आरती श्री कुबेर जी का – सार (भावार्थ)
भगवान श्री कुबेर जी की आरती धन, वैभव, सुरक्षा और भक्तवत्सलता के भाव को अत्यंत सरल और भक्तिपूर्ण शब्दों में व्यक्त करती है। आरती का सार यह बताता है कि श्री कुबेर जी केवल धन के देवता ही नहीं, बल्कि शिवभक्त, यक्षों के स्वामी और भक्तों के संकट हरने वाले दिव्य रक्षक भी हैं।
आरती की शुरुआत में कुबेर जी को यक्षराज कहकर नमन किया गया है, जो शरण में आए भक्तों के भंडार भर देने वाले हैं। जो भी सच्चे मन से उनकी शरण लेता है, उसे धन-धान्य, सुख-समृद्धि और जीवन की आवश्यकताओं की कभी कमी नहीं रहती।
आगे आरती में बताया गया है कि कुबेर जी भगवान शिव के परम भक्त हैं और धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने दैत्य, दानव और अधर्मी शक्तियों से अनेक युद्ध लड़े। यह उनके वीर, साहसी और धर्मपरायण स्वरूप को दर्शाता है।
उनका वैभवशाली स्वरूप भी सुंदर ढंग से वर्णित है—वे स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं, उनके सिर पर राजछत्र शोभायमान है और चारों ओर योगिनियाँ मंगलगान करती हैं। सम्पूर्ण वातावरण “जय-जयकार” से गूंज उठता है, जो उनकी महिमा और ऐश्वर्य को प्रकट करता है।
कुबेर जी के हाथों में गदा, त्रिशूल और अनेक शस्त्र हैं, जो यह संकेत देते हैं कि वे केवल धनदाता ही नहीं, बल्कि दुख, भय और संकटों के नाशक भी हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं।
आरती में उनके भोग का भी उल्लेख है—भाँति-भाँति के स्वादिष्ट व्यंजन, मोहन भोग, उड़द और चने अर्पित किए जाते हैं। यह दर्शाता है कि कुबेर जी को शुद्ध भक्ति और श्रद्धा से किया गया अर्पण अत्यंत प्रिय है।
भक्त भाव से कुबेर जी को बल, बुद्धि और विद्या का दाता माना गया है। जो भक्त उनकी शरण में आता है, उसके सभी कार्य वे स्वयं सँवारते हैं और उसे जीवन में उन्नति प्रदान करते हैं।
उनका श्रृंगार भी दिव्यता से भरा है—मणियों से जड़ा मुकुट, गले में मोतियों का हार, अगर-कपूर की सुगंध और घी की ज्योति उनके ऐश्वर्य और पवित्रता को और बढ़ाती है।
आरती के फलश्रुति भाग में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रेम और श्रद्धा से श्री कुबेर जी की आरती गाता है, वह मनवांछित फल, आर्थिक स्थिरता और जीवन में समृद्धि प्राप्त करता है।
समग्र सार: श्री कुबेर जी की यह आरती भक्त को यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति केवल धन की कामना नहीं, बल्कि धर्म, परिश्रम और संतुलन के साथ जीवन जीने की प्रेरणा है। कुबेर जी अपने भक्तों को धन के साथ-साथ सुरक्षा, विवेक और संतोष भी प्रदान करते हैं—यही इस आरती का गूढ़ आध्यात्मिक सार है।
भगवान श्री कुबेर जी की आरती – Aarti Bhagwan Shri Kuber Ji
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे,स्वामी जै यक्ष जै यक्ष कुबेर हरे।
शरण पड़े भगतों के,भण्डार कुबेर भरे॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
शिव भक्तों में भक्त कुबेर बड़े,स्वामी भक्त कुबेर बड़े।
दैत्य दानव मानव से,कई-कई युद्ध लड़े॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
स्वर्ण सिंहासन बैठे,सिर पर छत्र फिरे, स्वामी सिर पर छत्र फिरे।
योगिनी मंगल गावैं,सब जय जय कार करैं॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
गदा त्रिशूल हाथ में,शस्त्र बहुत धरे, स्वामी शस्त्र बहुत धरे।
दुख भय संकट मोचन,धनुष टंकार करें॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
भाँति भाँति के व्यंजन बहुत बने,स्वामी व्यंजन बहुत बने।
मोहन भोग लगावैं,साथ में उड़द चने॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
बल बुद्धि विद्या दाता,हम तेरी शरण पड़े, स्वामी हम तेरी शरण पड़े
अपने भक्त जनों के,सारे काम संवारे॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
मुकुट मणी की शोभा,मोतियन हार गले, स्वामी मोतियन हार गले।
अगर कपूर की बाती,घी की जोत जले॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
यक्ष कुबेर जी की आरती,जो कोई नर गावे, स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत प्रेमपाल स्वामी,मनवांछित फल पावे॥
ॐ जै यक्ष कुबेर हरे…..॥
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🙏 भगवान श्री कुबेर जी आप सभी को धन, वैभव, संतोष और शुभ समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।