भगवान गिरिधारी जी की आरती – Bhagwan Giridhari Ji Ki Aarti

भगवान गिरिधारी आरती – सार (भावार्थ)

भगवान गिरिधारी जी की आरती” भगवान श्रीकृष्ण के गिरिधर स्वरूप की महिमा, करुणा, पराक्रम और भक्तवत्सलता को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने वाली आरती है। इस आरती में श्रीकृष्ण को गोवर्धन धारण करने वाले, दीन-दुखियों के रक्षक और अधर्म के विनाशक के रूप में स्मरण किया गया है। यह आरती भक्त को यह अनुभूति कराती है कि श्रीकृष्ण हर युग में अपने भक्तों की रक्षा करने वाले हैं।

आरती की शुरुआत में भगवान गिरिधारी की जय-जयकार करते हुए उन्हें दानवों के बल का नाश करने वाला और गौ व ब्राह्मणों का हितैषी बताया गया है। यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अवतरित होते हैं तथा समाज के मूल स्तंभों की सुरक्षा करते हैं।

आगे उन्हें गोविन्द, दयानिधि और गोवर्धनधारी कहा गया है। वे करुणा के सागर हैं, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को इन्द्र के कोप से बचाया। वंशीधर, बनवारी और ब्रज-जन प्रिय के रूप में वे अपने मधुर स्वभाव और प्रेमपूर्ण लीलाओं से सभी के हृदय में वास करते हैं।

इस आरती में श्रीकृष्ण की असीम करुणा का विशेष वर्णन है। गणिका, गीध (जटायु), अजामिल और गजेंद्र जैसे अनेक उदाहरणों के माध्यम से बताया गया है कि जो भी सच्चे मन से भगवान की शरण में आता है, उसका उद्धार निश्चित है। वे दुखियों के दुख हरने वाले और संसार में मंगल फैलाने वाले हैं।

श्रीकृष्ण को गोपों के पालनहार, गोपेश्वर और द्रौपदी के दुःख हरने वाले कहा गया है। उन्होंने शबरी को अपनाया, अहिल्या (गौतम पत्नी) का उद्धार किया और यह सिद्ध किया कि भगवान जाति, कुल या योग्यता नहीं, केवल भक्ति देखते हैं

आरती में भक्त प्रह्लाद के रक्षक नृसिंह अवतार का भी स्मरण है, जहाँ उन्होंने दिति-पुत्र हिरण्यकशिपु का संहार किया। यह दर्शाता है कि भगवान आवश्यकता अनुसार किसी भी रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और अधर्म का अंत करते हैं।

महाभारत प्रसंगों के माध्यम से बताया गया है कि श्रीकृष्ण पांडवों के संरक्षक और कौरवों के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं। वे अन्याय के विरुद्ध सदा धर्म के साथ खड़े रहते हैं और अपने भक्तों को विजय दिलाते हैं।

आरती में श्रीकृष्ण के माधुर्य स्वरूप का भी सुंदर चित्रण है। मुरली की मधुर ध्वनि से मन को मोहित करने वाले, वृंदावन के उपवनों में विचरण करने वाले और यमुना तट पर लीलाएँ रचने वाले भगवान सभी के हृदय को आनंद से भर देते हैं।

बाल लीलाओं में अघासुर, बकासुर, तृणावर्त आदि राक्षसों के उद्धार और वध का उल्लेख है। कंस के संहार द्वारा उन्होंने देवताओं और पृथ्वी को भय से मुक्त किया। ब्रह्मा, शिव और सरस्वती जैसे देव भी उनके गुणों का गान करते हैं, जिससे उनकी सर्वोच्च महिमा प्रकट होती है।

अंत में भगवान नारायण को शरणागतों के पाप हरने वाले बताया गया है। उनके चरणों की रज पवित्र करने वाली है और भक्त उसी की कामना करता है, क्योंकि भगवान की शरण ही जीवन को पावन और सफल बनाती है

निष्कर्ष

यह आरती भगवान गिरिधारी के रक्षक, करुणामय, लीला-पुरुषोत्तम और भक्तवत्सल स्वरूप का भावपूर्ण स्मरण कराती है। जो भी भक्त श्रद्धा से इस आरती का गायन करता है, उसके जीवन से भय, पाप और दुःख दूर होकर शांति, भक्ति और मंगल का संचार होता है।

🙏 जय जय गिरिधारी प्रभु | जय श्रीकृष्ण 🙏

भगवान गिरिधारी जी की आरती – Bhagwan Giridhari Ji Ki Aarti

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।
दानव-दल-बलहारी,गो-द्विज-हितकारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

जय गोविन्द दयानिधि,गोवर्धन-धारी।
वन्शीधर बनवारीब्रज-जन-प्रियकारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

गणिका-गीध-अजामिलगजपति-भयहारी।
आरत-आरति-हारी,जग-मन्गल-कारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

गोपालक, गोपेश्वर,द्रौपदि-दुखदारी।
शबर-सुता-सुखकारी,गौतम-तिय तारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

जन-प्रह्लाद-प्रमोदक,नरहरि-तनु-धारी।
जन-मन-रञ्जनकारी,दिति-सुत-सन्हारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

टिट्टिभ-सुत-सन्रक्षकरक्षक मन्झारी।
पाण्डु-सुवन-शुभकारीकौरव-मद-हारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

मन्मथ मन्मथ मोहन,मुरली-रव-कारी।
वृन्दाविपिन-विहारीयमुना-तट-चारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

अघ-बक-बकीउधारक तृणावर्त-तारी।
बिधि-सुरपति-मदहारी,कन्स-मुक्तिकारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

शेष, महेश, सरस्वतिगुन गावत हारी।
कल कीरति-बिस्तारीभक्त-भीति-हारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।

नारायण शरणागत,अति अघ, अघहारी।
पद-रज पावनकारीचाहत चितहारी॥

जय जय गिरिधारी प्रभु,जय जय गिरिधारी।


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🌸 राधे राधे | जय जय गिरिधारी प्रभु 🌸

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