गुरू रविदास जयंती – Guru Ravidas Jayanti

गुरू रविदास जी का जीवन परिचय: समाज परिवर्तन, समता और मानवता के महान प्रेरक

भक्तमाल में वर्णित रवि दास, जिन्हें संसार गुरू रविदास के नाम से अधिक जानता है, भारतीय भक्ति आंदोलन के एक अत्यंत प्रभावशाली संत माने जाते हैं। उन्हें रैदास, गुरु रविदास, संत रविदास, भक्त रविदास, रोहिदास और रुहिदास जैसे अनेक सम्मानित नामों से पुकारा गया। उनकी आराध्या भगवान कृष्ण थे, जिनके प्रति उनकी भक्ति पूर्णतः निर्गुण भाव से ओत-प्रोत थी।

पंचांग के अनुसार हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को संत रविदास जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यही वह पावन दिन है, जब गुरु रविदास जी का जन्म हुआ था, इसलिए यह तिथि उनके अनुयायियों के लिए आस्था, स्मरण और प्रेरणा का विशेष अवसर मानी जाती है। उनका जन्मस्थान वाराणसी था, जो उस समय आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र माना जाता था। वे विवाहित थे और सामान्य गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन्होंने गहरी आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त किया।

संत रविदास हिंदी और पंजाबी भाषा में अपनी वाणी प्रकट करते थे, जिससे उनकी शिक्षाएँ जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँचीं। उनके पिता संतोख दास और माता माता कलसी थीं, जिन्होंने उन्हें संस्कार और सहनशीलता का भाव दिया। संत रविदास के विचार निर्गुण दर्शन से गहराई से जुड़े थे और उन्होंने अपने उपदेशों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि ईश्वर भक्ति में जाति, भेद और बाहरी आडंबर का कोई स्थान नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और आत्मिक शुद्धता ही परम मार्ग है।

गुरु रविदास जी 15वीं शताब्दी के ऐसे महान संत, दार्शनिक, कवि और समाज सुधारक थे, जिन्होंने अपने जीवन और विचारों से भक्ति, समानता और मानवता का संदेश दिया। उनके पावन जन्मोत्सव को रविदास जयंती के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वे निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं और उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। संत रविदास जी ने अपने ओजस्वी काव्य और वाणी के माध्यम से ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम, सामाजिक कुरीतियों के विरोध और आत्मिक शुद्धता का मार्ग दिखाया।

इतिहास से जुड़ी जानकारियों के अनुसार गुरु रविदास जी का जन्म वर्ष 1377 ईस्वी माना जाता है, हालांकि कुछ विद्वानों की मान्यता है कि उनका जन्म 1399 ईस्वी में माघ पूर्णिमा के पावन दिन हुआ था। इसी प्रकार, ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार संत रविदास जी का देहावसान लगभग 1518 ईस्वी में वाराणसी में हुआ माना जाता है। संत परंपरा यह मानती है कि उन्होंने स्वाभाविक और शांत रूप से अपने जीवन की लीला पूर्ण की। उनके जीवन का मूल संदेश भक्ति, मानवता और समानता पर आधारित था, और उन्होंने अपने शिष्यों के साथ सहज, सरल और शांतिपूर्ण जीवन जीते हुए मुक्ति की अवस्था प्राप्त की। चूँकि रविदास जी की मृत्यु का सटीक समय और कारण ऐतिहासिक रूप से स्पष्ट नहीं है, इसलिए इससे जुड़ी जानकारी परंपराओं और लोकविश्वासों पर अधिक आधारित मानी जाती है।

संत रविदास जयंती कैसे मनाई जाती है?

रविदास जयंती के दिन उनके अनुयायी प्रातःकाल पवित्र नदियों में स्नान कर आत्मशुद्धि का संकल्प लेते हैं। इसके बाद वे गुरु रविदास जी के जीवन प्रसंगों, शिक्षाओं और चमत्कारों का स्मरण करते हुए प्रेरणा ग्रहण करते हैं। अनेक श्रद्धालु उनके जन्मस्थल पर जाकर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और भजन-कीर्तन के माध्यम से उनका जन्मदिन उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

