महाशिवरात्रि – 2026 में महाशिवरात्रि कब है ?

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महाशिवरात्रि कब है? जानें व्रत के प्रमुख नियम, पूजा-विधि, कथा और योगिक महत्व

महाशिवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण त्योहारों में गिना जाता है। यह पर्व देवों के देव महादेव, अर्थात भगवान शिव को समर्पित होता है। वेदों, पुराणों और धर्मग्रंथों में भगवान शिव के महात्म्य, सर्वशक्तिमत्ता और सर्वव्यापक स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है। शिवशंकर की उपासना के लिए प्रत्येक दिन शुभ माना गया है, किंतु सोमवार, श्रावण मास, शिवरात्रि और विशेष रूप से महाशिवरात्रि का अत्यंत विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।

प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शिवरात्रि कहा जाता है। वर्ष भर में आने वाली 12 या 13 शिवरात्रियों में से दो शिवरात्रियाँ सबसे अधिक प्रसिद्ध मानी जाती हैं। पहली, फाल्गुन मास की त्रयोदशी, जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है, और दूसरी सावन शिवरात्रि, जो भगवान शिव के प्रिय श्रावण माह में आती है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित कर शिव कृपा प्राप्त करते हैं।

आदिदेव महादेव को हिंदू संस्कृति का आधार और समस्त देवताओं में सर्वोच्च माना गया है। वे सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और करुणामय हैं। महाशिवरात्रि का आयोजन पंचांग के अनुसार भिन्न-भिन्न नामों से समझाया जाता है। दक्षिण भारतीय पंचांग (अमावस्यान्त पंचांग) के अनुसार यह पर्व माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, जबकि उत्तर भारतीय पंचांग (पूर्णिमान्त पंचांग) में इसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में स्वीकार किया जाता है।

हालाँकि तिथियों की गणना अलग-अलग पंचांगों से की जाती है, लेकिन महाशिवरात्रि का पर्व दोनों पंचांगों में एक ही दिन पड़ता है। इसी कारण अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार भी इस पावन पर्व की तारीख समान रहती है। यही विशेषता महाशिवरात्रि को पूरे भारत में एकसमान श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाने वाला महान पर्व बनाती है।

2026 में महाशिवरात्रि कब है ?

महाशिवरात्रि का पावन पर्व रविवार, 15 फ़रवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस अवसर पर निशिता काल में शिव-पूजन का विशेष महत्व माना गया है, जिसका समय 16 फ़रवरी की रात्रि 12:00 ए.एम. से 12:49 ए.एम. तक रहेगा। इस निशिता काल पूजा की कुल अवधि 49 मिनट की होगी, जिसे अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। वहीं, महाशिवरात्रि व्रत का पारण अगले दिन 16 फ़रवरी 2026 को प्रातः 06:32 ए.एम. से अपराह्न 03:21 पी.एम. के बीच किया जाएगा। शास्त्रानुसार, निर्धारित समय में पूजा और पारण करने से व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है।

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

  • रात्रि प्रथम प्रहर की पूजा का समय शाम 06:17 बजे से 09:21 बजे तक रहेगा।
  • इसके पश्चात रात्रि द्वितीय प्रहर की पूजा 09:21 बजे रात्रि से 12:25 बजे मध्यरात्रि तक (16 फ़रवरी) संपन्न की जाएगी।
  • वहीं रात्रि तृतीय प्रहर का पूजा समय 16 फ़रवरी को 12:25 बजे रात्रि से 03:28 बजे प्रातः तक निर्धारित है।
  • इसके बाद रात्रि चतुर्थ प्रहर की पूजा 03:28 बजे प्रातः से 06:32 बजे सुबह (16 फ़रवरी) तक की जाएगी।

इसी क्रम में चतुर्दशी तिथि का प्रारम्भ 15 फ़रवरी 2026 को सायं 05:04 बजे होगा, जबकि चतुर्दशी तिथि का समापन अगले दिन 16 फ़रवरी 2026 को सायं 05:34 बजे होगा। शास्त्रानुसार, निर्धारित प्रहरों और तिथि काल में पूजा-अर्चना करने से महाशिवरात्रि व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है।

