जब त्रयोदशी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो उसे रवि प्रदोष कहा जाता है। इस व्रत की कथा एक निर्धन ब्राह्मण से जुड़ी है, जिसकी सच्ची भक्ति और शिव आराधना के प्रभाव से उसका जीवन धन, सुख और समृद्धि से भर जाता है। यह कथा बताती है कि रवि प्रदोष व्रत दरिद्रता को दूर कर वैभव प्रदान करता है।
रवि प्रदोष व्रत कथा – (निर्धन ब्राह्मण के धनवान बनने की पावन कथा)
प्राचीन काल की बात है। एक समय भागीरथी (गंगा) के पवित्र तट पर महर्षियों ने एक विशाल धर्मसभा का आयोजन किया। यह दिव्य गोष्ठी समस्त सृष्टि के प्राणियों के कल्याण के उद्देश्य से आयोजित की गई थी। उस पुण्य अवसर पर महर्षि वेदव्यास के परम प्रतापी शिष्य श्री सूतजी भगवन्नाम का मधुर गान करते हुए सभा में पधारे। सूतजी के दर्शन होते ही शौनकादि अस्सी हजार ऋषि-मुनियों ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। आशीर्वाद प्राप्त कर सभी मुनिगण यथोचित आसनों पर विराजमान हो गए।
सभा में उपस्थित ऋषियों ने विनम्र भाव से सूतजी से प्रश्न किया— “हे महामुनि! कलियुग में मनुष्य धर्म-कर्म, वेद-शास्त्रों से विमुख होकर अधर्म और पाप के मार्ग पर चलेंगे। इससे उनके पुण्य क्षीण हो जाएंगे और वे अनेक कष्ट भोगेंगे। ऐसी कठिन परिस्थिति में भगवान शिव की भक्ति सरल रूप से कैसे प्राप्त हो सकती है? वह कौन-सा श्रेष्ठ व्रत है, जिससे भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण हों? कृपया हमें इसका उपदेश दें।”
ऋषियों का लोककल्याणकारी प्रश्न सुनकर सूतजी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले— “हे शौनकादि मुनिश्रेष्ठों! आप सभी धन्य हैं। आपने सम्पूर्ण मानवता के हित में यह महान प्रश्न किया है। मैं आपको एक ऐसे अत्यंत प्रभावशाली व्रत का विधान बताता हूँ, जिसके पालन से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, संतान तथा यश की प्राप्ति होती है। यह वही व्रत है, जिसका उपदेश स्वयं भगवान शिव ने देवी सती को दिया था। वही ज्ञान परंपरा से मेरे गुरुदेव और फिर मुझे प्राप्त हुआ।”
इसके पश्चात सूतजी ने प्रदोष व्रत की विधि का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि— त्रयोदशी के दिन प्रातः स्नान करके भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए। निराहार रहते हुए किसी शिवालय में जाकर विधिपूर्वक शिव पूजन करें। पूजन के बाद अर्धपुंड्र या त्रिपुंड तिलक धारण करें। भगवान शिव को बिल्वपत्र, धूप, दीप, अक्षत और ऋतु फल अर्पित करें। रुद्राक्ष की माला से “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें। व्रत के दिन मौन का पालन, मिथ्या भाषण से दूरी, भूमि पर शयन और एक समय भोजन करना चाहिए। अंत में “ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा” मंत्र से हवन करें। सूतजी ने कहा कि विशेष रूप से श्रावण मास में किया गया प्रदोष व्रत अत्यंत श्रेष्ठ फल प्रदान करता है।
ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया— “हे मुनिवर! आपने इस परम कल्याणकारी और दुःखहारी व्रत का वर्णन किया। कृपा कर यह बताइए कि इसे किसने किया और उसे क्या फल प्राप्त हुआ?” तब सूतजी ने रवि प्रदोष व्रत की पुण्य कथा सुनानी आरंभ की—
एक ग्राम में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ रहता था। उसकी पत्नी अत्यंत धर्मपरायण थी और श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत का पालन करती थी। एक बार उनका पुत्र गंगा स्नान के लिए निकला। मार्ग में कुछ डाकुओं ने उसे घेर लिया और उससे उसके पिता के गुप्त धन के बारे में पूछने लगे। भयभीत बालक ने सरलता से कहा— “हम तो अत्यंत गरीब हैं, हमारे पास धन कहाँ से आएगा?” डाकुओं ने उसकी पोटली देखी और पूछा कि इसमें क्या है। बालक ने निष्कपट भाव से उत्तर दिया—
“मेरी माँ ने मेरे लिए रोटी बाँध दी है।” उसकी सच्चाई देखकर एक डाकू बोला— “यह बालक तो सचमुच दीन-हीन है, इसे छोड़ देना चाहिए।” इस प्रकार वे सभी डाकू उसे मुक्त कर चले गए।