संत रविदास जी को गुरु रविदास, संत रविदास, भक्त रविदास, रैदास, रोहिदास और रूहिदास जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। वे एक मानवतावादी चिंतक, धार्मिक मार्गदर्शक और महान कवि थे, जिन्होंने समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव के विरुद्ध निर्भीक स्वर उठाया। उनका संबंध चर्मकार (चमार) समुदाय से माना जाता है, फिर भी उनके विचार समूची मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक रहे। उनके 40 पद श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं, जो उनकी आध्यात्मिक गहराई और सार्वभौमिक सोच को दर्शाते हैं। उनकी रचनाएँ ईश्वर, गुरु, ब्रह्मांड और प्रकृति के साथ प्रेम का संदेश देती हैं और मनुष्य के भीतर निहित सद्गुणों को जाग्रत करने पर बल देती हैं। वे संत कबीर के समकालीन भी थे।

हर वर्ष माघ मास की पूर्णिमा, अर्थात माघ पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। विशेष रूप से वाराणसी में यह दिन एक महान उत्सव का रूप ले लेता है। आज भी श्रद्धालु उनके भजन और पद गाकर उनकी शिक्षाओं को जीवंत रखते हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र में संत रविदास जी को विशेष श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजा जाता है, जहाँ उनकी विचारधारा आज भी समाज को समरसता और प्रेम का मार्ग दिखा रही है।

संत रविदास जी के अनमोल विचार

  1. निरंतर कर्म करते रहना ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है, क्योंकि शुभ कर्मों का फल समय आने पर स्वतः सौभाग्य बनकर सामने आता है।
  2. यदि भलाई करना संभव न हो, तो कम से कम इतना अवश्य करें कि किसी का अहित न हो
  3. सुस्ती और आलस्य जीवन की सबसे बड़ी बाधा हैं, जबकि मेहनत और परिश्रम मनुष्य के सबसे विश्वसनीय साथी होते हैं।
  4. मनुष्य की पहचान जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसके आचरण और कर्मों से होती है।
  5. संत रविदास जी ऐसे समाज का स्वप्न देखते थे, जहाँ हर व्यक्ति को भोजन मिले, सभी समान हों और संतोषपूर्ण जीवन जिएँ।
  6. जहाँ प्रेम का अभाव होता है, वहाँ दुःख और पीड़ा का वास होता है; और जहाँ प्रेम होता है, वहीं स्वर्ग का अनुभव मिलता है।
  7. सभी पंथ और मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं और हर मानव समान सम्मान का अधिकारी है।
  8. पूजा, साधना और भक्ति बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि मन की शुद्धता से पूर्ण होती हैं, क्योंकि परमात्मा शुद्ध मन में ही निवास करते हैं
  9. यदि अंतःकरण पवित्र हो, तो साधारण सा स्थान भी तीर्थ के समान पावन बन जाता है।
  10. प्रेम ही जीवन का सार है और वही ईश्वर का वास्तविक स्वरूप है।
  11. माता, पिता और गुरु का सम्मान देवताओं के समान करना चाहिए।
  12. यदि तुम पुष्प नहीं बन सकते, तो कम से कम किसी के मार्ग में पीड़ा मत बिखेरो
  13. निर्मल मन वाले व्यक्ति के लिए पवित्रता किसी विशेष स्थान की मोहताज नहीं रहती।
  14. फूल बनना संभव न हो, तो भी दूसरों को चुभने वाला कांटा मत बनो।
  15. ईश्वर उन्हीं हृदयों में वास करते हैं, जो ईर्ष्या, लोभ और अहंकार से पूर्णतः मुक्त होते हैं।

संत रविदास और गंगा जी की कहानी – मन चंगा तो कठौती में गंगा

एक दिन संत रैदास (गुरु रविदास जी) अपनी कुटिया में बैठकर ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने कार्य में लीन थे। उसी समय एक ब्राह्मण वहाँ पहुँचा और ससम्मान प्रणाम कर बोला कि वह गंगा स्नान के लिए जा रहा है और मार्ग में दर्शन करने चला आया। यह सुनकर रविदास जी ने स्नेहपूर्वक कहा कि यदि आप गंगा मैया के दर्शन करने जा रहे हैं, तो यह मुद्रा मेरी ओर से उन्हें अर्पित कर दीजिए। ब्राह्मण जब गंगा तट पर पहुँचा और स्नान के उपरांत जैसे ही वह मुद्रा जल में अर्पित करने लगा, तभी गंगा मैया स्वयं जल से प्रकट हुईं, उन्होंने वह मुद्रा अपने हाथों से स्वीकार की और बदले में ब्राह्मण को सोने का एक कंगन प्रदान किया।