महाशिवरात्रि व्रत के प्रमुख नियम और विधि

महाशिवरात्रि व्रत को पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक करने के लिए कुछ शास्त्रोक्त नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक माना गया है। इन नियमों का उद्देश्य तन, मन और आत्मा की शुद्धि करना है।

  • महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान के जल में काले तिल डालें। यदि संभव हो तो इस दिन गंगा-स्नान करें। गंगा तट तक जाना संभव न हो, तो घर के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करने से भी समान पुण्य प्राप्त होता है।
  • व्रत के दौरान अन्न और साधारण नमक का सेवन वर्जित रहता है। इस दिन अल्पाहार ग्रहण करें और बार-बार फलाहार करने से बचें, ताकि व्रत की एकाग्रता बनी रहे।
  • इस पावन दिन प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य तामसिक पदार्थों से पूर्ण रूप से दूरी बनाए रखें। यह नियम मन की पवित्रता बनाए रखने में सहायक होता है।
  • व्रत के समय दिन में सोना निषिद्ध माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दिन में शयन करने से व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता
  • यदि कोई भक्त निर्जला व्रत रखने में असमर्थ हो, तो वह दूध, फल या चाय का सीमित मात्रा में सेवन कर सकता है। व्रत में बल से अधिक संयम का महत्व बताया गया है।
  • यदि आप व्रत के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, तो उसमें साधारण नमक की जगह सेंधा नमक का ही प्रयोग करें। यह व्रत नियमों के अनुरूप माना जाता है।
  • इस दिन ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें और तन-मन की शुद्धता बनाए रखें। विचारों और कर्मों में संयम ही व्रत की सच्ची साधना है।
  • व्रत काल में किसी से झगड़ा, वाद-विवाद, निंदा या असत्य वचन से स्वयं को दूर रखें। शांत चित्त और मधुर वाणी शिव कृपा को आकर्षित करती है।
  • शिवपुराण में बताया गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण का अत्यंत विशेष महत्व है। अतः व्रत के साथ रात्रि जागरण अवश्य करें, क्योंकि इससे व्रत का दोगुना पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा मिलती है।

महाशिवरात्रि व्रत के पारण के शास्त्रीय नियम

  • महाशिवरात्रि व्रत का समापन अर्थात पारण भी शास्त्रों के अनुसार विशेष नियमों के साथ किया जाना चाहिए। मान्यता है कि इस व्रत का आरंभ चतुर्दशी तिथि में होता है और पारण भी चतुर्दशी तिथि के भीतर ही किया जाना चाहिए।
  • शास्त्रों के अनुसार, सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि समाप्त होने से पहले के समय में ही व्रत का पारण करना उत्तम माना गया है। इस निर्धारित काल में पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और साधक को भगवान शिव की विशेष कृपा मिलती है।
  • शिवरात्रि की रात्रि जागरण के पश्चात, अगले दिन प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। इसके बाद फल, दूध अथवा सात्विक भोजन ग्रहण कर विधिपूर्वक व्रत का पारण करें। पारण के समय संयम, शुद्धता और श्रद्धा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
  • इस प्रकार शास्त्रोक्त विधि से किया गया पारण महाशिवरात्रि व्रत को संपूर्ण और फलदायी बनाता है तथा जीवन में शांति, सुख और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

महाशिवरात्रि व्रत की संपूर्ण पूजा-विधि

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। इस पावन अवसर पर सरल किंतु श्रद्धापूर्ण विधि से की गई आराधना भी असीम पुण्य प्रदान करती है।