डाकुओं से बचकर वह बालक एक नगर के पास पहुँचा और थककर बरगद के वृक्ष के नीचे सो गया। उसी समय नगर के सैनिक डाकुओं की खोज करते हुए वहाँ पहुँचे और बालक को देखकर उसे चोर समझ बैठे। वे उसे बंदी बनाकर राजा के दरबार में ले गए। बिना पूरा सत्य जाने राजा ने उसे कारावास का दंड दे दिया।
उधर उसी दिन बालक की माँ रवि प्रदोष व्रत कर रही थी। वह मन ही मन भगवान शिव से अपने पुत्र के सकुशल लौटने की प्रार्थना कर रही थी। उस भक्तिमय व्रत के प्रभाव से उसी रात राजा को स्वप्न आया, जिसमें उसे बताया गया कि बालक निर्दोष है और यदि उसे प्रातःकाल मुक्त न किया गया तो राज्य का सर्वनाश हो जाएगा।
भोर होते ही राजा ने बालक को बुलाकर पूरा वृत्तांत पूछा। बालक ने डाकुओं से भेंट और अपनी निर्धनता की सच्ची कथा सुना दी। राजा ने तत्काल उसके माता-पिता को बुलवाया। निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी भयभीत अवस्था में दरबार पहुँचे। राजा ने कहा— “आपका पुत्र पूर्णतः निर्दोष है। आपकी दीन-हीन स्थिति देखकर हम आपको पाँच ग्राम दान में देते हैं, जिससे आप सुखपूर्वक जीवन यापन कर सकें।” भगवान शिव की कृपा से वह ब्राह्मण परिवार धन-सम्पन्न हुआ और आनंदपूर्वक जीवन बिताने लगा।
सूतजी ने कथा का समापन करते हुए कहा— “हे मुनिगणों! जो भी भक्त श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक रवि प्रदोष व्रत का पालन करता है, उसके जीवन से निर्धनता, भय और दुःख नष्ट हो जाते हैं और उसे सदा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।”
रवि प्रदोष व्रत रखने के लाभ
एकादशी व्रत की भांति ही वर्ष भर में कुल 24 प्रदोष व्रत आते हैं। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी या प्रदोष—इन दोनों में से किसी एक व्रत का नियमित पालन भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। प्रत्येक वार में आने वाले प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व और अलग फल होता है। जब प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ता है, तो उसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। आइए जानते हैं रविवार को रखे जाने वाले रवि प्रदोष व्रत के पाँच प्रमुख लाभ—
1. सुख, शांति और दीर्घायु की प्राप्ति
रवि प्रदोष के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से जीवन में सुख-शांति का वास होता है। यह व्रत व्यक्ति को मानसिक स्थिरता प्रदान करता है और दीर्घ आयु का आशीर्वाद भी देता है।
2. सूर्य ग्रह की अनुकूलता
रवि प्रदोष का सीधा संबंध सूर्य देव से माना गया है। इस व्रत के प्रभाव से सूर्य और चंद्र दोनों ग्रह जीवन में सकारात्मक रूप से सक्रिय हो जाते हैं। कुंडली में यदि सूर्य या चंद्र नीच अवस्था में हों, तब भी यह व्रत उनके अशुभ प्रभाव को कम कर देता है। सूर्य ग्रहों के राजा हैं, अतः रवि प्रदोष रखने से सूर्य से जुड़ी सभी बाधाएँ दूर होने लगती हैं।
3. मान-सम्मान, यश और प्रतिष्ठा में वृद्धि
चूँकि यह व्रत सूर्य से संबंधित है, इसलिए नाम, यश और सामाजिक सम्मान प्रदान करता है। जिन जातकों की कुंडली में अपयश या बदनामी के योग हों, उनके लिए रवि प्रदोष व्रत विशेष फलदायी माना गया है।
4. संकटों से रक्षा और धन-समृद्धि
पुराणों में वर्णित है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से प्रदोष व्रत करता है, वह जीवन में बड़े संकटों से सुरक्षित रहता है। उसके जीवन में धन, वैभव और समृद्धि बनी रहती है तथा आर्थिक परेशानियाँ दूर होती हैं।
5. शीघ्र कार्यसिद्धि और मनोकामना पूर्ति
रवि प्रदोष, सोम प्रदोष और शनि प्रदोष—इन तीनों व्रतों को विधिपूर्वक पूर्ण करने से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि होती है और इच्छित फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि यदि कोई भक्त 11 प्रदोष व्रत या एक वर्ष की सभी त्रयोदशियों का व्रत करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएँ शीघ्र और निश्चित रूप से पूर्ण होती हैं।
इस प्रकार रवि प्रदोष व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि जीवन को सुख, सम्मान और सफलता से भी भर देता है।
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हर-हर महादेव। 🙏
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