परिचय: वह ध्वनि जिसमें बसा है सारा ब्रह्मांड
‘ॐ जय शिव ओंकारा’ केवल एक आरती नहीं है। यह एक आध्यात्मिक यात्रा है। इसकी शुरुआत ही ‘ओंकार’ से होती है – वह पवित्र ध्वनि जिससे इस सृष्टि की रचना हुई। शिव को ‘ओंकार’ कहना यानी उन्हें स्वयं ब्रह्मांड का मूल स्वरूप मानना।
आरती कहती है – “ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा”। यानी इस एक ओंकार में ही ब्रह्मा (सृजनकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और शिव (संहारकर्ता) तीनों समाए हैं। और यह तीनों एक साथ अर्धनारीश्वर के रूप में हैं, यानी शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं। यह पंक्ति मुझे हमेशा याद दिलाती है कि इस संसार में स्त्री और पुरुष, शक्ति और शिव, दोनों का मिलन ही सृष्टि का आधार है।
शिवजी की आरती – Om Jai Shiv Omkara Aarti – ॐ जय शिव ओंकारा आरती
ॐ जय शिव ओंकारा,स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुराननपञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारीजगपालन कारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्येये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्रीपार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी,शिवलहरी गंगा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती,शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन,भस्मी में वासा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंगा बहत है,गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत,ओढ़त मृगछाला॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ,नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत,महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरतीजो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा आरती – सार (भावार्थ)
“ॐ जय शिव ओंकारा” भगवान शिव की सबसे प्रसिद्ध और अर्थपूर्ण आरतियों में से एक है। यह आरती शिव के निर्गुण–सगुण, सृष्टिकर्ता–संहारक और करुणामय स्वरूप को अत्यंत सुंदर भावों में प्रस्तुत करती है। इसमें शिव को ॐकार स्वरूप, त्रिदेवों के आधार और समस्त ब्रह्मांड के नियंता के रूप में स्मरण किया गया है।
आरती की शुरुआत में भगवान शिव को ओंकार स्वरूप कहा गया है, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों शक्तियाँ एक साथ विद्यमान हैं। वे अर्धनारीश्वर रूप में पार्वती के साथ स्थित हैं, जो शक्ति और शिव के अद्वैत भाव को दर्शाता है। यह बताता है कि सृष्टि का संतुलन शिव और शक्ति के मिलन से ही संभव है।
आगे शिव के विविध मुखों और वाहनों का वर्णन आता है—एक मुख, चार मुख और पाँच मुख के रूप में वे अलग-अलग कार्यों का संचालन करते हैं। हंस, गरुड़ और वृषभ जैसे वाहनों का उल्लेख यह दर्शाता है कि शिव ज्ञान, वैराग्य और धर्म के प्रतीक हैं और सभी लोकों में पूज्य हैं।
आरती में शिव के अनेक भुजाओं वाले रूप का वर्णन है, जो उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप (सत्त्व, रज, तम) को प्रकट करता है। उनका यह रूप त्रिलोक के जीवों को आकर्षित करता है और यह सिखाता है कि शिव सभी गुणों से परे होकर भी सभी में व्याप्त हैं।
भगवान शिव को अक्षमाला, वनमाला और मुण्डमाला धारण करने वाला त्रिपुरारी कहा गया है, जिन्होंने त्रिपुरासुर जैसे अहंकार के प्रतीक का नाश किया। उनका यह रूप दर्शाता है कि शिव असुर प्रवृत्तियों का संहार कर भक्तों की रक्षा करते हैं।
शिव के वस्त्रों और संगत का भी सुंदर चित्रण है—कभी श्वेताम्बर, कभी पीताम्बर, तो कभी बाघम्बर धारण करने वाले शिव, सनकादि ऋषियों, गरुड़ और भूतगणों से घिरे रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिव सबको समान दृष्टि से स्वीकार करने वाले महादेव हैं।
हाथों में कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल धारण कर शिव सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले बताए गए हैं। वे केवल संहारक नहीं, बल्कि कल्याण और करुणा के साक्षात स्वरूप हैं।
आरती यह भी स्पष्ट करती है कि प्रणव “ॐ” के भीतर ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक हैं, अर्थात शिव ही परम सत्य हैं। लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती का संग यह दर्शाता है कि शिव सभी शक्तियों के केंद्र हैं, और गंगा का उनके जटाओं में वास पवित्रता और मोक्ष का प्रतीक है।
कैलास पर्वत पर पार्वती सहित निवास करने वाले शिव, भांग-धतूरा ग्रहण करने वाले और भस्म रमाने वाले योगीराज हैं। उनके गले में मुण्डमाला, जटाओं में गंगा और शरीर पर मृगछाला उनके वैराग्य और तपस्वी स्वरूप को दर्शाता है।
काशी में विराजमान विश्वनाथ के रूप में शिव नित्य दर्शन देने वाले हैं। नंदी उनके परम भक्त हैं और उनकी महिमा अपार है। अंत में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से इस आरती का गान करता है, उसे शिवकृपा से मनवांछित फल, शांति और कल्याण की प्राप्ति होती है।