ब्राह्मण वह दिव्य कंगन लेकर लौट रहा था, तभी उसके मन में विचार आया कि यदि यह कंगन नगर के राजा को भेंट कर दिया जाए तो राजा अत्यंत प्रसन्न होंगे। उसने राजा को वह कंगन भेंट कर दिया। राजा ने प्रसन्न होकर उसे अनेक मुद्राएँ प्रदान कीं और उसकी झोली भर दी। ब्राह्मण धन लेकर अपने घर चला गया। उधर राजा ने वह कंगन महारानी को प्रेमपूर्वक पहनाया। महारानी कंगन की सुंदरता देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं, किंतु उन्होंने राजा से कहा कि कंगन तो बहुत सुंदर है, पर यदि ऐसा ही एक और कंगन मिल जाए तो आनंद और बढ़ जाएगा।

राजा ने वचन देते हुए कहा कि वह वैसा ही एक और कंगन शीघ्र मंगवाएंगे। राजा ने उसी ब्राह्मण को संदेश भिजवाया कि तीन दिन के भीतर वैसा ही दूसरा कंगन प्रस्तुत करे, अन्यथा उसे कठोर दंड भुगतना पड़ेगा। यह सुनते ही ब्राह्मण घबरा गया। उसे अपने निर्णय पर गहरा पछतावा होने लगा कि वह राजा के पास गया ही क्यों, अब दूसरा कंगन कहाँ से लाए। घबराहट में वह पुनः रविदास जी की कुटिया पहुँचा और संपूर्ण घटना उन्हें बता दी।

संत रविदास जी ने करुणा से उसकी बात सुनी और बोले कि बिना बताए राजा को कंगन देना कोई अपराध नहीं है, पछताने की आवश्यकता नहीं। यदि वह कंगन तुम स्वयं भी रख लेते, तब भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होती, और आज भी मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। फिर उन्होंने कहा कि अब इस ब्राह्मण की लाज गंगा मैया के हाथों में है। इतना कहकर उन्होंने अपनी वह कठौती उठाई, जिसमें वे चमड़ा गलाने का कार्य करते थे और जिसमें जल भरा हुआ था।

रविदास जी ने गंगा मैया का आह्वान किया और कठौती के जल का छिड़काव किया। उसी क्षण गंगा मैया प्रकट हुईं और संत रविदास जी के आग्रह पर उन्होंने ब्राह्मण को एक और स्वर्ण कंगन प्रदान किया। ब्राह्मण आनंदित होकर राजा के पास गया और दूसरा कंगन भेंट कर दिया। इस पूरे प्रसंग में संत रविदास जी ने अपने बड़प्पन और महिमा का कोई अहंकार नहीं दिखाया, बल्कि पूर्ण विनम्रता और करुणा के साथ ब्राह्मण की सहायता की। यही उनकी महानता और संतत्व का सच्चा प्रमाण है।

एक अन्य प्रसंग में बताया जाता है कि एक बार किसी पर्व के अवसर पर उनके पड़ोसी गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। संत रविदास जी के एक शिष्य ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया। तब उन्होंने शांत भाव से कहा कि गंगा स्नान अवश्य पुण्यदायक है, किंतु आज उन्होंने एक व्यक्ति को जूते बनाकर देने का वचन दिया है। यदि वह वचन पूरा नहीं हुआ तो उनका धर्म भंग होगा। ऐसे में यदि मन अधूरा कार्य छोड़कर गंगा जाए, तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा

उन्होंने समझाया कि मन जिस कार्य के लिए अंतःकरण से तैयार हो, वही कार्य करना उचित है। यदि मन पवित्र और सच्चा है, तो कठौती के जल में भी गंगा स्नान के समान पुण्य प्राप्त हो सकता है। माना जाता है कि इसी प्रसंग के बाद वह प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई— “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

यह कथा संत रविदास जी के कर्मयोग, सत्यनिष्ठा और आंतरिक शुद्धता की जीवंत मिसाल है, जो आज भी भक्तों को सच्ची भक्ति और नैतिक जीवन की प्रेरणा देती है।


यदि संत रविदास जी की समाज परिवर्तन, समता और मानवता से प्रेरित जीवन यात्रा, उनकी जयंती की परंपराएँ, अनमोल विचार और “मन चंगा तो कठौती में गंगा” जैसी प्रेरक कथा ने आपके हृदय को स्पर्श किया हो, तो नीचे अपनी भावनाएँ कमेंट में साझा करें, इस दिव्य संदेश को अपने परिवार और मित्रों के साथ शेयर करें, और ऐसे ही धार्मिक-आध्यात्मिक लेखों के लिए हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब करें।🙏

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