  • पूजा की शुरुआत में मिट्टी के लोटे में शुद्ध जल या दूध भरें और उसमें बेलपत्र, आक-धतूरा के पुष्प, अक्षत (चावल) आदि मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित करें। यदि पास में शिव मंदिर उपलब्ध न हो, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक पूजन करना भी पूर्णतः शुभ माना गया है।
  • इस दिन शिवपुराण का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र का जप अथवा पंचाक्षर मंत्र – “ॐ नमः शिवाय” का निरंतर स्मरण अवश्य करना चाहिए। मंत्र-जप से मन की शुद्धि होती है और शिव कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। शास्त्रों में महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण का विशेष विधान बताया गया है, इसलिए भक्तों को पूरी रात जागकर शिव-स्मरण करने का प्रयास करना चाहिए।
  • शास्त्रीय दृष्टि से निशीथ काल में किया गया शिवरात्रि पूजन सर्वाधिक श्रेष्ठ माना गया है। हालांकि जो भक्त निशीथ काल में पूजा करने में असमर्थ हों, वे रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधा और सामर्थ्य अनुसार किसी भी प्रहर में भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं। श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध भाव से किया गया पूजन ही महाशिवरात्रि व्रत को सफल बनाता है।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है – महाशिवरात्रि की 4 प्रेरक कथाएँ

१. अनजाने व्रत से उद्धार की अद्भुत कथा – निषादराज (गुरु-द्रुह) की मुक्ति

शिवमहापुराण में महाशिवरात्रि व्रत के महात्म्य का अत्यंत प्रेरणादायक वर्णन मिलता है। यह कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान शिव की कृपा से अनजाने में किया गया व्रत भी मनुष्य को पापों से मुक्त कर शिवपद तक पहुँचा सकता है। इस दिव्य प्रसंग को महात्मा सूत जी ने नैमिषारण्य में ऋषियों के समक्ष वर्णित किया है।

प्राचीन काल में एक घने वन में गुरु-द्रुह नामक एक भील (निषाद) रहता था। वह अत्यंत बलवान किंतु क्रूर स्वभाव का था। उसके हृदय में दया, करुणा और धर्म का कोई स्थान नहीं था। वह केवल पशु-शिकार से ही अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करता था और उसने जीवन में कभी कोई पुण्य कर्म नहीं किया था।

एक समय ऐसा आया जब कई दिनों तक उसे कोई शिकार नहीं मिला। भूख से व्याकुल परिवार को देखकर वह और अधिक चिंतित हो गया। शिकार की तलाश में वह पूरे दिन वन में भटकता रहा, परंतु भाग्यवश उस दिन उसे एक भी पशु नहीं मिला। दैवयोग से वही दिन महाशिवरात्रि का पावन पर्व था। बिना जाने-समझे, अज्ञानवश, उसका पूरा परिवार उस दिन उपवास और निराहार में रहा। इस प्रकार अनजाने में ही शिवरात्रि व्रत संपन्न हो गया

रात्रि होने पर भी खाली हाथ घर लौटने का विचार उसने त्याग दिया। वह एक तालाब के किनारे स्थित बेल वृक्ष पर चढ़ गया। हाथ में धनुष-बाण लेकर उसने सोचा कि कोई न कोई पशु जल पीने अवश्य आएगा। उसी बेल वृक्ष के नीचे एक प्राचीन स्वयम्भू शिवलिंग विराजमान था, जिसकी उसे कोई जानकारी नहीं थी।

महाशिवरात्रि की कथा

प्रथम प्रहर – अनजाना शिवपूजन- रात्रि के प्रथम प्रहर में एक हिरणी तालाब पर जल पीने आई। जैसे ही व्याध ने धनुष चढ़ाया, उसके हाथ के कंपन से बेलपत्र और जल नीचे गिर पड़े और सीधे शिवलिंग पर अर्पित हो गए। इस प्रकार अनजाने में प्रथम प्रहर का शिवपूजन सम्पन्न हो गया और उसके असंख्य पाप नष्ट होने लगे हिरणी ने भयभीत होकर व्याध से कारण पूछा। अपनी विवशता बताते हुए व्याध ने कहा कि उसका परिवार भूखा है। हिरणी ने करुण स्वर में शपथ लेकर अपने बच्चों को बहन के पास छोड़कर लौटने का वचन दिया। शिवपूजन के पुण्य प्रभाव से व्याध का हृदय कुछ पिघला और उसने उसे जाने दिया। इस प्रकार पहला प्रहर जागरण और निराहार में बीत गया।