ॐ जय शिव ओंकारा आरती भगवान शिव के सर्वव्यापक, करुणामय और मोक्षदायक स्वरूप को सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह आरती भक्त को अहंकार, अज्ञान और दुःख से मुक्त कर आध्यात्मिक शांति, भक्ति और वैराग्य की ओर ले जाती है। शिवभक्ति के पथ पर चलने वालों के लिए यह आरती एक आत्मिक ऊर्जा और विश्वास का स्रोत है।
ॐ जय शिव ओंकारा आरती के अनमोल लाभ
मैंने इस आरती को नियमित रूप से गाने के जो लाभ अनुभव किए हैं, वे शब्दों से परे हैं। फिर भी, उन्हें साझा करने का प्रयास करता हूँ:
🕉️ मन की असीम शांति और स्थिरता:
शिव को ‘स्थिर’ कहा जाता है, जो कभी डिगते नहीं। जब मैं इस आरती को गाता हूँ, खासकर “एकानन चतुरानन, पञ्चानन राजे” वाली पंक्ति पर, तो मुझे लगता है कि मैं उस स्थिरता से जुड़ रहा हूँ। मन की चंचलता कम होती है और अंदर एक अजीब सी शांति छा जाती है। ऐसा लगता है जैसे कैलाश की ठंडी हवा मेरे मन के ताप को शांत कर रही हो।
➡️ भय और नकारात्मकता से मुक्ति:
शिव को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है, जो इतने दयालु हैं कि आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं, और इतने विकराल भी कि त्रिपुरासुर जैसे राक्षसों का संहार कर देते हैं। “त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी” पंक्ति मुझे याद दिलाती है कि चाहे मेरे सामने कितनी भी बड़ी समस्या (राक्षस) क्यों न हो, महादेव उसका नाश करने में सक्षम हैं। इस विश्वास ने मेरे मन का डर हमेशा दूर किया है।
🌿 वैराग्य और संतोष की भावना:
शिव का स्वरूप वैराग्य का प्रतीक है। वे भस्म रमाते हैं, मृगछाला ओढ़ते हैं, और भांग-धतूरे से संतुष्ट हो जाते हैं। “भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा” और “जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला” जैसी पंक्तियाँ मुझे सिखाती हैं कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में है। यह आरती मुझे अपने जीवन में अनावश्यक चीज़ों के मोह से दूर रहने की प्रेरणा देती है।
🙏 आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार:
जब भी मैं यह आरती गाता हूँ, खासकर शाम के समय, घर का वातावरण पूरी तरह से पवित्र और सकारात्मक हो जाता है। “कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी, सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी” – इन शब्दों को गाते हुए ऐसा लगता है मानो स्वयं शिव अपने त्रिशूल से हमारे सभी दुखों का निवारण कर रहे हों।
आरती का सही समय और सही तरीका
बाबा भोलेनाथ तो एक पत्ता भी सच्चे मन से चढ़ाने पर राजी हो जाते हैं, लेकिन शास्त्रों में कुछ विधियाँ बताई गई हैं जिनसे हमारी भक्ति और भी गहरी होती है।
🕉️ कब करें आरती:
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प्रातःकाल (सूर्योदय से पहले): ब्रह्म मुहूर्त में शिव की आरती करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय की शांति में ‘ॐ नमः शिवाय’ और इस आरती का जाप मन को गहरी शांति देता है।
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सायंकाल (सूर्यास्त के समय): संध्या के समय दीपक जलाकर यह आरती करना बहुत फलदायी होता है। ऐसा माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश से निकलकर अपने भक्तों की ओर देखते हैं।
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सोमवार का दिन: भगवान शिव को समर्पित यह दिन विशेष रूप से इस आरती के लिए उत्तम है।
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महाशिवरात्रि और सावन का महीना: इन पवित्र अवसरों पर इस आरती का गायन अत्यधिक महत्व रखता है।
🙏 कैसे करें आरती (सरल विधि):
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स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अधिमानतः सफेद, पीले या भगवा रंग के वस्त्र पहनें।
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एक चौकी पर भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें। यदि शिवलिंग न हो तो उनकी तस्वीर भी रख सकते हैं।
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शिवलिंग या मूर्ति को जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से स्नान कराएँ (यदि संभव हो)। फिर चंदन, अक्षत (चावल), भस्म (राख), धतूरा, आक के फूल और बेलपत्र अर्पित करें।
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घी या कपूर का दीपक जलाएं। धूपबत्ती भी जला सकते हैं।
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अब श्रद्धा और प्रेम के साथ ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ आरती का पाठ करें या गाएं। कोशिश करें कि हर शब्द का अर्थ समझें और उस भाव में डूबें।
