बाबोसा भगवान को भक्तजन भगवान हनुमान का ही एक दिव्य रूप या अवतार मानते हैं, जो कलियुग में अपने भक्तों को प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनका मार्गदर्शन करते हैं। उनका प्रमुख और प्रसिद्ध धाम राजस्थान के चुरू नगर में स्थित है, जिसे श्रद्धालु प्रेमपूर्वक “चुरू धाम” कहते हैं। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन, अटूट विश्वास और निष्कपट भावना के साथ बाबोसा महाराज की शरण में आता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और कठिन समय में उसे दैवी सहायता अवश्य प्राप्त होती है।
बाबोसा भगवान की भक्ति में मंजू बाईसा का विशेष स्थान है—उन्हें उनकी परम आराधिका माना जाता है और कई श्रद्धालु उन्हें बाबोसा का साक्षात् स्वरूप स्वीकार करते हैं। कहा जाता है कि मंजू बाईसा भक्तों को सरल शब्दों में उपदेश देती हैं, उनके कष्ट सुनती हैं और जीवन की समस्याओं का समाधान बताती हैं। बाबोसा भगवान की पूजा में किसी प्रकार का आडंबर या जटिल विधि नहीं होती; यहाँ केवल सच्ची भक्ति, शुद्ध हृदय और विश्वासपूर्ण प्रार्थना ही सबसे बड़ा साधन मानी जाती है। कुल मिलाकर, बाबोसा भगवान एक लोकप्रिय, करुणामय और भक्तवत्सल देवता हैं, जो हनुमान स्वरूप में भक्तों के दुख दूर करते हैं और मंजू बाईसा के माध्यम से अपनी कृपा का अनुभव कराते हैं।
बाबोसा भगवान की आरती का – सार (भावार्थ)
बाबोसा भगवान की आरती चूरू वाले बाबोसा के करुणामय, रक्षक और भक्तवत्सल स्वरूप का भावपूर्ण गुणगान है। आरती की शुरुआत में ही उन्हें भक्तों का रखवाला कहा गया है—जो हर परिस्थिति में अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। “रिमझिम” भाव से उतारी गई आरती यह संकेत देती है कि भक्ति में कोमलता, प्रेम और समर्पण का समावेश है।
आरती में बाबोसा के दिव्य श्रृंगार का सुंदर वर्णन मिलता है—सिर पर मुकुट, कानों में कुंडल और हाथ में सोटा। उनका जगमगाता, निराला रूप ऐसा है कि नकारात्मक शक्तियाँ—भूत-प्रेत और भय—स्वतः दूर भाग जाते हैं। उन्हें माता छगनी के लाले और कोठारी कुल के तारे कहकर उनकी कुल-मर्यादा, गौरव और लोकआस्था को रेखांकित किया गया है।
आगे वर्णन आता है कि बालाजी (हनुमान जी) ने बाबोसा को राजतिलक देकर अपनी गोद में बिठाया—यह उनके अधिष्ठान और दिव्य मान्यता का प्रतीक है। मृगसर पंचमी के अवसर पर लगने वाला मेला भक्तों की उमंग और सामूहिक श्रद्धा को दर्शाता है, जहाँ बाबोसा की कृपा से मन प्रसन्न होता है और जीवन की विपदाएँ दूर होती हैं।
आरती यह भी बताती है कि जो भक्त शुद्ध भक्ति-भाव से बाबोसा की आरती करता है, उसके मन-दर्पण में बाबोसा का वास हो जाता है। उन्हें कलियुग के अवतारी रूप में स्मरण किया गया है—अर्थात् वर्तमान युग में वे शीघ्र फल देने वाले, संकटमोचक और विश्वास का संबल हैं। मंजूदेवी द्वारा गुणगान और गोपाला का शीश नवाना सामूहिक भक्ति, विनय और कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है।
अंत में पुनः यही भाव दृढ़ किया गया है कि चूरू वाले बाबोसा अपने भक्तों के स्थायी संरक्षक हैं। उनकी आरती करने से भय का नाश, विपत्तियों से मुक्ति और हृदय में आनंद का संचार होता है।
“बाबोसा भगवान की आरती” हमें यह सिखाती है कि बाबोसा रक्षा, साहस और करुणा के प्रतीक हैं। उनकी भक्ति से नकारात्मकता दूर होती है, मन में विश्वास जागता है और जीवन में शांति, सुरक्षा व मंगल स्थापित होता है। जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से इस आरती का पाठ करता है, उसे बाबोसा की कृपा से कठिन समय में सहारा और सफलता का मार्ग मिलता है।
बाबोसा भगवान की आरती – Babosa Bhagwan Aarti
देवा बाबोसा चूरू वाले,
भक्तो के है रखवाले,
रिम झिम उतारे तेरी आरती,
बाबोसा रिम झिम उतारे तेरी आरती ॥
सिर पे मुकुट कान में कुंडल,
हाथ में सोटा साजे,
जग मग जग मग रूप निराला,
जग मग जग मग रूप निराला,
भुत प्रेत सब भागे,
जय हो माता छगनी के लाले,
कोठारी कुल के तारे,
रिम झिम उतारे तेरी आरती,
बाबोसा रिम झिम उतारे तेरी आरती ॥
बालाजी ने राज तिलक से,
अपनी गोद बिठाया,
मृगसर पांचू भरे है मेला,
मृगसर पांचू भरे है मेला,
भक्तो के मन है भाया,
सबके मन को हरषाने वाले,
विपदा मिटाने वाले,
रिम झिम उतारे तेरी आरती,
बाबोसा रिम झिम उतारे तेरी आरती ॥
भक्ति भाव से करे आरती,
तेरे सारे पुजारी,
मन दर्पण में बसों बाबोसा,
मन दर्पण में बसों बाबोसा,
कलयुग के अवतारी,
तेरा मंजूदेवी गुण गाये,
गोपाला शीश नवाये,
रिम झिम उतारे तेरी आरती,
बाबोसा रिम झिम उतारे तेरी आरती ॥
देवा बाबोसा चूरू वाले,
भक्तो के है रखवाले,
रिम झिम उतारे तेरी आरती,
बाबोसा रिम झिम उतारे तेरी आरती ॥
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