श्री सत्यनारायणजी की आरती – सार (भावार्थ)
श्री सत्यनारायणजी की आरती भगवान विष्णु के उस सत्यस्वरूप की महिमा का गान करती है, जो लक्ष्मीपति, धर्म के रक्षक और भक्तों के कष्ट हरने वाले हैं। इस आरती में भगवान को लक्ष्मीरमणा कहकर संबोधित किया गया है, जो यह दर्शाता है कि वे माता लक्ष्मी के साथ सदा विराजमान रहकर भक्तों को सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करते हैं।
आरती में बताया गया है कि भगवान सत्यनारायण रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनकी दिव्य छवि अत्यंत मनोहारी है। देवर्षि नारद स्वयं उनकी आरती करते हैं और घंटा-ध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण को पवित्र बना देते हैं। यह दृश्य भगवान की सर्वलोक-पूज्यता को दर्शाता है।
कथा-संदर्भ में भगवान के अवतार और लीलाओं का वर्णन मिलता है। कलियुग में उन्होंने एक द्विज (ब्राह्मण) को दर्शन देने के लिए स्वयं को वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट किया और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वैभव प्रदान किया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि भगवान रूप नहीं, भाव देखते हैं।
आरती यह भी दर्शाती है कि भगवान ने एक दुर्बल भील और कठोर जीवन जी रहे लोगों पर भी कृपा की तथा राजा चंद्रचूड़ जैसे भक्तों की विपत्तियाँ हर लीं। इससे स्पष्ट होता है कि सत्यनारायण भगवान न्यायप्रिय और करुणामय हैं, जो सभी वर्गों पर समान कृपा करते हैं।
एक वैश्य भक्त का उल्लेख आता है, जिसे प्रारंभ में भगवान ने उसकी श्रद्धा के कारण मनोवांछित फल दिया, किंतु जब उसने श्रद्धा त्याग दी, तो उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा। बाद में पुनः स्तुति करने पर भगवान ने उसे क्षमा कर दिया। यह संदेश देता है कि श्रद्धा और विश्वास के बिना भक्ति अधूरी है।
आरती में बार-बार यह भाव प्रकट होता है कि भगवान सत्यनारायण क्षण-क्षण भक्तों के भाव के अनुसार रूप धारण करते हैं। जिसने श्रद्धा को अपनाया, उसका कार्य सफल हुआ। राजा द्वारा ग्वाल-बालों के साथ वन में की गई भक्ति और भगवान द्वारा मनवांछित फल प्रदान करना, उनकी दीनदयालु प्रकृति को उजागर करता है।
अंत में प्रसाद का उल्लेख है—कदली फल, मेवा, धूप, दीप और तुलसी—जो दर्शाता है कि भगवान सादगी और शुद्ध भाव से अर्पित भोग से ही प्रसन्न हो जाते हैं। आरती का निष्कर्ष यह है कि जो कोई भी श्री सत्यनारायणजी की आरती श्रद्धा और भक्ति से गाता है, उसे जीवन में मनोकामनाओं की पूर्ति, सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
👉 सार रूप में, यह आरती हमें सिखाती है कि
श्रद्धा, सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलने वाला भक्त कभी निराश नहीं होता। श्री सत्यनारायण भगवान अपने भक्तों के जीवन से पाप, दुःख और अभाव को दूर कर उन्हें आनंद और समृद्धि प्रदान करते हैं। 🙏✨
श्री सत्यनारायणजी की आरती – Satyanarayan Ji Ki Aarti
जय लक्ष्मीरमणा, स्वामी जय लक्ष्मीरमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
रत्नजड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन, घंटा ध्वनि बाजे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
प्रगट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
दुर्बल भील कठारो, इन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपति हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सर्यो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
श्री सत्यनारायणजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
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आपकी एक छोटी-सी सहभागिता से यह दिव्य भक्ति औरों तक भी पहुँचेगी। भगवान श्री सत्यनारायणजी आप सभी को सत्य, सुख, समृद्धि और मनोकामना-पूर्ति का आशीर्वाद दें। 🌸✨