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आरती के बाद, सभी देवी-देवताओं से क्षमा याचना करें और प्रसाद (फल, मिठाई) सभी में बांटें।
धार्मिक महत्व: हर पंक्ति में छिपा है गूढ़ रहस्य
यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि शिव के दर्शन का संपूर्ण ग्रंथ है। मैंने जैसे-जैसे इसे समझा, हर पंक्ति मेरे लिए एक नया द्वार खोलती गई।
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‘एकानन, चतुरानन, पञ्चानन’ का अर्थ: शिव का एक मुख (एकानन) सर्वव्यापक ब्रह्म का प्रतीक है। चार मुख (चतुरानन) चार वेदों और चार दिशाओं का ज्ञान दर्शाते हैं। पांच मुख (पञ्चानन) पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पर उनकी पकड़ और पंच कर्म (सृजन, स्थिति, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह) को दर्शाते हैं।
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‘हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन’: यह शिव के तीन प्रमुख रूपों के वाहन हैं। हंस (हंस) विवेक का प्रतीक है, गरुड़ ज्ञान का, और वृषभ (नंदी) धर्म और शक्ति का। यानी शिव विवेक, ज्ञान और धर्म के रथ पर सवार हैं।
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‘अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला’: ये तीनों मालाएँ शिव के तीन स्वरूपों को दर्शाती हैं। अक्षमाला (रुद्राक्ष) तप और ध्यान का प्रतीक है। वनमाला (फूलों की माला) सौंदर्य और करुणा का। मुण्डमाला (खोपड़ियों की माला) इस बात का प्रतीक है कि वे समय के स्वामी हैं और सबका अंत उन्हीं में है।
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‘काशी में विराजे विश्वनाथ’: यह पंक्ति बताती है कि शिव ने काशी को अपनी नगरी बनाया और वहाँ के काशीवासियों और दर्शनार्थियों को मोक्ष का वरदान दिया। नंदी उनके द्वारपाल हैं और उनकी भक्ति का महत्व अपार है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव आरती को लेकर मन में कई सवाल आते हैं। यहाँ कुछ सामान्य प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:
- प्रश्न: क्या ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ आरती रोज करना आवश्यक है?
उत्तर: आवश्यक नहीं, लेकिन अत्यंत लाभकारी है। यदि रोज न कर सकें तो सोमवार, प्रदोष या शिवरात्रि के दिन जरूर करें। नियमितता से शिव कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। - प्रश्न: क्या स्त्रियाँ यह आरती कर सकती हैं?
उत्तर: बिल्कुल कर सकती हैं। शिव तो अर्धनारीश्वर हैं, जिनका आधा अंग स्वयं स्त्री का है। उनके दरबार में कोई भेदभाव नहीं। स्त्रियाँ पूरे श्रद्धा भाव से यह आरती कर सकती हैं। - प्रश्न: क्या बिना शिवलिंग के केवल मानसिक रूप से आरती करने से भी लाभ मिलता है?
उत्तर: अवश्य। भगवान शिव भाव के भूखे हैं। यदि आपके पास शिवलिंग नहीं है, तो अपने हृदय में ही उनका ध्यान करें, उनकी तस्वीर देखें या बस आँखें बंद करके उनके स्वरूप का स्मरण करें और आरती गाएं। आपका भाव ही सबसे बड़ा माध्यम है। - प्रश्न: आरती में भांग और धतूरे का उल्लेख क्यों है? क्या इनका सेवन करना चाहिए?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। यह एक गलत धारणा है। शिव ने समुद्र मंथन से निकला विष पी लिया था, इसलिए वे तप और संयम के प्रतीक हैं। भांग-धतूरा उन्हें इसलिए प्रिय है क्योंकि वे ठंडे स्वभाव के हैं और ये चीज़ें शीतलता प्रदान करती हैं। भक्तों के लिए तो यह केवल अर्पण की वस्तुएँ हैं, सेवन की नहीं। हमें इनका सेवन नहीं करना चाहिए। - प्रश्न: आरती के बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप कैसे करें?
उत्तर: आरती के बाद कम से कम 11 या 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करना बहुत अच्छा होता है। आप इसे माला से भी कर सकते हैं। बस ध्यान रखें, मन शिव में स्थिर हो और उच्चारण स्पष्ट हो।
निष्कर्ष: बाबा के चरणों में समर्पण
तो यह है ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ की दिव्य आरती, जो मुझे हर बार एक नई दृष्टि दे जाती है। यह आरती मुझे सिखाती है कि शिव केवल कैलाश के वासी नहीं, बल्कि हर उस हृदय में बसते हैं जो उन्हें पुकारता है। वे कितने सरल हैं कि बेलपत्र पर राजी, और कितने गंभीर कि ब्रह्मांड का संहार करने में समर्थ।
जब भी जीवन में उथल-पुथल महसूस हो, जब अहंकार सिर उठाए, या जब लगे कि सब कुछ खत्म हो गया, तो बस एक बार इस आरती को गुनगुनाएँ। बाबा की जटा से बहती गंगा की धारा आपके जीवन के सारे क्लेश धो देगी। उनका त्रिशूल आपके सारे दुखों का नाश कर देगा। और उनका ‘ॐ’ आपको उस परम सत्य से जोड़ देगा, जहाँ न कोई दुख है, न कोई भय, केवल शांति है।
हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!
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