आरती कुंजबिहारी की – Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की – सार (भावार्थ)

“आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की” भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य सौंदर्य, मधुर लीलाओं, प्रेममय स्वरूप और भक्तवत्सल स्वभाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने वाली प्रसिद्ध आरती है। यह आरती हमें श्रीकृष्ण के माधुर्य, करुणा और अलौकिक आकर्षण से परिचित कराती है, जो भक्त के मन को सहज ही हर लेता है।

आरती की शुरुआत में श्रीकृष्ण को कुंजबिहारी और गिरिधर कहा गया है। कुंजबिहारी का अर्थ है वृंदावन की कुंज गलियों में रास रचाने वाले प्रेमस्वरूप भगवान, और गिरिधर वह जिन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर भक्तों की रक्षा की। इससे यह भाव प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण प्रेम और शक्ति दोनों का अद्भुत संतुलन हैं।

आगे आरती में श्रीकृष्ण के सौंदर्य और श्रृंगार का मनोहारी वर्णन है। उनके गले में बैजंती माला है, हाथों में मधुर मुरली है, और कानों में झिलमिलाते कुंडल शोभा बढ़ा रहे हैं। वे नंद बाबा के आनंदस्वरूप नंदलाल हैं। उनके अंगों की कांति मेघों जैसी श्यामल है, जिसके साथ राधा जी की उज्ज्वल आभा और भी अधिक चमक उठती है। उनके घुंघराले बाल, कस्तूरी तिलक और चंद्रमा जैसी मुखछवि उनकी ललित और मोहक सुंदरता को दर्शाती है।

आरती में श्रीकृष्ण के मोर मुकुट का उल्लेख है, जो सोने की तरह चमकता है और जिसे देखकर देवता भी दर्शन के लिए लालायित हो जाते हैं। आकाश से पुष्पवर्षा होती है, मुरचंग और मृदंग बजते हैं, और गोपियों के साथ रास का आनंद छा जाता है। यह दृश्य श्रीकृष्ण की रासलीला और गोपियों के निश्छल प्रेम को दर्शाता है, जो भक्ति के उच्चतम स्वरूप का प्रतीक है।

इसके बाद गंगा जी के प्राकट्य का प्रसंग आता है। जहाँ श्रीकृष्ण के चरण हैं, वहीं से गंगा प्रकट हुईं, जो मन को हरने वाली और पापों का नाश करने वाली हैं। शिवजी के मस्तक पर विराजमान गंगा भी श्रीकृष्ण चरणों की महिमा को दर्शाती है। यह भाव स्पष्ट करता है कि श्रीकृष्ण का स्मरण मात्र ही मोह और पापों का नाश कर देता है

वृंदावन के दिव्य वातावरण का सुंदर चित्रण करते हुए आरती में कहा गया है कि वहाँ की रेत चमकती है, बांसुरी की मधुर धुन गूंजती है, चारों ओर गोप, गोपियाँ और गायें आनंद में मग्न हैं। श्रीकृष्ण की सौम्य मुस्कान, चंद्रमा जैसी शीतलता और करुणा भवबंधन को काटने वाली है। वे दीन-दुखियों की पुकार सुनकर उन्हें संसार के दुखों से मुक्त करते हैं।

आरती का समग्र भाव यह सिखाता है कि श्रीकृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम, आनंद और मुक्ति के साक्षात स्वरूप हैं। उनकी भक्ति से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मन को शांति मिलती है और भक्त को आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

निष्कर्ष

यह आरती श्रीकृष्ण के सौंदर्य, लीला, करुणा और भक्तवत्सलता का भावपूर्ण स्मरण कराती है। जो भी भक्त श्रद्धा और प्रेम से “आरती कुंजबिहारी की” का गायन करता है, उसका मन संसार के मोह से मुक्त होकर श्रीकृष्ण भक्ति में रम जाता है और जीवन में आनंद, शांति व दिव्य प्रेम की अनुभूति करता है।

🙏 जय श्री कृष्ण | राधे राधे 🙏

आरती कुंजबिहारी की – Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै । बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा , बसी शिव सीस, जटा के बीच,
हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू , हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद,
कटत भव फंद, टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

प्रसिद्ध “ आरती कुंजबिहारी की ” – वीडियो :


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🌸 राधे राधे | जय श्री कृष्ण 🌸

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