अहोई माता की आरती का – सार (भावार्थ)
अहोई माता की आरती, माँ अहोई के मातृत्व, करुणा, संतान-सुख और गृह-कल्याण को सुंदर रूप से प्रकट करती है। इस आरती में माता अहोई को सृष्टि की जननी, पालनकर्ता और भक्तों के कष्ट हरने वाली देवी के रूप में नमन किया गया है। कहा गया है कि माँ अहोई का नित्य ध्यान और स्मरण करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
आरती में माता अहोई को ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला जैसे दिव्य रूपों का समन्वय बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे ब्रह्मा, शिव और विष्णु की शक्तियों से युक्त जगतमाता हैं। सूर्य, चंद्रमा और नारद ऋषि भी उनकी महिमा का गुणगान करते हैं, जिससे माता की त्रिलोकी में प्रतिष्ठा सिद्ध होती है।
माँ अहोई को निरंजन स्वरूप, यानी शुद्ध और निष्कलंक बताया गया है, जो अपने भक्तों को सुख-सम्पत्ति और मंगल प्रदान करती हैं। जो श्रद्धालु सच्चे मन से उनका पूजन करता है, उसके जीवन में नित्य शुभ फल प्राप्त होते हैं। आरती यह भी दर्शाती है कि माता पाताल से लेकर लोकों तक व्याप्त हैं और कर्मों के प्रभाव को प्रकाश में लाकर भक्तों को विपत्तियों से बचाती हैं।
जिस घर में अहोई माता का वास और पूजन होता है, वहाँ सद्गुणों की वृद्धि, आत्मविश्वास और मानसिक शांति बनी रहती है। माँ की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और मन में भय नहीं रहता। विशेष रूप से यह आरती संतान-सुख से जुड़ी आस्था को उजागर करती है—बताया गया है कि माता के बिना न सुख पूर्ण होता है और न ही पुत्र-संतान का वरदान प्राप्त होता है।
अहोई माता को क्षीर सागर से उत्पन्न, अनुपम रत्नों से भी बढ़कर मूल्यवान बताया गया है, जिनकी महिमा को पूर्ण रूप से कोई नहीं जान सकता। अंत में यह संदेश दिया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से अहोई माता की आरती गाता है, उसके हृदय में उमंग जागृत होती है, पाप नष्ट होते हैं और जीवन में मंगलमय परिवर्तन आता है।
यह आरती माँ अहोई की संतान-रक्षा, पारिवारिक सुख और नारी-हृदय की आस्था को समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण स्तुति है, जो अहोई अष्टमी व्रत और मातृ-भक्ति के महत्व को गहराई से दर्शाती है।
अहोई माता की आरती – Ahoi Mata Ki Aarti
जय अहोई माता, जय अहोई माता ।
तुमको निसदिन ध्यावत, हर विष्णु विधाता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
माता रूप निरंजन, सुख-सम्पत्ति दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत, नित मंगल पाता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक, जगनिधि से त्राता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
जिस घर थारो वासा, वाहि में गुण आता ।
कर न सके सोई कर ले, मन नहीं घबराता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
तुम बिन सुख न होवे, न कोई पुत्र पाता ।
खान-पान का वैभव, तुम बिन नहीं आता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
शुभ गुण सुंदर युक्ता, क्षीर निधि जाता ।
रतन चतुर्दश तोकू, कोई नहीं पाता ॥
ॐ जय अहोई माता ॥
श्री अहोई माँ की आरती, जो कोई गाता ।
उर उमंग अति उपजे, पाप उतर जाता ॥
ॐ जय अहोई माता,
मैया जय अहोई माता ।
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जय अहोई माता! माँ अहोई आप सभी की संतान की रक्षा करें और घर-परिवार में सुख-शांति बनाए रखें।