नृसिंह आरती का – सार (भावार्थ)
यह आरती भगवान नृसिंह—श्रीहरि विष्णु के अद्भुत नर-सिंह अवतार—की महिमा का भावपूर्ण स्तवन है। आरती की शुरुआत में प्रभु को “प्रह्लादाह्लाद-दायिने” कहकर नमन किया गया है, अर्थात् वे अपने भक्त प्रह्लाद को आनंद देने वाले, भक्त-वत्सल और करुणामय ईश्वर हैं। यह स्पष्ट करता है कि नृसिंह रूप का मूल उद्देश्य केवल अधर्म का विनाश नहीं, बल्कि भक्त की रक्षा और विश्वास की प्रतिष्ठा है।
अगली पंक्तियाँ उस दिव्य लीला का स्मरण कराती हैं, जिसमें प्रभु ने हिरण्यकशिपु के अहंकार और अत्याचार का अंत किया। उनके नखों को “वज्र समान” बताया गया है—जो असत्य और अधर्म को चीर देने वाली ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक हैं। यहाँ नृसिंह भगवान को न्याय के अधिष्ठाता के रूप में दर्शाया गया है, जो अन्याय के विरुद्ध स्वयं अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं।
आरती का मध्य भाग नृसिंह की सर्वव्यापकता को उजागर करता है—“इतो नृसिंहः, परतो नृसिंहः…” अर्थात् जहाँ-जहाँ भक्त जाता है, वहाँ-वहाँ प्रभु नृसिंह विद्यमान हैं। वे बाहर भी हैं और हृदय के भीतर भी। यह भाव हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हमारी चेतना, विचार और विश्वास में निरंतर उपस्थित रहते हैं।
अंतिम श्लोक में भगवान को केशव, जगदीश और नरहरि कहकर जयघोष किया गया है—जो उनके विष्णु-तत्त्व, लोकपालन और भक्त-रक्षा के त्रिविध स्वरूप को समेटता है। नृसिंह का यह अवतार एक साथ उग्रता और करुणा का अद्भुत संतुलन है: दुष्टों के लिए प्रचंड, पर भक्तों के लिए अत्यंत कोमल।
“नृसिंह आरती” हमें यह अनुभूति कराती है कि भगवान नृसिंह सर्वत्र, सर्वदा और सर्वरूपेण हमारे साथ हैं। वे भय का नाश, अधर्म का अंत और भक्तों की अटूट रक्षा करते हैं। जो श्रद्धा से इस आरती का पाठ करता है, उसके भीतर साहस, विश्वास और आत्मिक सुरक्षा का भाव जाग्रत होता है—और जीवन में आने वाले संकटों से पार पाने की शक्ति मिलती है।
नृसिंह आरती की अंतिम तीन पंक्तियाँ कोई साधारण स्तुति नहीं हैं, बल्कि वे गीत गोविंद ग्रंथ में वर्णित श्री दशावतार स्तोत्र से ली गई हैं। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के दस अवतारों की महिमा का गूढ़ और काव्यात्मक वर्णन करता है। इसकी रचना महान संत-कवि और भगवान के परम भक्त श्री जयदेव गोस्वामी ने की थी। जयदेव जी की यह अनुपम कृति न केवल साहित्यिक दृष्टि से श्रेष्ठ है, बल्कि भक्ति, रस और आध्यात्मिक अनुभूति का अद्भुत संगम भी है। नृसिंह आरती में इन पंक्तियों का समावेश इस बात का संकेत है कि यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि वैष्णव परंपरा की उस गहरी भक्ति-धारा से जुड़ी है, जहाँ काव्य और उपासना एकाकार हो जाते हैं।
नृसिंह आरती – Narasimha Aarti – (श्री जयदेव गोस्वामी द्वारा रचित)
नमस्ते नरसिंहाय
प्रह्लादाह्लाद-दायिने
हिरण्यकशिपोर्वक्षः-
शिला-टङ्क-नखालये
इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो
यतो यतो यामि ततो नृसिंहः
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो
नृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये
तव करकमलवरे नखमद्भुत-शृङ्गं
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम्
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।
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