चित्रगुप्त जी की आरती – Chitragupta Bhagwan Ki Aarti

श्री चित्रगुप्त जी की आरती का – सार (भावार्थ)

चित्रगुप्त जी की आरती धर्म, न्याय और कर्मफल के गूढ़ सिद्धांत को अत्यंत सरल, भक्तिपूर्ण और भावनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। आरती का मूल भाव यह है कि श्री चित्रगुप्त जी समस्त जीवों के कर्मों के साक्षी, लेखाकार और न्यायाधीश हैं, जो निष्पक्ष भाव से पाप-पुण्य का लेखा रखते हैं और भक्तों को उनके कर्मानुसार फल प्रदान करते हैं।

आरती के आरंभ में भगवान चित्रगुप्त जी को हर प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने वाला बताया गया है। वे भक्तों के विघ्नों का नाश करने वाले, मंगलकारी और संतानों को सुख देने वाले देवता हैं। उनका यश तीनों लोकों में फैला हुआ है और वे सच्चे भक्तों के रक्षक माने गए हैं।

उनके दिव्य स्वरूप का सुंदर वर्णन मिलता है—चतुर्भुज रूप, श्यामल कांति, पीतांबर धारण किए हुए, जिनके एक ओर माता इरावती और दूसरी ओर दक्षिणा विराजमान हैं। यह चित्रण उनके संतुलित, न्यायप्रिय और करुणामय स्वभाव को दर्शाता है।

आरती में उन्हें अंतर्यामी कहा गया है, जो मनुष्य के भीतर के भावों और कर्मों तक को जानने वाले हैं। वे कष्टों का निवारण करते हैं, दुष्ट प्रवृत्तियों का संहार करते हैं और सृष्टि के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कलम, दवात, शंख और पत्रिका का उल्लेख उनके कर्मलेखक स्वरूप को स्पष्ट करता है। वैजयन्ती वनमाला से सुशोभित उनका रूप तीनों लोकों को मोहित करने वाला बताया गया है।

आरती यह भी बताती है कि ब्रह्मा जी ने उन्हें सिंहासन का कार्य सौंपा, जिससे प्रसन्न होकर तैंतीस कोटि देवता उनके चरणों में नतमस्तक हुए। राजा सौदास और भीष्म पितामह जैसे महान व्यक्तियों द्वारा उनका स्मरण किए जाने का उल्लेख उनकी महिमा और प्रभाव को दर्शाता है—जहाँ विलंब नहीं, वहीं शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

भक्त भाव से यह स्वीकार करता है कि परिवार, संतान, संबंधी और जीवन की रक्षा करने वाले वही हैं। उनके अतिरिक्त कोई अन्य शरण या आशा का केंद्र नहीं है। वे पिता, बंधु और स्वामी—तीनों रूपों में भक्त का सहारा हैं।

आरती के फलश्रुति भाग में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रेम और श्रद्धा से श्री चित्रगुप्त जी की आरती करता है, वह जन्म-मरण के चक्र (चौरासी लाख योनियों) से मुक्त होकर इच्छित फल प्राप्त करता है। अंत में उन्हें वैकुण्ठ निवासी न्यायाधीश बताया गया है, जिनकी शरण में जाकर भक्त पूर्ण विश्वास और समर्पण का भाव प्रकट करता है।

समग्र रूप से, यह आरती श्री चित्रगुप्त जी को कर्म के निष्पक्ष न्यायाधीश, करुणामय रक्षक और भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले देवता के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह भक्त को सत्कर्म, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है—यही इस आरती का सार और आध्यात्मिक संदेश है।

चित्रगुप्त जी की आरती – Chitragupta Bhagwan Ki Aarti

ॐ जय चित्रगुप्त हरे,स्वामी जय चित्रगुप्त हरे।
भक्त जनों के इच्छित,फल को पूर्ण करे॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

विघ्न विनाशक मंगलकर्ता,सन्तन सुखदायी।
भक्तन के प्रतिपालक,त्रिभुवन यश छायी॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

रूप चतुर्भुज,श्यामल मूरति, पीताम्बर राजै।
मातु इरावती,दक्षिणा, वाम अङ्ग साजै॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

कष्ट निवारण, दुष्ट संहारण,प्रभु अन्तर्यामी।
सृष्टि संहारण, जन दुःख हारण,प्रकट हुये स्वामी॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

कलम, दवात, शङ्ख,पत्रिका, कर में अति सोहै।
वैजयन्ती वनमाला,त्रिभुवन मन मोहै॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

सिंहासन का कार्य सम्भाला,ब्रह्मा हर्षाये।
तैंतीस कोटि देवता,चरणन में धाये॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

नृपति सौदास, भीष्म पितामह,याद तुम्हें कीन्हा।
वेगि विलम्ब न लायो,इच्छित फल दीन्हा॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

दारा, सुत, भगिनी,सब अपने स्वास्थ के कर्ता।
जाऊँ कहाँ शरण में किसकी,तुम तज मैं भर्ता॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

बन्धु, पिता तुम स्वामी,शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा,आस करूँ जिसकी॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

जो जन चित्रगुप्त जी की आरती,प्रेम सहित गावैं।
चौरासी से निश्चित छूटैं,इच्छित फल पावैं॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥

न्यायाधीश बैकुण्ठ निवासी,पाप पुण्य लिखते।
हम हैं शरण तिहारी,आस न दूजी करते॥

ॐ जय चित्रगुप्त हरे…..॥


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🙏 श्री चित्रगुप्त जी आप सभी को सद्बुद्धि, सत्कर्म और उत्तम फल प्रदान करें।

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