शनिवार की आरती – जय जय शनि देव आरती – Jai Jai Shani Deva

शनिवार की आरती – श्री शनि देव का सार (विस्तृत अर्थ)

यह आरती न्याय, कर्मफल और अनुशासन के अधिदेवता श्री शनि देव की महिमा का भक्तिपूर्ण वर्णन करती है। आरती में शनि देव को ऐसे दिव्य नियंता के रूप में स्मरण किया गया है जिनकी सत्ता समस्त सृष्टि में व्याप्त है और जिनकी सेवा असंख्य जीव करते हैं। यह भाव स्थापित करता है कि शनि देव केवल ग्रह नहीं, बल्कि कर्म के निष्पक्ष न्यायाधीश हैं, जो प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।

आरती का पहला संदेश अत्यंत स्पष्ट है—जहाँ शनि देव अप्रसन्न होते हैं, वहाँ घोर कष्ट का सामना करना पड़ता है। धन, वैभव, मान और प्रतिष्ठा क्षणभर में नष्ट हो सकते हैं। इसी संदर्भ में राजा नल का उदाहरण दिया गया है, जिनकी शनि दशा के कारण उनका राजपाट छिन गया। यह प्रसंग बताता है कि शनि देव की परीक्षा से राजा हो या सामान्य जन, कोई भी अछूता नहीं—कर्म के नियम सब पर समान रूप से लागू होते हैं।

इसके विपरीत, आरती यह भी सिखाती है कि जब शनि देव प्रसन्न होते हैं, तो साधक को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। उनकी कृपा हो तो संसार में कोई भी शक्ति भक्त को पीड़ा नहीं पहुँचा सकती। यह शनि देव के रक्षक और कल्याणकारी स्वरूप को उजागर करता है—जो कठोर दंडदाता होने के साथ-साथ सच्चे भक्तों के लिए अत्यंत दयालु भी हैं।

आरती में शनि उपासना के सरल उपायों का भी उल्लेख है—विशेष रूप से ताँबा, तेल और तिल से सेवा। यह दर्शाता है कि शनि देव भव्यता से नहीं, बल्कि निष्ठा, सादगी और नियमबद्ध भक्ति से प्रसन्न होते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से भक्त अपनी अहंकार-रहित साधना और कर्मशुद्धि का संकल्प व्यक्त करता है।

आगे बताया गया है कि हर शनिवार शनि देव की जय-जयकार संसार में गूंजती है और कलियुग में शनिदेव का महत्त्व अत्यंत बढ़ जाता है। वे न केवल दुख और दरिद्रता को दूर करते हैं, बल्कि जीवन में अनुशासन, धैर्य और न्याय का मार्ग भी दिखाते हैं। यह संकेत करता है कि कलियुग की अव्यवस्था में शनि उपासना स्थिरता और नैतिक संतुलन प्रदान करती है।

आरती के अंत में भक्त भक्ति-भाव से आरती करने और मेवा अर्पित करने की बात करता है। यह भाव बताता है कि सच्ची शनि भक्ति बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि नियमित साधना, विनम्रता और कर्मशुद्धि से जुड़ी होती है। ऐसा करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट, दरिद्रता तथा बाधाएँ क्रमशः दूर होती जाती हैं।

शनिवार की यह आरती श्री शनि देव के न्यायप्रिय, अनुशासक और करुणामय स्वरूप का संतुलित दर्शन कराती है। यह हमें सिखाती है कि शनि देव कर्मों का फल देने वाले निष्पक्ष देवता हैं—अधर्म पर कठोर और भक्ति पर अत्यंत दयालु। जो भक्त नियमित शनिवार को श्रद्धा, सादगी और समर्पण से उनकी आरती करता है, ताँबा, तेल और तिल से सेवा करता है तथा अपने कर्मों को शुद्ध करता है, उसके जीवन में दुःख-दरिद्रता का नाश, बाधाओं से मुक्ति और स्थायी शांति का संचार होता है।

शनिवार की आरती – जय जय शनि देव आरती – Jai Jai Shani Deva

जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा।
अखिल सृष्टि में कोटि-कोटिजन
करें तुम्हारी सेवा।

जय शनि देवा, जय शनि देवा…॥

जा पर कुपित होउ तुम स्वामी,
घोर कष्ट वह पावे।
धन वैभव और मान-कीर्ति,
सब पलभर में मिट जावे।
राजा नल को लगी शनि दशा,
राजपाट हर लेवा।

जय शनि देवा, जय शनि देवा…॥

जा पर प्रसन्न होउ तुम स्वामी,
सकल सिद्धि वह पावे।
तुम्हारी कृपा रहे तो,
उसको जग में कौन सतावे।
ताँबा, तेल और तिल से जो,
करें भक्तजन सेवा।

जय शनि देवा, जय शनि देवा…॥

हर शनिवार तुम्हारी,
जय-जय कार जगत में होवे।
कलियुग में शनिदेव महात्तम,
दुःख दरिद्रता धोवे।
करू आरती भक्ति भाव से
भेंट चढ़ाऊं मेवा।

जय शनि देवा, जय शनि देवा…॥


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