द्वितीय प्रहर – पुनः शिवकृपा- कुछ समय बाद दूसरी हिरणी वहाँ आई। वही घटना पुनः घटी—धनुष चढ़ते ही बेलपत्र और जल शिवलिंग पर अर्पित हो गए। इस प्रकार द्वितीय प्रहर का भी अनजाना शिवपूजन हो गया। दूसरी हिरणी ने भी अपने बच्चों की दुहाई दी और भगवान विष्णु की शपथ लेकर लौटने का वचन दिया। व्याध ने उसे भी जाने दिया।

तृतीय प्रहर – सत्य और करुणा का प्रभाव- तीसरे प्रहर में एक हिरण वहाँ आया। वही दृश्य फिर दोहराया गया। इस बार भी शिवलिंग पर जल-बेलपत्र अर्पित हो गए और तृतीय प्रहर का पूजन संपन्न हुआ। हिरण ने सत्य, परोपकार और धर्म का महत्व बताते हुए लौटने की प्रतिज्ञा की। व्याध अब विस्मित था—एक क्रूर शिकारी, शिकार से धर्म की चर्चा कर रहा था। शिवकृपा से उसके भीतर विवेक जागृत हो रहा था।

चतुर्थ प्रहर – पूर्ण शुद्धि और हृदय परिवर्तन- तीनों मृग अपने-अपने परिवार से मिलकर प्रतिज्ञा निभाने के लिए लौट पड़े। उनके साथ उनके नन्हे शावक भी चल दिए। यह दृश्य देखकर व्याध प्रसन्न हुआ। जैसे ही उसने फिर धनुष उठाया, चौथी बार बेलपत्र और जल शिवलिंग पर अर्पित हो गए। इस प्रकार चतुर्थ प्रहर का शिवपूजन भी अनजाने में पूर्ण हुआ और व्याध के समस्त पाप भस्म हो गए

मृगों ने व्याध से कहा—“हे व्याध! हमारी देह को सार्थक कीजिए।” यह सुनकर उसका हृदय दया और पश्चाताप से भर गया। उसने आत्मचिंतन किया कि पशु होकर भी ये परोपकारी हैं और मैं मनुष्य होकर पापी। यह सोचकर उसने सभी मृगों को अभयदान दे दिया।

भगवान शिव का साक्षात् दर्शन- उसी क्षण भगवान महादेव प्रकट हुए और बोले— “हे निषादराज! तुम्हारे व्रत से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ, वर माँगो।” भगवान शिव के दर्शन से ही व्याध जीवनमुक्त हो गया और चरणों में गिर पड़ा। भगवान शिव ने उसे ‘गुह’ नाम प्रदान किया और वर दिया कि वह शृंगवेरपुर जाकर दिव्य भोगों का उपभोग करेगा, भगवान श्रीराम स्वयं उसके घर पधारेंगे, उससे मित्रता करेंगे और अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करेगा। उसी समय मृग भी दिव्य देह धारण कर दिव्यधाम को चले गए।

सूत जी कहते हैं कि जब अनजाने व्रत से एक क्रूर निषादराज का उद्धार हो सकता है, तो जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से महाशिवरात्रि व्रत करता है, उसे दुर्लभ भोग और परम मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इस संसार के दान, तीर्थ, तप और व्रत भी शिवरात्रि व्रत के समान फलदायी नहीं हैं। इसी कारण महाशिवरात्रि को ‘व्रतराज’ कहा गया है।

