गुरु गोरखनाथ जी की आरती का – सार (भावार्थ)
गोरखनाथ जी की आरती नाथ संप्रदाय के आदियोगी, गुरु गोरखनाथ जी की महिमा, करुणा और योगमय स्वरूप का भक्तिपूर्ण वर्णन है। इसमें गुरुजी को ऐसे दिव्य मार्गदर्शक के रूप में नमन किया गया है जो साधक को संसारिक बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक उत्थान की ओर ले जाते हैं।
आरती की शुरुआत में भक्त गुरु गोरखनाथ जी से नित्य कृपा की याचना करता है और अपने जीवन को उनकी सेवा में समर्पित करने का संकल्प व्यक्त करता है। यह भाव दर्शाता है कि सच्ची भक्ति केवल वाणी से नहीं, बल्कि कर्म और साधना से होती है।
गुरुजी के दिव्य स्वरूप का मनोहारी चित्रण किया गया है—उनकी जटाएँ, मस्तक पर शोभायमान चंद्रमा, कानों में कुंडल और गले में नाग, साथ ही शरीर पर भस्म—ये सभी योग, वैराग्य और तपस्या के प्रतीक हैं। यह रूप बताता है कि वे केवल योगी ही नहीं, बल्कि आदि पुरुष, योगेश्वर और संतों के हितैषी हैं, जो संसार को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाते हैं।
आरती में गुरु गोरखनाथ जी को “नाथ निरंजन” कहा गया है—अर्थात् वे निर्गुण, निष्कलंक और सर्वव्यापी हैं। वे हर प्राणी के हृदय में वास करते हैं और अपने भक्तों पर कृपा करके उन्हें यम के बंधनों से मुक्त करते हैं। यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति मृत्यु के भय से ऊपर उठाकर मोक्ष की ओर ले जाती है।
आगे बताया गया है कि ऋद्धि-सिद्धियाँ और माया भी उनके चरणों में दासी बनकर रहती हैं। यानी जिन सांसारिक शक्तियों और आकर्षणों के पीछे मनुष्य भागता है, वे सब गुरुजी की शरण में तुच्छ हैं। गुरु गोरखनाथ जी को अलख, अवधूत और उत्तराखंड वासी योगी के रूप में स्मरण किया गया है, जो रूप-रंग से परे, अद्भुत और अवर्णनीय हैं।
आरती में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गुरुजी अगम, अगोचर, अकथ और अरूपी हैं—अर्थात् वे सामान्य इंद्रियों से परे हैं और शब्दों में पूर्णतः व्यक्त नहीं किए जा सकते। फिर भी वे योगियों और साधकों के सदा रक्षक बने रहते हैं, उन्हें भटकने से बचाते हैं और आत्ममार्ग पर स्थिर करते हैं।
देवताओं द्वारा भी गुरु गोरखनाथ जी की महिमा का गुणगान किया गया है—ब्रह्मा, विष्णु, नारद, शारदा और देवगण उनके चरणों में चित्त लगाकर नित्य स्तुति करते हैं। यह बताता है कि गुरुजी की सत्ता केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं, बल्कि त्रिलोक में पूज्य है।
चारों युगों—सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—में उनकी दिव्य उपस्थिति का उल्लेख है। वे हर युग में योगी रूप धारण कर अधर्म, भय और अज्ञान का नाश करते हैं। यह संदेश देता है कि सच्चे गुरु की शक्ति कालातीत होती है और हर युग में मानवता का मार्गदर्शन करती है।
अंत में, आरती गाने के फल का उल्लेख है—जो भक्त नित्य श्रद्धा से गुरु गोरखनाथ जी की आरती का गान करता है, वह संसारिक बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष और परम शांति प्राप्त करता है। यह आरती साधक को यह विश्वास देती है कि गुरु की शरण में आने से जीवन सार्थक होता है और आत्मा को परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
गुरु गोरखनाथ जी की यह आरती योग, भक्ति, वैराग्य और करुणा का संगम है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा गुरु ही अज्ञान से प्रकाश की ओर ले जाता है, माया से ऊपर उठाकर आत्मबोध कराता है और अंततः मोक्ष का द्वार खोलता है। जो भी भक्त प्रेम, श्रद्धा और निष्ठा से इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में शांति, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति निश्चित होती है।
गोरखनाथ जी की आरती – Guru Gorakhnath Ji Ki Aarti
जय गोरख देवा, जय गोरख देवा।
कर कृपा मम ऊपर, नित्य करूं सेवा॥
शीश जटा अति सुन्दर, भाल चन्द्र सोहे।
कानन कुण्डल झलकत , निरखत मन मोहे॥
गल सेली विच नाग सुशोभित, तन भस्मी धारी।
आदि पुरुषयोगीश्वर, सन्तन हितकारी॥
नाथ निरंजन आप ही, घट-घट के वासी।
करत कृपा निज जन पर, मेटत यम फांसी॥
ऋद्धि सिद्धि चरणों में लोटत, माया है दासी।
आप अलख अवधूता, उत्तराखण्ड वासी॥
अगम अगोचर अकथ, अरूपी सबसे हो न्यारे।
योगीजन के आप ही, सदा हो रखवारे॥
ब्रह्मा विष्णु तुम्हारा, निशदिन गुण गावें।
नारद शारद सुर मिल, चरनन चित लावें॥
चारों युग में आप विराजत, योगी तन धारी।
सतयुग द्वापर त्रेता, कलयुगभय टारी॥
गुरु गोरख नाथ की आरती, निशदिन जो गावे।
विनवत बाल त्रिलोकी, मुक्ति फल पावे॥
यदि यह गुरु गोरखनाथ जी की आरती का सार आपको आध्यात्मिक शांति दे सका हो, तो कृपया इसे Like करें, अपने अनुभव Comment में साझा करें और इस भक्ति-संदेश को अधिक से अधिक श्रद्धालुओं तक पहुँचाने के लिए Share करें।