अम्बे तू है जगदम्बे काली – आरती का सार (भावार्थ)
अम्बे तू है जगदम्बे काली, आरती माँ दुर्गा / जगदम्बा काली के उस करुणामय, शक्तिशाली और सर्वरक्षक स्वरूप का सुंदर चित्रण करती है, जिसमें वे भक्तों के कष्टों को हरने वाली और अधर्म का नाश करने वाली परम शक्ति के रूप में पूजित हैं। इस आरती का सार भक्त और माँ के बीच के अटूट प्रेम, विश्वास और शरणागति को अत्यंत सरल और भावुक शब्दों में प्रस्तुत करता है।
आरती की शुरुआत में माँ को जगदम्बे काली और खप्पर वाली दुर्गा कहकर स्मरण किया गया है। यह दर्शाता है कि माँ सृजन और संहार—दोनों की शक्ति हैं। देवी भारती (सरस्वती) तक जिनके गुणों का गान करती हैं, ऐसी माँ की आरती समस्त भक्त मिलकर उतारते हैं, क्योंकि वही सबकी रक्षक और पालनहार हैं।
आगे बताया गया है कि जब भक्तों पर संकट भारी हो जाता है, तब माँ सिंह पर सवार होकर दानवों का संहार करने स्वयं आती हैं। वे सौ सिंहों के समान बलशाली हैं और अपनी अष्टभुजाओं से दुष्ट शक्तियों को ललकारती हैं। यह माँ के निर्भय और न्यायकारी स्वरूप का प्रतीक है, जो अधर्म के विरुद्ध सदा खड़ा रहता है।
आरती में माँ और संतान के पवित्र संबंध को अत्यंत भावनात्मक रूप से व्यक्त किया गया है। संसार में चाहे संतान कपूत हो सकती है, पर माँ कभी कुमाता नहीं होती—यह पंक्ति माँ दुर्गा की असीम करुणा और वात्सल्य को दर्शाती है। वे सभी पर समान कृपा बरसाती हैं, अमृत समान प्रेम देती हैं और दुखियों के दुःख दूर करती हैं।
भक्त अपनी निःस्वार्थ भावना प्रकट करते हुए कहता है कि उसे धन-दौलत, सोना-चाँदी नहीं चाहिए, बल्कि केवल माँ के चरणों में एक छोटा-सा स्थान चाहिए। यह सच्ची भक्ति का भाव है, जहाँ सांसारिक लालसाओं के स्थान पर ईश्वर-सान्निध्य की कामना होती है। माँ सबकी बिगड़ी बनाती हैं, भक्तों की लाज बचाती हैं और सतियों के सत (मर्यादा और धर्म) की रक्षा करती हैं।
अंत में भक्त पूजा की थाली लेकर माँ की शरण में खड़ा होता है और विनती करता है कि माँ अपना वरदहस्त सिर पर रखकर संकटों का नाश करें। वह माँ से भक्ति-रस से भरी प्याली देने की प्रार्थना करता है, ताकि जीवन श्रद्धा और विश्वास से परिपूर्ण हो जाए। माँ ही भक्तों के सभी कार्य सिद्ध करने वाली हैं—यही पूर्ण समर्पण का भाव है।
समग्र सार
यह आरती हमें सिखाती है कि माँ दुर्गा शक्ति, करुणा और संरक्षण का अद्भुत संगम हैं। वे दुष्टों का संहार करती हैं, पर भक्तों के लिए सदा ममतामयी माता हैं। उनकी भक्ति से भय दूर होता है, मन शांत होता है और जीवन संकटों से मुक्त होकर भक्ति के पथ पर अग्रसर होता है—यही इस आरती का गहन और आत्मिक सार है।
अम्बे तू है जगदम्बे काली – आरती श्री दुर्गाजी – Aarti Ambe Tu Hai Jagdambe Kali
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,
तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
तेरे भक्त जनो पर माता,भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
सौ-सौ सिहों से बलशाली,है अष्ट भुजाओं वाली,
दुष्टों को तू ही ललकारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
माँ-बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत-कपूत सुने है, पर ना माता सुनी कुमाता॥
सब पे करूणा दर्शाने वाली,अमृत बरसाने वाली,
दुखियों के दुखड़े निवारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना।
हम तो मांगें तेरे चरणों में, छोटा सा कोना॥
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,
सतियों के सत को संवारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली।
वरद हस्त सर पर रख दो माँ, संकट हरने वाली॥
माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली,
भक्तों के कारज तू ही सारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
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🙏 जय जगदम्बे काली! माँ दुर्गा आप सभी पर अपनी असीम कृपा बनाए रखें—सुख, शांति और निर्भयता प्रदान करें।