२. महाशिवरात्रि से जुड़ी ज्योतिर्लिंग प्रकट होने की पौराणिक कथा

महाशिवरात्रि पर्व से एक अत्यंत गूढ़ और दिव्य पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है, जो भगवान शिव की अनंत सत्ता और सर्वोच्चता को प्रकट करती है। ईशान संहिता के अनुसार, एक समय भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच यह विवाद उत्पन्न हो गया कि सृष्टि में कौन सबसे महान और श्रेष्ठ है। यह बहस धीरे-धीरे अहंकार और क्रोध का रूप लेने लगी।

जब यह विवाद बढ़ने लगा, तब भगवान शिव ने सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप किया। उसी क्षण वे करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी ज्योतिर्लिंग, अर्थात अग्नि के अनंत स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। यह स्तंभ इतना विशाल और प्रकाशमान था कि उसका न आदि दिखाई दे रहा था और न ही अंत

फोटो महाशिवरात्रि

भगवान विष्णु और ब्रह्मा दोनों इस अद्भुत ज्योतिर्लिंग की सीमा को जानने के लिए तत्पर हो गए। भगवान विष्णु उसका मूल जानने हेतु पाताल लोक की ओर गए, जबकि भगवान ब्रह्मा अपने हंस वाहन पर आरूढ़ होकर आकाश की ऊँचाइयों में उसका शीर्ष खोजने निकल पड़े। उन्होंने अथक प्रयास किया, किंतु उस दिव्य स्तंभ की न तो शुरुआत मिल सकी और न ही उसका अंत

अंततः दोनों लौट आए। इस दिव्य अनुभव के बाद उनका अहंकार नष्ट हो चुका था, क्रोध शांत हो गया था और वे भगवान शिव की अनंत महिमा को स्वीकार कर चुके थे। तभी भगवान शिव अपने साक्षात रूप में प्रकट हुए और सृष्टि में सामंजस्य एवं संतुलन को पुनः स्थापित किया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव का यह दिव्य ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होना फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था। इसी कारण यह पावन रात्रि महाशिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस रात्रि को शिव-तत्व के प्राकट्य, अहंकार के विनाश और आत्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है।

३. महाशिवरात्रि से जुड़ी शिव–शक्ति मिलन की दिव्य कथा

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, माँ सती के पुनर्जन्म में जब उन्होंने माँ पार्वती के रूप में अवतार लिया, तब उनके हृदय में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की प्रबल इच्छा जाग्रत हुई। अपने इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए माता पार्वती ने अनेक प्रयास और उपासना के उपाय किए, किंतु प्रारंभ में भोलेनाथ इन प्रयासों से प्रसन्न नहीं हुए।

इसके पश्चात माता पार्वती ने गौरीकुंड में जाकर अत्यंत कठिन तपस्या और साधना का मार्ग अपनाया। उन्होंने पूर्ण निष्ठा, संयम और समर्पण के साथ शिव की आराधना की। उनकी इस अटूट भक्ति और तपोबल से अंततः भगवान शिव का हृदय द्रवित हो गया और वे माता पार्वती से प्रसन्न हुए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के पावन दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। इसी अवसर पर शिवजी ने वैराग्य के साथ गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और शिव–शक्ति का पावन मिलन हुआ।

महाशिवरात्रि स्टेटस

इसी कारण महाशिवरात्रि को शिव और शक्ति के मिलन के महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस पवित्र रात्रि में भक्त उपवास, रात्रि जागरण और विधिपूर्वक शिव–पूजन कर सुख, शांति और कल्याण की कामना करते हैं तथा शिव–शक्ति का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

४. महाशिवरात्रि से जुड़ी समुद्र मंथन और नीलकंठ बनने की पौराणिक कथा

महाशिवरात्रि से संबंधित एक अत्यंत प्रसिद्ध और अर्थपूर्ण पौराणिक कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। शास्त्रों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र का मंथन किया, तब उसमें से अमृत के साथ-साथ भयंकर विष भी प्रकट हुआ। यह विष इतना प्रचंड और विनाशकारी था कि उसके दर्शन मात्र से ही देवता और दानव दोनों भयभीत हो गए, क्योंकि वह संपूर्ण सृष्टि को नष्ट कर सकता था।

