द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, तब उनसे ठीक पहले माँ दुर्गा ने योगमाया के रूप में दिव्य अवतार धारण किया। यह अवतार स्थायी नहीं था, बल्कि एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रकट हुआ था। योगमाया का यह स्वरूप ब्रह्मांडीय योजना का वह अदृश्य सूत्र था, जिसके द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के अवतार कार्य को सफल बनाया गया।
गर्ग पुराण के अनुसार, माता देवकी के सातवें गर्भ को स्वयं योगमाया ने रहस्यमय रूप से परिवर्तित कर रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया, जिससे भगवान बलराम का जन्म हुआ। यही योगमाया आगे चलकर नंदनंदन कृष्ण की बहन के रूप में अवतरित हुईं। उनका जन्म यशोदा माता के गर्भ से हुआ, किंतु उस समय यशोदा गहन निद्रा में थीं, इसलिए उन्होंने इस बालिका को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा।
जब मथुरा के कारागार में देवकी के आठवें पुत्र श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब वसुदेव उन्हें गुप्त रूप से गोकुल ले गए और यशोदा के पास सुला दिया। इस प्रकार जब यशोदा की आँख खुली, तो उन्होंने कन्या के स्थान पर एक दिव्य पुत्र को पाया। उधर, यशोदा के यहाँ जन्मी उस बालिका—जो स्वयं योगमाया थीं—को वसुदेव मथुरा वापस ले आए।
कंस ने जब उस बालिका को मारने का प्रयास किया, तब वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुई और दिव्य वाणी के साथ अंतर्ध्यान हो गई। इसी घटना से यह रहस्य उद्घाटित हुआ कि योगमाया कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की ज्येष्ठ बहन और स्वयं महाशक्ति का स्वरूप थीं।
भारत की राजधानी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित माँ योगमाया का प्राचीन मंदिर उनके इसी दिव्य स्वरूप की स्मृति को संजोए हुए है। यह मंदिर महाभारत काल से अस्तित्व में माना जाता है और इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव—दिल्ली के उजड़ने और पुनः बसने—का साक्षी रहा है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ योगमाया ने भगवान श्रीकृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या के रूप में कार्य करते हुए कंस, चाणूर, मुष्टिक जैसे बलशाली असुरों के विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीमद्भागवत पुराण में उन्हें विंध्यवासिनी देवी के रूप में संबोधित किया गया है, जबकि शिवपुराण में उन्हें माता सती का अंश बताया गया है। इस प्रकार योगमाया को शक्ति, रहस्य और दैवी संरक्षण की प्रतीक देवी के रूप में स्वीकार किया जाता है।
माँ योगमाया की आरती का – सार (भावार्थ)
यह आरती माँ योगमाया के करुणामय, रक्षक और कल्याणकारी स्वरूप का भावपूर्ण गुणगान है। आरती का मूल भाव यह है कि माँ अपने भक्तों को “शीतल छाया” प्रदान करती हैं—अर्थात् जीवन की तपिश, चिंता और कष्टों से बचाकर मन को शांति, आश्वासन और सुरक्षा देती हैं। माँ योगमाया की उपासना से भक्त को आंतरिक स्थिरता और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त होता है।
आरती में माँ को “कुलरक्षक” कहा गया है, जो परिवार, समाज और वंश की रक्षा करने वाली शक्ति हैं। उन्हें “ग्वालों की दाती” कहा जाना यह संकेत देता है कि वे अपने आश्रितों और सेवाभाव से जुड़े जनों की पालनहार हैं—जो सरल हृदय से उनकी शरण में आते हैं, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति माँ स्वयं करती हैं। साथ ही, माँ को “कल्याणी” कहा गया है, जो क्षणभर में कष्टों का निवारण कर देती हैं—यह उनकी त्वरित करुणा और दयालुता को दर्शाता है।
अगली पंक्तियाँ माँ के शक्ति-स्वरूप को रेखांकित करती हैं। उन्हें धरती की शक्ति और पर्वत (नग) की महिमा का अधिष्ठान बताया गया है—अर्थात् वे सृष्टि की स्थिरता, संरक्षण और संतुलन की आधारशिला हैं। आरती स्पष्ट करती है कि माँ सबके मन की इच्छाओं को पूर्ण करती हैं; पर यह पूर्ति केवल भौतिक कामनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मिक शांति, विवेक और धर्ममय मार्गदर्शन भी प्रदान करती है।
आरती का प्रार्थना-भाग अत्यंत आत्मीय है—भक्त माँ से सदैव कृपा बनाए रखने का वर माँगता है, उनके दर्शन की याचना करता है और स्वयं को धन्य करने की कामना व्यक्त करता है। यह दर्शाता है कि सच्चे भक्त के लिए सबसे बड़ा वर माँ की कृपा और सान्निध्य है; दर्शन मात्र से जीवन पवित्र, सार्थक और मंगलमय बन जाता है।
आरती का पुनरावर्तन इस भाव को और दृढ़ करता है कि माँ योगमाया अपने भक्तों पर करुणा की छाया बनाए रखती हैं। वे रक्षक, पालनकर्ता और इच्छापूर्ति करने वाली आदिशक्ति हैं—जो कष्टों को हरकर जीवन में शांति, संतोष और विश्वास भर देती हैं।
“माँ योगमाया की आरती” हमें सिखाती है कि माँ करुणा, संरक्षण और कल्याण की प्रतिमूर्ति हैं। उनकी भक्ति से दुःख-चिंता का नाश, मनोकामनाओं की पूर्ति और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। जो भक्त श्रद्धा और समर्पण से इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में माँ की शीतल छाया सदैव बनी रहती है—जो उसे धर्म, संतुलन और मंगल की ओर अग्रसर करती है।
माँ योगमाया की आरती – Maa Yogmaya Ki Aarti
ॐ जय माँ योगमाया ॐ जय श्री योगमाया ।
भक्त जनों को अपने… दे शीतल छाया ॥
ॐ जय श्री…
तुम देवी कुलरक्षक ग्वालों की दाती ।
कल्याणी कष्टों को… क्षण में दूर करती ॥
ॐ जय श्री…
तुम हो शक्ति धरा की महिमा हो नग की ।
पूर्ण हो करती इच्छा… तुम सबके मन की ॥
ॐ जय श्री…
हम पर कृपा सदा हो मैय्या ये वर दो ।
दर्शन दो हे माता… हमें धन्य कर दो ॥
ॐ जय श्री …
मां योगमाया की आरती
ॐ जय माँ योगमाया ॐ जय श्री योगमाया ।
भक्त जनों को अपने… दे शीतल छाया ॥
ॐ जय श्री…
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