शिव तांडव स्तोत्र – Shiv Tandav Stotram

शिव तांडव स्तोत्र का विस्तृत सार एवं भावार्थ

यह शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के रौद्र-आनंदमय तांडव का दिव्य, सजीव और गहन वर्णन है। इसमें महादेव को करुणा, संहार, सौंदर्य, वैराग्य और परमानंद—इन सभी रूपों में अनुभव किया जाता है। स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति शिव की लीलाओं, अलंकारों, नृत्य-ताल और तत्त्वज्ञान को एक साथ उभारती है, जिससे पाठक का मन शिव-चिंतन में डूब जाता है।

प्रारम्भिक श्लोकों में जटाओं से बहती गंगा से पावन हुई धरा, गले में लटकती सर्पमाला, और डमरू की गूँज के साथ शिव का चण्ड तांडव चित्रित है। यह तांडव केवल संहार नहीं, बल्कि सृष्टि की लय-ताल है—जहाँ नाश से नवसृजन का मार्ग खुलता है। डमरू-नाद ब्रह्माण्डीय स्पंदन का प्रतीक है, जो चेतना को जाग्रत करता है।

अगले श्लोकों में जटाओं में लहराती गंगा, ललाट की ज्वाला, और किशोर चंद्र से सुशोभित शिव का सौंदर्य उभरता है। यहाँ शिव उग्र भी हैं और सौम्य भी—यही उनकी पूर्णता है। भक्त का मन हर क्षण शशिशेखर पर अनुरक्त होता है, क्योंकि यह रूप शांति और प्रकाश का संचार करता है।

मध्य भाग में गिरिराज नंदिनी पार्वती के साथ शिव के आनंदमय संबंधों का संकेत है। कृपा-कटाक्ष से वे कठिन विपत्तियों को रोकते हैं और भक्त के मन में विनोदउल्लास भर देते हैं। दिगम्बर/चिदम्बर का संकेत बताता है कि शिव बाह्य आडंबर से परे, चेतना के आकाश में विराजमान हैं।

इसके बाद जटाओं में सर्पों के फण-मणि की प्रभा, कुंकुम-रंजित दिशाएँ, और मदांध गज-चर्म के प्रतीकों से शिव की अजेय शक्ति और अभय का भाव प्रकट होता है। शिव भूतभर्ता हैं—सभी प्राणियों के आधार—और उनके स्मरण से मन अद्भुत आनंद से भर उठता है।

आगे के श्लोकों में देवताओं द्वारा पूजित चरण, भुजंगराज की माला, और जटाजूट की शोभा है। ललाटाग्नि से कामदेव-दहन का वर्णन यह सिखाता है कि वासनाओं का क्षय ही मुक्तिमार्ग है। महाकपाली शिव का यह रूप बताता है कि वे अहंकार और मोह—दोनों का अंत करते हैं।

स्तुति में शिव को स्मरच्छिद, पुरच्छिद, भवच्छिद, मखच्छिद, गजान्तक, अंधकान्तक—अर्थात हर प्रकार के अधर्म, अवरोध और अज्ञान के विनाशक कहा गया है। वे सर्वमंगल के स्रोत हैं—उनका स्मरण जीवन में मधुरता, रस और कल्याण भर देता है।

अंतिम श्लोकों में तांडव की महाध्वनि, मृदंग-नाद, और प्रचण्ड लय के साथ शिव की जय-घोषणा है। यहाँ भक्त समानदर्शिता की कामना करता है—शत्रु-मित्र, रत्न-तृण, सुख-दुःख में समभाव। फिर वह निवेदन करता है कि कब वह निर्झर-निकुंज में, शिव-मंत्र का जप करते हुए, सुखी होगा।

फलश्रुति बताती है कि जो व्यक्ति नित्य श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ, स्मरण और उच्चारण करता है, वह चित्त-शुद्धि, भक्ति-वृद्धि और आत्मिक उन्नति पाता है। प्रदोष में शिव-पूजन के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने वाले को शिव स्थिर लक्ष्मी, समृद्धि, और यश प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष:

शिव तांडव स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि चेतना का जागरण है। यह शिव के उग्र-सौम्य, संहार-सृजन, और ज्ञान-आनंद—तीनों आयामों को एक सूत्र में पिरोता है। नियमित पाठ से अहंकार का क्षय, विकारों का नाश, समभाव और अंततः मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है। जो मन से “शिवं शंकरं शम्भु” का स्मरण करता है, उसका जीवन शिवमय हो उठता है। हर हर महादेव!

शिव तांडव स्तोत्र – Shiv Tandav Stotram

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥


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