शिव रक्षा स्तोत्र – Shiv Raksha Stotra

शिव रक्षा स्तोत्र का विस्तृत सार एवं भावार्थ

यह शिव रक्षा स्तोत्र भगवान सदाशिव की सर्वांग रक्षात्मक कृपा को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली, पावन और कवच-स्वरूप स्तोत्र है। इसका उद्देश्य साधक को भय, रोग, ग्रह-दोष, नकारात्मक शक्तियों और संकटों से सुरक्षित रखना तथा जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि कराना है। यह स्तोत्र ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिपादित और अनुष्टुप् छंद में रचित है, जिसमें श्री सदाशिव स्वयं देवता हैं।

स्तोत्र की शुरुआत भगवान महादेव के पवित्र चरित्र के स्मरण से होती है, जो असीम, परमोदार और चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाले हैं। यह स्पष्ट करता है कि शिव केवल संहारक नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर मार्गदर्शक और रक्षक हैं।

इसके बाद साधक को गौरी और गणेश सहित, पंचवक्त्र, त्रिनेत्र और दशभुज शिव का ध्यान कर इस स्तोत्र का पाठ करने की प्रेरणा दी गई है। यह ध्यान साधक के भीतर आत्मिक बल, एकाग्रता और रक्षा-भाव को जाग्रत करता है।

फिर स्तोत्र में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा का क्रमबद्ध वर्णन है।

  • गंगाधर सिर की, अर्धचंद्रधारी ललाट की, मदनध्वंसी नेत्रों की और सर्पभूषित शिव कानों की रक्षा करते हैं।
  • पुरारि नासिका की, जगत्पति मुख की, वागीश्वर जिह्वा की और नीलकंठ कंठ की रक्षा करते हैं।
  • विश्वधुरंधर कंधों की, पिनाकधारी भुजाओं व हाथों की रक्षा करते हैं।
  • शंकर हृदय की, गिरिजापति जठर की, मृत्युंजय नाभि की और व्याघ्रचर्मधारी कटि की रक्षा करते हैं।
  • दीनार्तवत्सल शिव जंघाओं की, महेश्वर जांघों की, जगदीश्वर घुटनों की, जगत्कर्ता पिंडलियों की और गणाधिप टखनों की रक्षा करते हैं।
  • अंत में करुणासिन्धु सदाशिव सम्पूर्ण शरीर की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

यह स्तोत्र बताता है कि जो भक्त इस शिव-बल से युक्त रक्षा स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करता है, वह सभी भोगों का अनुभव कर अंततः शिवसायुज्य (शिव के साथ एकत्व) को प्राप्त करता है।

अगले श्लोकों में बताया गया है कि ग्रह, भूत, पिशाच और नकारात्मक शक्तियाँ शिव-नाम की रक्षा से दूर भाग जाती हैं। यह स्तोत्र निर्भयता प्रदान करता है और इसे अभय प्रदान करने वाला कवच कहा गया है। जो भक्त इसे गले में धारण करता है, उसके लिए तीनों लोक भी अनुकूल हो जाते हैं।

अंत में स्तोत्र की दैवी उत्पत्ति का वर्णन है—कि यह रक्षा-कवच भगवान नारायण ने स्वप्न में योगी याज्ञवल्क्य को बताया, जिन्होंने इसे लिखकर लोककल्याण हेतु प्रदान किया।

निष्कर्ष:

शिव रक्षा स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि जीवन-रक्षा का दिव्य कवच है। इसका नियमित पाठ साधक को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और दैविक संकटों से सुरक्षित रखता है। यह स्तोत्र भय-नाश, ग्रह-दोष शमन, आत्मिक बल, शांति और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। जो भक्त श्रद्धा और नियम से इसका पाठ करता है, उसका जीवन शिव-कृपा से सुरक्षित और शिवमय हो जाता है।

शिव रक्षा स्तोत्र – Shiv Raksha Stotra

॥ विनियोग ॥

अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः॥
श्री सदाशिवो देवता॥ अनुष्टुप् छन्दः॥
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥

॥ स्तोत्र पाठ ॥

चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम्।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम्॥१॥

गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम्।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः॥२॥

गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः।
नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण॥३॥

घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः॥४॥

श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक्॥५॥

हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः॥६॥

सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः।
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः॥७॥

जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः॥८॥

एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥९॥

ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात्॥१०॥

अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम्॥११॥

इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत्।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत॥१२॥


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ॐ नमः शिवाय! 🔱🙏

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