श्री विश्वकर्मा आरती का – सार (भावार्थ)
विश्वकर्मा जी की आरती सृष्टि-रचना, ज्ञान-विकास, शिल्प-कौशल और भक्तवत्सलता का अत्यंत सारगर्भित वर्णन करती है। इस आरती का मूल भाव यह है कि भगवान विश्वकर्मा सम्पूर्ण सृष्टि के कर्ता, रक्षक और धर्म की मर्यादा को स्थापित करने वाले दिव्य शिल्पकार हैं, जिनकी कृपा से संसार में व्यवस्था, संतुलन और प्रगति संभव है।
आरती की शुरुआत में प्रभु विश्वकर्मा को सकल सृष्टि का रचयिता और संरक्षक बताया गया है। वे केवल भौतिक निर्माण के देवता नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा की रक्षा करने वाले भी हैं। उनकी स्तुति करने से जीवन में स्थिरता और उद्देश्य की प्राप्ति होती है।
आगे बताया गया है कि सृष्टि के प्रारंभ में उन्होंने विधाता (ब्रह्मा) को वेद-श्रुति का उपदेश दिया, जिससे समस्त जीव-जगत में ज्ञान का विकास हुआ। यह पंक्ति यह दर्शाती है कि विश्वकर्मा जी ज्ञान, विद्या और बौद्धिक उन्नति के भी मूल स्रोत हैं।
ऋषि अंगीरा के प्रसंग के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि केवल कठोर तप से ही सिद्धि नहीं मिलती, बल्कि प्रभु विश्वकर्मा के ध्यान और शरण से ही संपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। जब ऋषि ने प्रभु का ध्यान किया, तब उन्हें शांति और सफलता दोनों प्राप्त हुईं।
आरती में रोगग्रस्त राजा की कथा यह स्पष्ट करती है कि प्रभु विश्वकर्मा संकट मोचन हैं। जो भी दुख, रोग या विपत्ति में उनकी शरण आता है, वे उसके कष्ट दूर कर जीवन में पुनः आशा का संचार करते हैं।
रथकार दंपति की विनय सुनकर उनकी सभी विपत्तियाँ हर लेने का उल्लेख प्रभु की करुणा और भक्त-रक्षा के भाव को प्रकट करता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती।
आरती में भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूपों का वर्णन है—एकानन, चतुरानन, पंचानन, त्रिभुज, चतुर्भुज और दशभुज। यह दर्शाता है कि वे सर्वशक्तिमान हैं और सृष्टि के प्रत्येक कार्य के लिए उपयुक्त रूप धारण करने में सक्षम हैं।
यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रभु के चरणों का ध्यान करता है, उसकी मानसिक द्विविधा समाप्त हो जाती है, उसे अटल शक्ति प्राप्त होती है और जीवन में सही दिशा मिलती है।
अंत में फलश्रुति के रूप में बताया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से श्री विश्वकर्मा जी की आरती गाता है, उसे सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।
समग्र सार
यह आरती हमें यह सिखाती है कि निर्माण, श्रम, कौशल और ज्ञान भी ईश्वर-भक्ति का ही स्वरूप हैं। भगवान विश्वकर्मा की आराधना से न केवल कार्यक्षेत्र में सफलता मिलती है, बल्कि जीवन में संतुलन, धैर्य और स्थायित्व भी आता है। यही इस आरती का गहन आध्यात्मिक और कर्मयोगी सार है।
विश्वकर्मा जी की आरती – Vishwakarma Ji Ki Aarti
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता,
रक्षक स्तुति धर्मा ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
आदि सृष्टि मे विधि को,
श्रुति उपदेश दिया ।
जीव मात्र का जग में,
ज्ञान विकास किया ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
ऋषि अंगीरा तप से,
शांति नहीं पाई ।
ध्यान किया जब प्रभु का,
सकल सिद्धि आई ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
रोग ग्रस्त राजा ने,
जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर,
दूर दुःखा कीना ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
जब रथकार दंपति,
तुम्हारी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना,
विपत सगरी हरी ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
एकानन चतुरानन,
पंचानन राजे।
त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज,
सकल रूप साजे ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
ध्यान धरे तब पद का,
सकल सिद्धि आवे ।
मन द्विविधा मिट जावे,
अटल शक्ति पावे ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
श्री विश्वकर्मा की आरती,
जो कोई गावे ।
भजत गजानांद स्वामी,
सुख संपति पावे ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु,
जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के करता,
रक्षक स्तुति धर्मा ॥
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🙏 जय श्री विश्वकर्मा! प्रभु आप सभी को उत्तम विद्या, कुशलता, सफलता और स्थायी समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।