहाँ भक्ति से आत्मिक संतुलन मिलता है।
पाँचवें श्लोक में वैद्यनाथ का स्मरण है—जो रोग-शमन, आशीर्वाद और कल्याण के प्रतीक हैं। शिव यहाँ गिरिजा के साथ विराजमान हैं और देव-असुर सभी उनके चरणों में नत हैं।
छठे श्लोक में नागेश्वर का वर्णन है, जो भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं। यह ज्योतिर्लिंग आत्म-विश्वास और साहस को जाग्रत करता है।
सातवें श्लोक में केदारनाथ की महिमा है—हिमालय की गोद में स्थित यह धाम तप, ध्यान और संयम का केन्द्र है, जहाँ ऋषि-मुनि नित्य पूजन करते हैं।
आठवें श्लोक में त्र्यम्बकेश्वर का स्मरण है, जिनके दर्शन से पापों का शीघ्र नाश होता है। गोदावरी-तीर का यह क्षेत्र शुद्धि और उन्नति का द्वार खोलता है।
नवें श्लोक में रामेश्वरम् का वर्णन है, जहाँ भगवान श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की। यह ज्योतिर्लिंग कर्तव्य, मर्यादा और भक्ति का आदर्श है।
दसवें श्लोक में भीमाशंकर की स्तुति है, जो भयकारी शक्तियों का नाश कर भक्तहित करते हैं। यहाँ शिव रक्षक रूप में प्रतिष्ठित हैं।
ग्यारहवें श्लोक में काशी विश्वनाथ का गुणगान है—आनंदवन में विराजमान यह ज्योतिर्लिंग मोक्ष की नगरी का स्वामी है। यहाँ शिव अनाथों के नाथ हैं और पापों का क्षय करते हैं।
बारहवें श्लोक में घृष्णेश्वर का स्मरण है, जो उदारता, करुणा और जगत-कल्याण के प्रतीक हैं। यह ज्योतिर्लिंग भक्त के हृदय में स्थायी भक्ति जगाता है।
अंतिम श्लोक (फलश्रुति) बताता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इस द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करता है, वह आध्यात्मिक फल पाता है और अपने जीवन को शिवमय बनाता है।
निष्कर्ष:
शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् शिवभक्ति का सार है। यह स्तोत्र भय-नाश, पाप-क्षय, आत्मिक शुद्धि और मोक्ष-मार्ग की प्रेरणा देता है। नित्य पाठ से मन में श्रद्धा, धैर्य और आनंद का संचार होता है। जो भक्त इन बारह ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करता है, उसका जीवन शिव-कृपा से आलोकित हो उठता है।
शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् – Shiv Dwadash Jyotirling Stotram
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्येज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णतं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥१॥
श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गेतुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकंनमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥२॥
अवन्तिकायां विहितावतारंमुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थंवन्दे महाकालमहासुरेशम्॥३॥
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रेसमागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे॥४॥
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधानेसदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मंश्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि॥५॥
याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्येविभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकंश्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये॥६॥
महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तंसम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैःकेदारमीशं शिवमेकमीडे॥७॥
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तंगोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशंप्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीड॥८॥
सुताम्रपर्णीजलराशियोगेनिबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तंरामेश्वराख्यं नियतं नमामि॥९॥
यं डाकिनीशाकिनिकासमाजेनिषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धंतं शङ्करं भक्तहितं नमामि॥१०॥
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथंश्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥११॥
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन्समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावंयरघृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये॥१२॥
ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानांशिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्याफलं तदालोक्य निजं भजेच्च॥१३॥
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