महाकाल जी की आरती – Mahakaal Ji Ki Aarti

महाकाल जी की आरती का – सार (भावार्थ)

महाकाल जी की आरती बाबा महाकाल के उस विराट स्वरूप का गान है, जो काल के भी स्वामी (मृत्युंजय) हैं—अर्थात् समय, जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे। आरती का प्रारंभ ही उन्हें त्रिलोकेश्वर, त्रिकालदर्शी और करुणामय भोले शिव के रूप में नमन करते हुए होता है। भक्त बाबा से मंगल, रक्षा और कल्याण की कामना करता है, क्योंकि महाकाल न केवल संहारक हैं, बल्कि सच्चे अर्थों में कृपालु रक्षक भी हैं।

आरती में बाबा की योगी-राजसी छवि उभरकर आती है—वे बाघम्बर धारण किए, नंदी पर आरूढ़, त्रिपुंड धारी त्रिपुरारी हैं, जो भव (संसार) के भय को हर लेते हैं। उन्हें कैलाशी शशिभाल कहा गया है—हिमालय की पावन शिखाओं पर विराजमान, चंद्रमा से शोभित मस्तक वाले महादेव। इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि बाबा महाकाल का स्वरूप तप, वैराग्य और करुणा का अद्भुत संगम है।

अगले भाव में डमरू की नादध्वनि, भोले शंकर का नर्तन और “बम भोले” का घोष वातावरण को दिव्यता से भर देता है। यह नाद केवल संगीत नहीं, बल्कि सृष्टि की आदि-लय है—जो अज्ञान को तोड़कर चेतना को जाग्रत करती है। बाबा को आशुतोष प्रतिपाल कहा गया है—जो सरल भाव से की गई भक्ति पर तुरंत प्रसन्न होकर भक्तों का पालन करते हैं।

आरती यह भी बताती है कि बाबा महाकाल “आरत हरी पालनहारी” हैं—वे पीड़ा का हरण करते हैं और मंगल का विस्तार करते हैं। जो नर-नारी श्रद्धा से उनकी आरती करते हैं, उन्हें “पदारथ चारि”—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—की प्राप्ति होती है। यहाँ महाकाल का स्वरूप केवल भयावह नहीं, बल्कि कृपासिंधु (करुणा का सागर) के रूप में सामने आता है।

विशेष रूप से “उज्जैनी महाकाल” का स्मरण यह दर्शाता है कि बाबा का धाम उज्जैन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि काल-विजय और मोक्ष-मार्ग का द्वार है। वे कालरूप में अन्याय और अहंकार का अंत करते हैं, तो कृपालु रूप में शरणागत भक्तों को संरक्षण, शांति और आत्मबल प्रदान करते हैं।

समापन में आरती पुनः उसी मूल भाव पर लौटती है—“मृत्युंजय महाकाल”: जो मृत्यु के भय को हरकर जीवन को अर्थ, साहस और शुद्धता से भर देते हैं। भक्त बार-बार नमन करता है, क्योंकि बाबा महाकाल में संहार और सृजन, न्याय और करुणा, वैराग्य और वात्सल्य—सब एक साथ समाहित हैं।

“महाकाल जी की आरती” हमें सिखाती है कि बाबा महाकाल समय के स्वामी, भय के नाशक और कृपा के सागर हैं। उनकी भक्ति से दुःख, भय और अशांति का अंत, तथा मंगल, संरक्षण और आध्यात्मिक उन्नति का उदय होता है। जो श्रद्धा से उनकी आरती करता है, उसके जीवन में धर्म, साहस और मोक्ष का प्रकाश फैलता है।

महाकाल जी की आरती – Mahakaal Ji Ki Aarti

काल की विकराल की, त्रिलोकेश्वर त्रिकाल की,
भोले शिव कृपाल की, करो रे मंगल आरती,
मृत्युंजय महाकाल की, करो रे मंगल आरती,
मृत्युंजय महाकाल की, बाबा महाकाल की,
ओ मेरे महाकाल की,
करो रे मंगल आरती, मृत्युंजय महाकाल की।।

पित पुष्प बाघम्बर धारी, नंदी तेरी सवारी,
त्रिपुंडधारी हे त्रिपुरारी, भोले भव भयहारी,
शम्भू दिन दयाल की, तीन लोक दिगपाल की,
कैलाषी शशिभाल की,
करो रे मंगल आरती, मृत्युंजय महाकाल की।।

डमरू बाजे डम डम डम, नाचे शंकर भोला,
बम भोले शिव बमबम बमबम, चढ़ा भंग का गोला,
जय जय ह्रदय विशाल की, आशुतोष प्रतिपाल की,
नैना धक धक ज्वाल की,
करो रे मंगल आरती, मृत्युंजय महाकाल की।।

आरत हरी पालनहारी, तू है मंगलकारी,
मंगल आरती करे नर नारी, पाएं पदारथ चारि,
कालरूप महाकाल की,कृपासिंधु महाकाल की,
उज्जैनी महाकाल की,
करो रे मंगल आरती, मृत्युंजय महाकाल की।।

काल की विकराल की, त्रिलोकेश्वर त्रिकाल की,
भोले शिव कृपाल की, करो रे मंगल आरती,
मृत्युंजय महाकाल की, करो रे मंगल आरती,

मृत्युंजय महाकाल की, बाबा महाकाल की,
ओ मेरे महाकाल की,
करो रे मंगल आरती, मृत्युंजय महाकाल की।।


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