इस भयानक संकट से तीनों लोकों की रक्षा के लिए देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। सृष्टि के कल्याण हेतु महादेव ने करुणा दिखाते हुए उस समस्त विष को स्वयं ग्रहण कर लिया। किंतु उन्होंने उसे निगला नहीं, बल्कि अपने कंठ में ही धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, और तभी से वे नीलकंठ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुए।

महाशिवरात्रि कथा

ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए यह महान त्याग किया। इसी कारण महाशिवरात्रि का पर्व मनाकर भक्त आज भी महादेव के प्रति कृतज्ञता और आभार प्रकट करते हैं।

शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि महाशिवरात्रि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस पावन रात्रि में पूरी रात जागरण करने से केवल तन ही नहीं, बल्कि भाग्य भी जागृत होता है और जीवन में निरंतर उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान शिव सभी दुःख, कष्ट और पापों के विनाशक माने गए हैं।

यही कारण है कि महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धा और भक्ति से शिव-पूजन करने पर जाने-अनजाने में किए गए पापों की क्षमा प्राप्त होती है और आने वाले समय में भगवान शिव की विशेष कृपा और संरक्षण मिलता है। सांसारिक बंधनों और मानसिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए यह रात्रि अत्यंत फलदायी और पुण्यदायक मानी जाती है।

महाशिवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व और योगिक महत्व

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो महाशिवरात्रि की रात्रि वर्ष की उन विशिष्ट रातों में से एक मानी जाती है, जब पृथ्वी की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊर्ध्वगामी, अर्थात ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इस दिन चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति ऐसी बनती है कि उसका मानव शरीर, विशेषकर रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि इस समय व्यक्ति सीधी मुद्रा में बैठकर ध्यान करता है, तो वह इस प्राकृतिक ऊर्जा का अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है। इसी कारण महाशिवरात्रि की रात जागरण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

योग और ध्यान विज्ञान के अनुसार, इस रात्रि शरीर की प्राण ऊर्जा स्वयं ऊपर की ओर गतिशील होती है। जब साधक सीधा बैठकर ध्यान करता है, तो यह ऊर्जा धीरे-धीरे मस्तिष्क तक पहुँचती है, जिससे मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और आध्यात्मिक अनुभूति में वृद्धि होती है। यही कारण है कि योगी, ऋषि और साधक इस रात को जागकर ध्यान, जप और साधना करते हैं, ताकि वे अपनी चेतना को उच्च स्तर तक उठा सकें

महाशिवरात्रि पर चंद्रमा और पृथ्वी की विशेष स्थिति मानव शरीर की जैविक घड़ी (Biological Clock) को संतुलित करने में सहायक मानी जाती है। इस दिन व्रत रखने से पाचन तंत्र सुधरता है, शरीर से विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और मेटाबॉलिज्म संतुलित रहता है। इससे शरीर का प्राकृतिक डिटॉक्स होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि फल, जल और सात्विक आहार के साथ उपवास करने से शरीर शुद्ध और मन शांत रहता है।

वैज्ञानिक शोध यह भी संकेत देते हैं कि महाशिवरात्रि की रात जागरण करने से शरीर में मेलाटोनिन (Melatonin) हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। यह हार्मोन तनाव कम करने, मानसिक शांति बढ़ाने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को मजबूत करता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण इस रात्रि भजन, ध्यान और सत्संग का विशेष महत्व बताया गया है।

इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक मानते हैं कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव न केवल समुद्र की लहरों पर, बल्कि मानव मस्तिष्क और भावनाओं पर भी पड़ता है। पूर्णिमा और अमावस्या के समय मनुष्य की भावनाएँ अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। चूँकि महाशिवरात्रि अमावस्या से ठीक पूर्व की रात्रि होती है, इसलिए इसे मानसिक और आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है। इस रात किया गया ध्यान मन को स्थिर करता है और व्यक्ति को अपनी गहन आंतरिक चेतना से जोड़ता है


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हर हर महादेव!

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