शीतला माता की आरती – सार (भावार्थ)
शीतला माता की आरती देवी शीतला के उस करुणामय और कल्याणकारी स्वरूप का स्तवन है, जो रोगों का शमन करने वाली, संताप हरने वाली और समस्त सृष्टि की पालनहार मानी जाती हैं। यह आरती माता को आदि ज्योति और सब फल प्रदान करने वाली महारानी के रूप में नमन करती है तथा भक्तों के जीवन में शांति, स्वास्थ्य और सुख की कामना व्यक्त करती है।
आरती के आरंभ में शीतला माता की जय-जयकार करते हुए उन्हें आदि ज्योति कहा गया है, अर्थात वे सृष्टि की मूल शक्ति हैं। माता को सभी प्रकार के फल देने वाली बताया गया है—चाहे वह आरोग्य हो, संतान सुख हो, या जीवन की समृद्धि। उनका स्मरण मात्र ही भक्त के कष्टों को शांत कर देता है।
आगे माता के दिव्य सिंहासन का वर्णन है, जो रत्नों से सुसज्जित है और जिस पर श्वेत छत्र शोभायमान है। उनके आसपास ऋद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं, जिससे माता की तेजस्वी और जगमगाती छवि प्रकट होती है। यह दृश्य माता के ऐश्वर्य और दैवी गौरव को दर्शाता है।
आरती में यह भी बताया गया है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव स्वयं शीतला माता की सेवा में तत्पर रहते हैं। वेद और पुराण भी माता की महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते—यह माता की अनंत शक्ति और अपार महत्त्व को दर्शाता है।
देवताओं और ऋषियों द्वारा माता की स्तुति का भी सुंदर चित्रण मिलता है। इंद्र मृदंग बजाते हैं, चंद्रमा वीणा धारण करते हैं, सूर्य ताल देते हैं और नारद मुनि गान करते हैं। यह संकेत है कि शीतला माता की आराधना सम्पूर्ण देवसमूह को आनंद से भर देती है।
घंटा, शंख और शहनाई की मधुर ध्वनि के बीच भक्त जन जब आरती करते हैं, तो माता के दर्शन से उनका हृदय हर्ष और उल्लास से भर जाता है। यह सामूहिक भक्ति का भाव और उत्सवमय वातावरण को दर्शाता है।
माता को ब्रह्म रूप और तीनों कालों की ज्ञाता कहा गया है। वे भक्तों को माता, पिता और भ्राता के समान स्नेह देती हैं। जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से उनका ध्यान करता है, उसे शक्ति प्राप्त होती है और उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा भक्त भवसागर को पार कर लेता है।
आरती में शीतला माता की रोग नाशक शक्ति का विशेष वर्णन है। जो कोई भी रोगों से पीड़ित होकर उनकी शरण में आता है, उसे आरोग्य प्राप्त होता है। कोढ़ जैसे कठिन रोग से ग्रस्त व्यक्ति को भी निर्मल काया मिलती है और अंधे को नेत्रों का प्रकाश प्राप्त होता है—यह माता की करुणा और चमत्कारी शक्ति का प्रतीक है।
साथ ही माता को संतान देने वाली और दरिद्रता हरने वाली बताया गया है। जो व्यक्ति माता की भक्ति नहीं करता, वह अंत में पछताता है—यह संदेश भक्तों को श्रद्धा और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
अंत में माता को शीतलता प्रदान करने वाली, संसार की रक्षक और सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और विनाश करने वाली शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। भक्त अपनी विनम्रता से केवल भक्ति की याचना करता है, क्योंकि माता की कृपा ही सबसे बड़ा वरदान है।
सार रूप में
शीतला माता की यह आरती स्वास्थ्य, शांति, करुणा और संरक्षण का दिव्य संदेश देती है। इसका नियमित पाठ रोगों से रक्षा करता है, जीवन की पीड़ाओं को शांत करता है और भक्त के हृदय में विश्वास व श्रद्धा को दृढ़ करता है। शीतला माता न केवल रोग हरने वाली देवी हैं, बल्कि वे सम्पूर्ण जगत की स्नेहमयी माता और त्राता हैं।
जय शीतला माता! 🙏🌸
शीतला माता की आरती – Sheetla Mata Ki Aarti
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर डोलावें, जगमग छवि छाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणत, पार नहीं पाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
इन्द्र मृदङ्ग बजावत, चन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावै, नारद मुनि गाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
घण्टा शङ्ख शहनाई, बाजै मन भाता।
करै भक्त जन आरती, लखि लखि हर्षाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
ब्रह्म रूप वरदानी, तुही तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देती, मातु पिता भ्राता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
जो जन ध्यान लगावे, प्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावे, भवनिधि तर जाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
रोगों से जो पीड़ित कोई, शरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल काया, अन्ध नेत्र पाता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
बांझ पुत्र को पावे, दारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहीं, सिर धुनि पछताता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
शीतल करती जननी, तू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति बाला बिनाशन, तू सब की माता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
दास नारायणकर , जोरी माता।
भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ माता॥
ॐ जय शीतला माता…..॥
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जय शीतला माता! 🌸🙏