श्री भैरव देव जी आरती – Aart Shri Bhairav Ji – सुनो जी भैरव लाडले

श्री भैरव आरती का – सार (भावार्थ)

श्री भैरव देव जी आरती भक्ति, शरणागति, निर्भयता और करुणा से परिपूर्ण है। आरती का सार यह स्पष्ट करता है कि भगवान भैरव जी शिव के उग्र एवं रक्षक स्वरूप हैं, जो अपने भक्तों की पुकार को तुरंत सुनते हैं और उन्हें भय, बाधा तथा नकारात्मक शक्तियों से मुक्त करते हैं।

आरती की शुरुआत में भक्त अत्यंत विनम्र भाव से भैरव जी को “लाड़िले” कहकर पुकारता है और हाथ जोड़कर उनकी कृपा की याचना करता है। भक्त यह स्वीकार करता है कि वह प्रभु का ही ध्यान करता है और उनके चरणों में शीश झुकाकर अपनी अर्जी निवेदन करता है। यह भाव पूर्ण समर्पण और विश्वास को दर्शाता है।

आगे भक्त अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए स्वयं को बुद्धि से कमजोर बताता है और प्रभु से सहायता की प्रार्थना करता है। साथ ही यह भी कहता है कि भैरव जी की महिमा अपार है, जिसका वर्णन करना उसके सामर्थ्य से बाहर है। यह पंक्ति भगवान की अनंत शक्ति और महिमा को रेखांकित करती है।

आरती में भैरव जी के स्वरूप का भी प्रभावशाली वर्णन है—वे श्वान (कुत्ते) की सवारी करते हैं और चारों दिशाओं में उनका राज्य माना गया है। सभी भूत, प्रेत और अदृश्य शक्तियों के वे स्वामी हैं। यह दर्शाता है कि भैरव जी तंत्र, रक्षक शक्ति और काल-नियंत्रण के देवता हैं, जिनसे कोई भी नकारात्मक शक्ति भयभीत रहती है।

उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र उनकी उग्र और न्यायकारी शक्ति के प्रतीक हैं। आरती में यह भी बताया गया है कि माता के समक्ष भैरव जी नृत्य करते हैं, जिससे यह भाव प्रकट होता है कि वे उग्र होते हुए भी मातृशक्ति के पूर्ण भक्त और आज्ञाकारी हैं।

भक्त यह भी वर्णन करता है कि भैरव जी माता को अपने गुणगान और लीलाओं से प्रसन्न रखते हैं। उनकी सांकली (श्रृंखला) का उल्लेख उनके रक्षक और अनुशासक स्वरूप को दर्शाता है, जो भक्तों को अनुचित मार्ग से रोककर सही दिशा में ले जाते हैं।

मेहंदीपुर धाम का उल्लेख भैरव जी की प्रसिद्ध महिमा को दर्शाता है, जहाँ दूर-दूर से यात्री और पीड़ित भक्त आते हैं। यह स्थान बजरंग बली और भैरव जी की संयुक्त कृपा का केंद्र माना जाता है, जहाँ भूत-बाधा और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

आरती के अंतिम भाग में भक्त स्वयं को प्रेतराज सरकार के चरणों में समर्पित करता है और कामना करता है कि भैरव जी की लीलाओं से माता सदा प्रसन्न रहें। भक्त यह भी प्रार्थना करता है कि माता और भैरव जी दोनों का आशीर्वाद उसके सिर पर सदा बना रहे।

समग्र सार

श्री भैरव जी की यह आरती भय से मुक्ति, आत्मबल, संरक्षण और पूर्ण शरणागति का संदेश देती है। यह सिखाती है कि जो भक्त सच्चे मन से भैरव जी की उपासना करता है, उसे किसी भी प्रकार के डर, बाधा या नकारात्मक शक्ति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं रहती। भैरव जी अपने भक्तों के सच्चे रक्षक और मार्गदर्शक हैं—यही इस आरती का गूढ़ आध्यात्मिक सार है।

श्री भैरव देव जी आरती – Aart Shri Bhairav Ji

सुनो जी भैरव लाडले, कर जोड़ कर विनती करूँ।
कृपा तुम्हारी चाहिए, मैं ध्यान तुम्हारा ही धरूँ।
मैं चरण छुता आपके, अर्जी मेरी सुन लीजिये॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

मैं हूँ मति का मन्द, मेरी कुछ मदद तो कीजिये।
महिमा तुम्हारी बहुत, कुछ थोड़ी सी मैं वर्णन करूँ॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

करते सवारी स्वान की, चारों दिशा में राज्य है।
जितने भूत और प्रेत, सबके आप ही सरताज हैं॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

हथियार हैं जो आपके, उसका क्या वर्णन करूँ।
माता जी के सामने तुम, नृत्य भी करते सदा॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

गा गा के गुण अनुवाद से, उनको रिझाते हो सदा।
एक सांकली है आपकी, तारीफ उसकी क्या करूँ॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

बहुत सी महिमा तुम्हारी, मेंहदीपुर सरनाम है।
आते जगत के यात्री, बजरंग का स्थान है॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

श्री प्रेतराज सरकार के, मैं शीश चरणों में धरूँ।
निशदिन तुम्हारे खेल से, माताजी खुश रहें॥

सुनो जी भैरव लाडले॥

सिर पर तुम्हारे हाथ रख कर, आशीर्वाद देती रहें।
कर जोड़ कर विनती करूँ, अरु शीश चरणों में धरूँ॥

सुनो जी भैरव लाडले॥


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🙏 श्री भैरव देव जी आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें—भय से मुक्ति, संरक्षण और सद्बुद्धि का आशीर्वाद दें।

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