श्री राणी सती माता की आरती का – सार (भावार्थ)
श्री राणी सती जी की आरती (दादी जी) की करुणा, शक्ति, सौंदर्य और भक्तवत्सलता का भावपूर्ण वर्णन करती है। आरती के प्रत्येक पद में माता को ऐसी दिव्य शक्ति के रूप में नमन किया गया है जो अपने भक्तों की विपत्ति दूर करती हैं, संकटों से रक्षा करती हैं और जीवन को शांति, समृद्धि तथा सद्बुद्धि से भर देती हैं।
आरती की शुरुआत में माता को “जय श्री राणी सती माता” कहकर स्मरण किया जाता है और यह स्पष्ट किया जाता है कि वे अपने भक्तजन की हर विपत्ति हरने वाली हैं। यह भाव भक्त को आश्वस्त करता है कि दादी जी की शरण में आने से भय, बाधा और दुःख स्वतः दूर होते हैं।
आगे माता के दिव्य स्वरूप का वर्णन है—वे अखंड ज्योति हैं, जिनकी प्रकाशमयी सत्ता सदा स्थिर और अविनाशी है। उनका तेज ऐसा बताया गया है जो दुर्जनों का नाश करने वाली तलवार की तरह तेजस्वी और विद्युत समान प्रभा से युक्त है। यह संकेत देता है कि राणी सती माता करुणामयी होने के साथ-साथ अन्याय और अधर्म का अंत करने वाली शक्ति भी हैं।
आरती में उनके भव्य धाम और मंदिर की शोभा का सुंदर चित्रण है—मरकत मणि से सुसज्जित अतिमंजुल मंदिर, चारों ओर लहराती ललित ध्वजाएँ और कंचन कलशों की दिव्य आभा। यह दृश्य माता के दरबार की पवित्रता, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक गरिमा को उजागर करता है, जहाँ पहुँचकर भक्त का मन स्वतः भक्तिभाव से भर उठता है।
माता की उपासना का दिव्य वातावरण भी वर्णित है—घंटियों की मधुर ध्वनि, शंख और मृदंग का नाद, किन्नरों का गान और वेदों की पवित्र ध्वनि। यह बताता है कि दादी जी का धाम केवल भौतिक नहीं, बल्कि नाद, मंत्र और साधना से आलोकित आध्यात्मिक क्षेत्र है, जहाँ निरंतर स्तुति और साधना होती रहती है।
आरती में सप्त मातृकाओं और देवगणों द्वारा माता की आरती करने का उल्लेख है। साथ ही, उन्हें विविध व्यंजनों और श्रीफल (नारियल) जैसे पवित्र अर्पण समर्पित किए जाते हैं। यह भाव दर्शाता है कि राणी सती माता की महिमा केवल लोक में ही नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी वंदित है, और भक्तों की सच्ची भक्ति उन्हें अत्यंत प्रिय है।
माता को संकटों का नाश करने वाली और कुमति (दुष्ट बुद्धि) का अंत करने वाली कहा गया है। वे अपने सेवकों के हृदय को कोमल बनाकर सुमति (सद्बुद्धि) प्रदान करती हैं। अर्थात्, दादी जी की कृपा से केवल बाहरी समस्याएँ ही नहीं मिटतीं, बल्कि भीतर का अज्ञान, क्रोध और भ्रम भी दूर होकर जीवन में विवेक और शांति का संचार होता है।
आगे माता के नेत्रों को “कमल-दल जैसे निर्मल” कहा गया है और उन्हें त्रय ताप—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक कष्टों—से मुक्ति देने वाली बताया गया है। त्रिलोक में चंद्रमा की तरह शीतल और कल्याणकारी उनकी करुणा भक्त को हर प्रकार के दुःख से उबारती है। भक्त अंततः माता की शरण में जाकर पूर्ण सुरक्षा और शांति का अनुभव करता है।
अंतिम पदों में आरती के फल का स्पष्ट उल्लेख है—जो कोई प्रतिदिन श्रद्धा से राणी सती माता की आरती गाता है, उसे सदन सिद्धि, नव निधि के समान फल, और मनवांछित वरदान प्राप्त होते हैं। अर्थात्, दादी जी की नियमित उपासना से जीवन में समृद्धि, स्थिरता, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित होती है।
श्री राणी सती माता की यह आरती करुणा, शक्ति, पवित्रता और भक्तवत्सलता का अनुपम संगम है। यह सिखाती है कि दादी जी की शरण में आने से विपत्ति का नाश, सद्बुद्धि की प्राप्ति और त्रिविध तापों से मुक्ति संभव है। जो भक्त नियमित, श्रद्धा और समर्पण से उनकी आरती करता है, उसके जीवन में शांति, सुरक्षा और मनोवांछित फल स्वतः प्राप्त होते हैं।
श्री राणी सती जी की आरती – Rani Sati Dadi Aarti
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ।
अपने भक्त जनन की, दूर करन विपत्ती ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
अवनि अननंतर ज्योति अखंडीत, मंडितचहुँक कुंभा ।
दुर्जन दलन खडग की, विद्युतसम प्रतिभा ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
मरकत मणि मंदिर अतिमंजुल, शोभा लखि न पडे ।
ललित ध्वजा चहुँ ओरे, कंचन कलश धरे ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
घंटा घनन घडावल बाजे, शंख मृदुग घूरे ।
किन्नर गायन करते, वेद ध्वनि उचरे ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
सप्त मात्रिका करे आरती, सुरगण ध्यान धरे ।
विविध प्रकार के व्यजंन, श्रीफल भेट धरे ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
संकट विकट विदारनि, नाशनि हो कुमति ।
सेवक जन ह्रदय पटले, मृदूल करन सुमति ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
अमल कमल दल लोचनी, मोचनी त्रय तापा ।
त्रिलोक चंद्र मैया तेरी, शरण गहुँ माता ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ॥
मैया जी की आरती, प्रतिदिन जो कोई गाता ।
सदन सिद्ध नव निध फल, मनवांछित पावे ॥
ॐ जय श्री राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता ।
अपने भक्त जनन की, दूर करन विपत्ती ॥
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